निधि कुलपति जी की एनडीटीवी से विदाई को बाद सोशल मीडिया उनके लिए संदेशों से पटा पड़ा है। यकीनन निधि जी इसकी असली हकदार थीं। शांत, सौम्य निधि को कभी किसी ने पर्दे पर उत्तेजित होते नहीं देखा। उनकी साड़ी और सादगी ने दशकों दर्शकों के दिलों पर भारतीय नारी की जो छाप छोड़ी वह अविस्मरणीय रहेगी।
लगातार तीसरे दिन उनके लिए आ रही टिप्पणियां अद्भुत हैं- पढ़ें…
शंभुनाथ शुक्ला-
निधि कुलपति के रिटायरमेंट पर जिस तरह से सोशल मीडिया पर लोगों ने दुख जताया, यह पत्रकारों के लिए गौरव की बात है। जिस जमात को लोग ‘पत्तलकार’ कह रहे थे, उसमें से ऐसा निष्पक्ष, शांत, सौम्य पत्रकार निकला।
1993 से टीवी की दुनिया में प्रवेश करने वाली निधि कुलपति 2003 में एनडीटीवी से जुड़ीं। यह उनकी निष्पक्षता और बेबाकी थी कि किसी को कभी प्रतीत नहीं हुआ कि वे अमुक पार्टी को ज़्यादा बोलने का मौक़ा दे रही हैं। वे कभी उत्तेजित नहीं हुईं।
2013 में जब मैं रिटायर हुआ तब मुझे भी टीवी न्यूज़ चैनलों की डिबेट्स में बुलाया जाने लगा। 2020 तक मैं डिबेट्स में अक्सर जाया करता था।
एनडीटीवी पर उनसे भी मुलाकात हुई। एक बार शो की समाप्ति पर जब मैं गाड़ी का वेट कर रहा था, वे बाहर निकलीं और बोलीं, सर तब तक चाय पीते हैं। बहुत देर बातचीत हुई। पत्रकारीय जीवन में कभी वे गॉसिप का शिकार नहीं हुईं। दर्शकों को भी उनमें एक शांत, सौम्य महिला के दर्शन होते थे।
मुझे उम्मीद है कि वे निष्क्रिय नहीं होंगी और वे अपना पत्रकारीय कर्म उसी तटस्थता से पूरा करती रहेंगी। उनकी सेकंड ईनिंग के लिए शुभकामनाएँ। कई दशकों बाद किसी पत्रकार को ऐसा सम्मान मिला होगा।
संजय शर्मा-

ऐसे दौर में जब पत्रकारिता पर से लोगों का भरोसा उठने लगा है, निधि कुलपति एक सुकून देने वाले नाम की तरह सामने आती हैं. जब टीवी चैनलों के एंकर बहस के नाम पर गाली-गलौज और गुंडागर्दी करने लगे हैं, तब निधि जी जैसे पत्रकार एक ठंडी बयार की तरह महसूस होते है.
संवेदनशील, संतुलित और सच्चे सवालों के साथ. एनडीटीवी छोड़ने की उनकी खबर ने सोशल मीडिया पर भावनाओं की बाढ़ ला दी. सैकड़ों कमेंट्स आए, मगर हैरानी की बात यह रही कि एक भी आलोचनात्मक टिप्पणी नहीं थी. यह अपने-आप में उनके प्रति लोगों के विश्वास और सम्मान का प्रमाण है.
मैंने वर्षों तक उनका काम देखा है. हर शो, हर बहस में गहराई, गरिमा और ईमानदारी नज़र आई.उनसे पहली मुलाकात लखनऊ के एक एनडीटीवी कार्यक्रम में हुई थी. बातचीत इतनी सहज थी कि लगा ही नहीं कि यह पहली बार बात हो रही है.
ऐसे समय में, जब पत्रकारिता की छवि धुंधली पड़ रही है, निधि कुलपति एक भरोसे की किरण हैं. ईश्वर उन्हें हमेशा खुश रखे, प्रसन्न रखे, और उन्हें नए रास्तों पर भी उतनी ही सफलता मिले जितनी उन्होंने अब तक अर्जित की है.
सुशील बहुगुणा-
एनडीटीवी के निधि और असद न्यूज़रूम की सौम्यता और गंभीरता
वर्षों जिन साथियों के साथ आप काम करते हैं, उनकी मौजूदगी की अहमियत का अहसास आपको तब तक गहरा नहीं होता जब तक कि वो आपसे दूर न जाने लगें. बीते दो दिन में ऐसे ही दो दशक से अधिक पुराने साथी एनडीटीवी से रिटायर हो गए.
गुरुवार को निधि कुलपति और शुक्रवार को असद उर रहमान किदवई. (आज के दौर के मीडिया में एक लंबी पारी खेलकर रिटायर होना बिरलों को ही नसीब होता है.) दोनों साथियों के बारे में जितना लिखूं कम ही लगेगा.

