रमेश कुमार-
विदेश सचिव विक्रम मिसरी, कर्नल सोफिया कुरेशी और विंग कमांडर व्यौमिका सिंह ने जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए सूचित किया भारतीय सेनाओं के संयुक्त प्रयास से पाक और पाक अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकी ठिकानों, और प्रशिक्षण केंद्रों आदि पर लक्ष्यित हमले करके उन्हें नष्ट कर दिया गया!

गौरतलब है कि यह टॉरगेटेड स्ट्राइक पहलगाम में सैलानियों की क्रूर हत्याओं के प्रतिकार स्वरूप और भविष्य में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु किया था! इसे ‘ऑपरेशन सिंदूर” का नाम दिया गया और इसमें नागरिक आबादी का किसी भी तरह का नुकसान न हो पूरा ध्यान रखा गया!
आज भारतीय नागरिक भारतीय सेना के इस अद्भुत शौर्य, पराक्रम और रणनीतिक कौशल का सम्मान करता है! हमें इस नाजुक दौर में देश की एकता-अखंडता की अक्षुण्णता हेतु सामाजिक सौहार्द कायम रखते हुए सेना के साथ खड़ा रहना होगा! मीडिया की सनसनीखेज फेक न्यूज़ को नजरअंदाज करते हुए सिर्फ भारतीय सेना की ब्रीफिंग/ प्रेस कांफ्रेंस पर ही ध्यान देना होगा! युद्धोन्मादी नहीं बनना है!
जय हिंद! जय भारत! इंडियन आर्मी ज़िंदाबाद….!
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
क्या “पहला प्रहार” अब भारत की नई रक्षा नीति है !!
भारत की विदेश और सुरक्षा नीति पिछले एक दशक में एक निर्णायक बदलाव के दौर से गुज़र रही है। जहाँ पहले रणनीतिक धैर्य और प्रतिक्रियात्मक रवैया प्रमुख था, वहीं अब एक आक्रामक लेकिन सीमित सैन्य प्रतिक्रिया की दिशा में नीति झुकी है। पाकिस्तान की अस्थिरता, आतंकी नेटवर्कों के राज्य-प्रायोजित संरक्षण और वैश्विक संतुलनों के बदलते रूप ने इस बदलाव को और अधिक सैद्धांतिक मजबूती दी है।
- नीति का परिवर्तन: ‘स्ट्रेटेजिक रेस्ट्रेंट’ से ‘स्ट्रेटेजिक एसेर्टिवनेस’ तक
1998 के बाद भारत ने “No First Use” (NFU) परमाणु नीति अपनाई, जिसने उसे वैश्विक गैर-आक्रामक शक्ति के रूप में स्थापित किया। लेकिन पारंपरिक युद्धों के संदर्भ में ऐसा कोई औपचारिक सिद्धांत नहीं अपनाया गया।
2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 की एयर स्ट्राइक इस बात के संकेत थे कि भारत अब केवल आतंकी हमलों की प्रतीक्षा नहीं करेगा, बल्कि संभावित खतरे को पहले ही निष्क्रिय कर देने की रणनीति पर चलेगा।
- सीमित युद्ध का सिद्धांत और Cold Start Doctrine
भारत की Cold Start Doctrine, जो आधिकारिक रूप से भले ही गोपनीय हो, लेकिन सैन्य अभ्यासों और तैनात संरचनाओं से इसका संकेत मिलता है। यह सिद्धांत कहता है:
• सीमित क्षेत्र में, सीमित समय के लिए, तेज़ सैन्य कार्रवाई की जाए
• पूर्ण युद्ध की स्थिति से बचते हुए विरोधी की सैन्य संरचना और मनोबल को क्षति पहुँचाई जाए
• परमाणु युद्ध की रेखा को पार किए बिना रणनीतिक संदेश भेजा जाए
यह सिद्धांत भारत को पहले पारंपरिक हमला करने की सैद्धांतिक अनुमति देता है—बशर्ते इसे सीमित रखा जाए और स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य तय हो।
- पाकिस्तान की आंतरिक जटिलता और उसका रणनीतिक अर्थ
वर्तमान में पाकिस्तान एक बहुस्तरीय संकट से जूझ रहा है:
• राजनीतिक अस्थिरता: सत्ता का संघर्ष अब सेना और सिविल सरकार के बीच खुलकर सामने है।
• आर्थिक दिवालियापन: IMF के कड़े ऋण शर्तों और महंगाई ने जनाक्रोश को बढ़ाया है।
• आतंरिक सुरक्षा संकट: बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा में अलगाववादी गतिविधियाँ तेज़ हैं।
इन स्थितियों में यदि भारत कार्रवाई करता है, तो पाकिस्तान दोहरी मोर्चाबंदी में उलझ जाएगा—आंतरिक और बाह्य।
- वैश्विक परिप्रेक्ष्य: चीन की दूरी, अमेरिका की समीपता
• चीन, जो ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान का रणनीतिक साझेदार रहा है, वर्तमान में भारत के साथ सीमित सैन्य तनाव के बावजूद आर्थिक स्थिरता और ताइवान पर अधिक केंद्रित है।
• अमेरिका, फ्रांस, इज़राइल और रूस, भारत के साथ मजबूत रक्षा संबंधों में हैं।
बालाकोट हमले के समय भी अमेरिका ने पाकिस्तान को नहीं, भारत को प्राथमिकता दी थी।
इससे स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय प्रणाली भारत के सीमित सैन्य हस्तक्षेप को पूर्ण अस्वीकार नहीं करेगी, विशेषकर यदि उसे आतंकवाद के खिलाफ कदम के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
- कानूनी और कूटनीतिक वैधता का प्रश्न
अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 51, आत्मरक्षा के अधिकार को मान्यता देता है—यहाँ तक कि पूर्व-खतरे (imminent threat) के विरुद्ध भी।
यदि भारत यह स्थापित कर दे कि पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी ढांचे उसकी संप्रभुता को निरंतर चुनौती दे रहे हैं, तो एक सीमित, लक्षित कार्रवाई को वैधानिक और नैतिक समर्थन प्राप्त हो सकता है।
युद्ध नहीं, लेकिन सैन्य सक्रियता की नई परिभाषा
भारत हमला करेगा या नहीं—यह राजनीतिक निर्णय है। लेकिन यह तय है कि भारत अब उस चरण में प्रवेश कर चुका है जहाँ पहला पारंपरिक प्रहार उसकी रक्षा नीति का हिस्सा बन चुका है।
यह सिर्फ एक सैन्य निर्णय नहीं, बल्कि राज्य की संप्रभुता की नई परिभाषा है, जिसमें आत्मरक्षा अब सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि रणनीतिक पहल बन चुकी है।
शम्भूनाथ शुक्ला-
सेना वही होती है, असली बहादुरी होती है सेना में जोश भरने और उसे सही दिशा में प्रेरित करने वाले की। इस मामले में भारत सरकार बधाई की पात्र है। उसे पता है कि कब और कैसे पाकिस्तान के भीतर पल रहे आतंकी ठिकानों को नष्ट किया जाए। सेना की जय तो है ही उसे निर्देशित करने वाली सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे राजनेता भी इस जय-जयकार के अधिकारी हैं। बाकी बहुतों के मुँह धुआँ हो गए!


