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सुख-दुख

बाबू की पेंशन गई, बेटे के पास नौकरी नहीं, मिडिल क्लास की अगली पीढ़ी गिग वर्कर बनने को मजबूर!

हेमंत कुमार झा-

अर्थव्यवस्था का स्वरूप ऐसा होता जा रहा है कि मिडिल क्लास के लोग जो आज बाबू ग्रेड की नौकरी कर रहे हैं कल उनके ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट बेरोजगार बेटे गिग वर्कर बनने की कतार में खड़े मिल सकते हैं। अब वह जमाना पीछे छूट रहा है कि बाबूजी रिटायर हुए तब भी उन्हें अच्छी खासी पेंशन मिल रही है और बेरोजगारी झेल रहा पढ़ा लिखा बेटा अपनी बेरोजगार बीवी के साथ चाय का कप हाथों में थामे सोफे पर बैठ रिमोट से टीवी के चैनल बदल रहा है।

पेंशन छीना जा चुका है और आने वाले वक्त का रिटायर आदमी एनपीएस के खोखलेपन में अपने बुढ़ापे को ही झेलने में असमर्थ होगा, बेटे बहू के लिए कितना आर्थिक सहारा बन पाएगा। पीढ़ियों के बदलाव के साथ जमीनों की जोत घट रही है, छोटे व्यवसाय संकटग्रस्त हैं। यह सब नई पीढ़ी के सामने संकट को बढ़ा रहे हैं।

वैसे भी, बाबूजी का पेंशन कितने दिन? और, कितने लोगों के बाबूजी को पेंशन वाली नौकरी? खुद की तो कमर कसनी ही होगी। लेकिन, रोजगार पैदा करने में बांझ साबित हो रही कॉर्पोरेट केंद्रित हमारी विकास प्रक्रिया और ग्रेजुएट्स को किसी काम के लायक न रहने देने को कटिबद्ध हमारे घटिया शैक्षणिक संस्थान इस तथ्य को सुनिश्चित करते हैं कि ऊर्जा से सराबोर हमारी नौजवान पीढ़ी की बहुसंख्यक आबादी गिग इकोनॉमी के शोषण की बेरहम प्रणाली का वर्कर बनने को विवश हो।

अभी पिछले साल एक रिपोर्ट आई थी कि इंदौर, भोपाल, लखनऊ, कानपुर, पटना जैसे मंझोले शहरों में प्रोफेसर, इंजीनियर, स्कूल टीचर, क्लर्क आदि के पढ़े लिखे किंतु बेरोजगार बेटे शाम चार पांच बजे के करीब चेहरे पर मास्क, माथे पर हेलमेट और हाथों में दस्ताने पहन कर अपनी दोपहिया उठाते हैं और रात को दस ग्यारह बजे तक अनवरत लॉग इन रहते जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट आदि के डिलीवरी पर्सन, कंपनी की भाषा में कहें तो डिलीवरी पार्टनर के रूप में लगातार काम कर अपने लिए जेबखर्च का जुगाड करते हैं। मास्क, हेलमेट और दस्ताने उनके लिए अपनी पहचान छुपाने के कारगर औजार साबित होते हैं और शाम के चार पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक का समय वह प्राइम टाइम है जब लोग इन कंपनियों के माध्यम से लजीज खाना, नाश्ता या अन्य घरेलू सामग्रियां मंगवाते हैं।

इस रिपोर्ट ने इस मिथ को तोड़ दिया कि ये डिलीवरी पर्सन सिर्फ लोअर या लोअर मिडिल क्लास के ही होते हैं। बेरोजगारी भीषण रूप से बढ़ती जा रही है, उपभोक्तावाद के इस दौर में खर्च हैं कि बढ़ते ही जा रहे हैं और महंगाई…? आज 31 दिसंबर, 2025 को हमने अपने कस्बे के बाजार में बैंगन को 80 रुपए प्रति किलो बिकते देखा। क्वालिटी रोजगार से महरूम इन प्रोफेसर साहबों, इंजीनियर साहबों, मास्टर साहबों, किरानी बाबुओं की दुलरुआ संतानें कब तक दुलरुआ बनी रह पाएंगी? और कोई विकल्प न हो तो जवानी की ऊर्जा और बाप की दी हुई मोटरसाइकिल डिलीवरी पर्सन बनने के काम तो आ ही सकती है।

विकसित और धनी देशों में गिग वर्कर्स की कमाई इतनी तो हो ही जाती है कि वे वे ठीक से जी लेते हैं और भविष्य के लिए भी कुछ संजो रखने में सक्षम हो लेते हैं। उन देशों की सशक्त सामाजिक सुरक्षा योजनाएं इन वर्कर्स की खूब सहायता करती हैं और उन देशों में कंपनियों का रवैया भी इन गिग वर्कर्स के प्रति अपेक्षाकृत बेहतर और जिम्मेदार होता है। वहां नागरिक अधिकार संगठन मजबूत हैं, न्याय चेतना परिष्कृत है और शोषण के बावजूद वे इतना पारिश्रमिक तो प्राप्त कर ही लेते हैं कि अपने परिवार की न्यूनतम जरूरतों के साथ न्याय कर सकें।

भारत में स्थिति बेहद खराब है। इतनी खराब है कि यहां भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय ने ही अपनी श्रम बल रिपोर्ट (PLFS 2023-24) में यह बताया है कि देश के 78 प्रतिशत कामगार महीने में 15 हजार से भी कम कमा पा रहे हैं।