निधि कुलपति ख़बरों के शोर के बीच एक ऐसी आश्वस्ति का नाम रहीं जो अपनी संजीदगी और गहरी शांति से ख़बरों को सूचनाओं के आतंक से दूर करती रहीं. उनकी दुर्लभ सौम्यता ख़बरों को एक अलग ही गंभीरता और गुरुत्व प्रदान करती थीं. आज के दौर के टीवी एंकरों के लिए वो एक प्रेरणा बनी रहेंगी. टीवी ख़बरों की दुनिया को निधि कुलपति का स्क्रीन पर न होना निश्चित ही खल रहा है. मेरे लिए अच्छी बात ये है कि मेरी दिल्ली नहीं तो ऋषिकेश में उनसे मुलाकात होती रहेगी.
निधि कुलपति को करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा लेकिन असद उर रहमान किदवाई का चेहरा उन करोड़ों लोगों के लिए वैसा जाना पहचाना नहीं होगा(एक दौर में वो एंकरिंग किया करते थे). ऐसा इसलिए कि उन्होंने एनडीटीवी इंडिया नाम की इस बुलंद इमारत की ठोस और गहरी बुनियाद बनना ज़्यादा बेहतर समझा. किसी भी तरह की सुर्ख़ियों से दूर न्यूज़रूम में ख़बरों के शोर के बीच वो एक संतुलित और शांत आवाज़ रहे.
हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी पर शानदार पकड़ और उनकी विद्वत्ता ने उन्हें न्यूज़रूम के सबसे अहम किरदारों में एक बनाए रखा. अपने जूनियर साथियों को तराशने के काम में वो हमेशा लगे रहे. उन्होंने कभी किसी को अपनी वरिष्ठता का अहसास नहीं होने दिया.
काम के वक़्त काम और मज़ाक के समय जमकर मज़ाक. इसीलिए वो न्यूज़रूम के सबसे चहेते बने रहे. आज वो भी रिटायर होकर निकले तो हम सब ख़बरों की दुनिया में कुछ और अकेले हो गए. लेकिन पढ़ने लिखने के गहरे शौकीन असदजी से किसी न किसी बहाने मिलना जुलना होता रहेगा. और कुछ नहीं पुराने गीतों या फिर उर्दू शब्दों में नुक़्ते को लेकर जब भी संदेह होगा तो वो बस एक फो़न दूर हैं. बस तभी कुछ नुक्ताचीनी कर लिया करेंगे.
निधि कुलपति और असद उर रहमान किदवई को रिटायरमेंट के बाद एक नई खुशनुमा और अच्छे स्वास्थ्य से भरपूर पारी के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं.
अपूर्व भारद्वाज-
बहुत मुश्किल है अंजना, चित्रा और रुबिका के दौर में — निधि कुलपति होना। एक ऐसे समय में जब तेज़ आवाज़ को पत्रकारिता समझ लिया गया है, वहाँ किसी का शांत रह जाना — विद्रोह जैसा लगता है।
निधि जी को मैं कभी व्यक्तिगत रूप से नहीं जान पाया, लेकिन पत्रकारिता पढ़ने दौरान उन्हें देखने और सुनने का मौका मिलता — तो पहली बार जाना कि विनम्रता भी नेतृत्व कर सकती है।
वो कैमरे पर थीं, लेकिन कभी ‘कैमरा-लायक़’ बनने की कोशिश नहीं की। उनकी मौजूदगी शांत थी — लेकिन असर गहरा। जैसे पुराने रेडियो की आवाज़ — जिसमें कोई जल्दबाज़ी नहीं होती, पर जो दिल तक उतर जाती है।
उन्होंने कभी ऊँचा बोलने की ज़रूरत महसूस नहीं की, क्योंकि उनकी गरिमा ही उनकी ताक़त थी। आज जब वे एनडीटीवी से रिटायर हो रही हैं — तो ऐसा लग रहा है जैसे कोई दीपक बुझा नहीं है, बस अब वो दीया और भीतर जलने लगा है।
निधि जी, आपका जाना एक युग का जाना है — लेकिन आपकी शैली, आपकी सादगी, आपकी आवाज़ — हम जैसे अनगिनत पत्रकारों के भीतर जीवित रहेगी। आपने हमें सिखाया — कि पत्रकारिता शोर से नहीं, संवेदनशीलता से चलती है।
ये भी पढ़ें…
एनडीटीवी का सीईओ मैं होता तो निधि जी को रोक लेता, काहे का रिटायरमेंट? अदानी को दिक्कत होती तो अलग बात है
ख़ुशनसीब हैं ऐसी जगह नौकरी मिली जहां इज़्ज़त के साथ उम्र कट गयी, Roys ने जगह ही इतने प्यार से बनायी!
मूल खबर…



