राकेश कायस्थ-
पाकिस्तान की इतनी हैसियत नहीं है कि अमेरिका के कहने और ट्रंप के एलान के बावजूद सीज फायर तोड़ दे। यह तभी मुमकिन है, जब चीन की तरफ से उसे कोई ठोस आश्वसान मिला हो।
पिछले 15 दिनों मैंने दुनिया भर के दक्षिण एशिया विशेषज्ञों को सुना और पढ़ा है। पाकिस्तान के संजीदा पत्रकार क्या कह रहे हैं, यह जानने की कोशिश भी की है।
ज्यादातर लोगों का कहना यही था कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जनता का दिल जीतने वाले सैनिक टकराव के बाद शांति का कोई रास्ता निकाल लेंगे।
लेकिन चीन ने पाकिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश कर रखा है, अगर उसे लगेगा कि पाकिस्तान पर कोई गंभीर खतरा है, तो वह किसी ना किसी रूप में दखल जरूर देगा।
अगर ऐसा हुआ तो यह मामला काफी जटिल हो जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि पाकिस्तान अपनी माली हालत पर गौर करे और शांति का रास्ता चुने।
महक सिंह तरार-
इस तथाकथित युद्ध पर दोनों सरकारो द्वारा अपनी अपनी
—> जनता तक सच पहुँचने से रोकना
—> जनता की राय को ख़ास दिशा में मेनीप्युलेट करना
—> मिस-इनफार्मेशन को बढ़ने देना, उसे त्वरित ख़ारिज ना करना

ये पहले दिन से ऐसे संकेत थे जो इसे थियेटर ज़्यादा और युद्ध कम साबित करते थे। मिस-इनफार्मेशन का आलम ये था कि लोग जानकारियों के लिए दुश्मन देश की अवाम के कमेंट या BBC जैसे चैनल छानते नज़र आये क्यूंकि मेन स्ट्रीम मीडिया aka “लश्कर-ए-नोएडा” अपनी रिलायबिलिटी पूरी तरह से पहले ही खो चुका है
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इनफार्मेशन के फ्रंट पर ही एक कैजुअलिटी और हुई, वो थी अल्टरनेटिव मीडिया कैजुअलिटी। अन्धे मोदी भक्तों या नेगेटिव मानसिकता वाले विपक्षी अतिवादियों को छोड़ भी दो तो मोदी की व्हाट्सएप सरकार वोट के लिए क्या क्या कर सकती है उसका भान क्रिटिकल थिंकिंग/ जागरूक नागरिकों को है।
ऐसे जागरूक लोगो को अबतक सच ढूँढने में यूट्यूबर्स का सहारा रहता था। सरकार ने इस बार अल्टरनेटिव मीडिया के कुछ चैनल्स को बंद करके/नकेल कसकर यूट्यूबर्स के पेट पर लात मारी। पुराना कंक्लूज़न है की भूखे पेट भजन नहीं होते। तो विचारधारा/ विपक्ष/ इतिहास/ पत्रकारिता इत्यादि के नाम पर बने, व्यूज़ के सहारे चूल्हा चलाने वाले दर्जनों यूट्यूबर्स ने राष्ट्रवाद की आड़ में चोला बदल कर युद्ध के पक्ष में उसी सरकार के सुर में सुर मिलाये जिन्हें हरेक वीडियो में पानी पी पी कर कोसते थे।
जब देश में मेन स्ट्रीम मीडिया ने TRP के लिए युद्ध उन्माद फैलाया तो उसी राष्ट्रवाद की आड़ लेकर इनका अपनी रोज़ी रोटी बचा लेना नाजायज़ भी नहीं था। मैं कहूँगा की नागरिक इन्हें आगे भी देखें क्यूँकि ये अंधों में काने सरदार तो रहेंगे मगर यूट्यूब से मिलने वाले पैसे के सामने रीढ़ सीधी रख पाएंगे ऐसी उम्मीद ना रखें क्यूंकि सरकार जब चाहे यूट्यूब की कमायी बंद करके इनका चूल्हा बुझा सकती है।
ये देश इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी में काफ़ी आगे होने के बावजूद इनफार्मेशन सप्रेशन, इनफार्मेशन मैनीपुलेशन, इनफार्मेशन प्रोपेगंडा के डार्क ऐज में है।
(इसी मिस-इनफार्मेशन के कारण मैंने इस तथाकथित युद्ध पर एक सिंगल पोस्ट नहीं की)