जब बाजार में 80 रुपए प्रति किलो बैंगन बिक रहा हो और सड़क किनारे ठेले पर बिक रही पनियल चाय बारह रुपए में एक कप बिक रही हो,उस दौर में देश के 78 प्रतिशत कामगारों की यह मासिक आमदनी बताती है कि श्रम के बाजार में असंतुलन चरम पर है और देश की राजनीति पर कॉर्पोरेट का जैसा शिकंजा है, निकट भविष्य में हालात में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिखती।

इन कामगारों में गिग कामगारों की स्थिति सबसे बुरी है। आज के दैनिक भास्कर की रिपोर्ट बता रही है कि उनमें से बहुत डिलीवरी वर्कर रोज सोलह घंटे, सत्रह घंटे लगातार काम करते हैं तब भी महज सात, साढ़े सात सौ के करीब ही कमा पाते हैं जिसमें दो सौ ढाई सौ तो बाइक के पेट्रोल में ही लग जाते हैं। सितम यह कि चौथी पांचवीं मंजिल पर अपने ड्राइंग रूम के सोफे पर पसरा खरीदार डिलीवरी रिसीव करने अपने दरवाजे से बाहर निकलने को तैयार नहीं। उसे तो कॉल बेल बजने का इंतजार है जब कोई दरवाजे पर गरम समोसे और बिरयानी दे जाए।

कंपनियों में स्पर्द्धा है कि अगर वह पंद्रह मिनट में सामान पहुंचाएगा तो हम दस मिनट में पहुंचाएंगे। मतलब कि पहुंचाने वाला आदमी नहीं, मशीन है।

मशीन ही तो है। सुविधाभोगी उपभोक्तावाद सेवा क्षेत्र में मनुष्य को मनुष्य मानने को अब तैयार नहीं। संवेदनाएं मृत हो चुकी हैं और श्रम अधिकारों की बात करने वाला “अप्रासंगिकताओं का अरण्यरोदन” करने वाला करार दिया जा चुका है।

कंपनियों की प्रोग्रेस रिपोर्ट देखिए। वे लगातार मुनाफे का ग्राफ बढ़ाती जा रही हैं, सेवा खरीदने वालों की सुविधापरस्ती और फरमाइश बढ़ती जा रही है, उन्हें पूरा करने में कंपनियां उन खरीदारों के आगे बिछी जा रही हैं और इस आपाधापी में बहुत चीजें रौंदी जा रही हैं। ऐसी चीजें, जिनकी ओर देखने की जहमत उठाना मनुष्य से उपभोक्ता में बदल चुके मिडिल और अपर मिडिल क्लास के लोगों को मंजूर नहीं।

लेकिन, समय चक्र तेजी से बदल रहा है। अर्थव्यवस्था इस कदर कंपनियों की हित केंद्रित होती जा रही है कि नागरिक और श्रम अधिकार हाशिए पर धकियाए जा रहे हैं। हम आज उपभोक्ता श्रेणी में खुद को पा रहे हैं, कोई आवश्यक नहीं कि कल को हमारी संतानें भी आरामपसंद, सुविधाभोगी उपभोक्ता की हैसियत में ही रहें। क्वालिटी रोजगार पैदा करने में बांझ साबित हो रही हमारी अर्थव्यवस्था, क्वालिटी शिक्षा देने में विफल साबित हो रहे हमारे संस्थान, तमाम रिसोर्सेज पर कब्जा जमाने को आतुर हमारे कॉर्पोरेट प्रभुओं की जमात, मुनाफे के क्रूर खेल में मनुष्यता की बलि देने को आतुर हमारा बिजनेस क्लास और उनके कदमों में अपनी आत्मा को गिरवी रख चुकी हमारी मुख्यधारा की राजनीति…ये सब हमारी आने वाली उस युवा पीढ़ी, हमारी संतानों के अधिकारों के खिलाफ हैं जिनकी एक मुस्कान के लिए हम अपना सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं।

बीते 31 दिसंबर से 2025 को देश भर के बड़े शहरों के गिग वर्कर्स हड़ताल पर हैं। वे कंपनियों की अमानवीय कार्य संस्कृति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, अपने श्रम अधिकारों ही नहीं, अपने मानवीय अधिकारों के लिए भी आवाज उठा रहे हैं, वे हर उस प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं जो उन्हें मनुष्य के रूप में जीने नहीं दे रही और मशीनें बना कर छोड़ दे रही हैं। हमें उनकी आवाज सुननी होगी, उन पर गौर करना होगा, उन्हें नैतिक समर्थन देना होगा क्योंकि यह समर्थन सिर्फ उनके लिए ही नहीं होगा, अपनी संतानों के भविष्य के लिए भी होगा। भारत सरकार के नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 2030 तक सतत लॉग इन रहने वाले इन गिग वर्कर्स की भीड़ में लगभग चार गुने की वृद्धि होने वाली है। हम नहीं जानते कि इस बांझ इकोनॉमी में कल को हमारी संतानों के सामने कैसी विकल्पहीनता उपस्थित होने वाली है।

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2 Comments

2 Comments

  1. Nandani

    January 4, 2026 at 7:11 pm

    Sir, सच्चाई बता रहे हो। पर हमारे मन की बात उन तक क्यों नहीं पहुंचती है। ग्रेजुएशन की शर्त फॉर्म भरने मेंही मदद कर रही है, बाकी कोई मतलब नहीं है उसका। आर्ट ग्रेजुएट तो ट्यूशन के लायक भी नहीं है। खरीद कर शिक्षा लो, बदले में ठेंगा।

  2. suresh sharma

    January 5, 2026 at 10:51 am

    Bahut badiya article he is samay aam aadmi bahut Majbur he. Please mehgai par control karo Taki Garib aadmi kha sake. Aaj ke dor me paisa to Bach nahi raha Kam se Kam khana to kha sake.

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