Connect with us

Hi, what are you looking for?

दिल्ली

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव भी पहुंचे जंतर मंतर, पढ़िये उनका विश्लेषण!

राहुल देव-

कल रात रेलवे स्टेशन से सीधे जंतर मंतर गए। एक महीने से तड़प रहे थे।

११:३० से १२:३० तक लोगों की लहराती-बढ़ती भीड़ के बीच धँसना, धक्के खाना रोमांचक था। असंगठित, अपनी अलग-अलग धुन में मस्त युवाओं का एक विशाल पिकनिक जैसा माहौल। हर उम्र हर क़िस्म के लोग।

२०११-१२ के अन्ना आंदोलन में ठीक यही दृश्य देखे थे। अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने उस ऐतिहासिक शक्ति का कैसे इस्तेमाल किया, भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन को सत्ता प्राप्ति का औज़ार बना कर ध्वस्त किया यह सबने देखा है।

इस आंदोलन के नेता उसी ‘आप’ टीम का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने कुछ सीखा होगा, खुद को बदला होगा हम यही उम्मीद कर सकते हैं।

वहाँ से निकल कर घर जाते हमें ले जाने आए पांडे जी की कमेंट्री कम रोचक न थी – “सर, सरकार ने अपनी बेवक़ूफ़ी और अहंकार से यह आफ़त बुला ली है। हाल यह है कि अगर एक छोटी-मोटी दुर्घटना भी हो जाए तो आग लग जाएगी।”

सच है। रोमांचकारी अनुभव के साथ मेरे मन में भी यह डर समा गया है। थोड़ी देर में ही प्रधानमंत्री का वीडियो संदेश सुना। इतने हफ़्तों बाद युवाओं से कुछ सीधे बोले भी तो बेहद थके-चुके, निरुत्साह और ऊर्जाहीन तरीक़े से। वही प्रशासनिक ठंडक के साथ पेपर लीक पर पहली कार्रवाइयों की सूची के बाद नए फैसलों की घोषणा।

उस संक्षिप्त वीडियो में भी उनका फ़ोकस पर्चा लीक पर ही रहा। लेकिन बात उससे कहीं आगे जा चुकी है। समूची शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा, सिकुड़ते रोज़गारों और अवसरों की हताशा से उद्वेलित युवाओं में अब पूरे हालात को लेकर व्यापक और बहुआयामी आक्रोश फूट चुका है। तेज़ी से राजनीतिक रूप ले रहा है। राजनीतिक दल उसको हवा देने, भुनाने में लग गए हैं। अब आंदोलन को राजनीति से बचाना लगभग असंभव है।

मेहरबाँ ने आते-आते इतनी देर कर दी है कि आंदोलित युवाओं पर शायद ही कोई असर हो। आंदोलन तो पूरे देश में, लंदन-न्यूयॉर्क और दूसरी विदेशी जगहों पर फैलता जा रहा है।

मोदी अपने प्रिय राजनीतिक प्रबंधक प्रधान की क़ीमत चुका कर अपनी साख और ज़मीन को बचाने का कड़ा फ़ैसला कब तक टालेंगे यह देखना है। समय कम होता जा रहा है। इधर-उधर के हथकंडे अपना कर आंदोलन को कमजोर करने की गुंजाइश भी सिकुड़ती जा रही है।

आंदोलन और इसमें शामिल आम लोगों को राष्ट्र विरोधी, हिंदू विरोधी, विदेश प्रेरित-संचालित, ग़द्दार वगैरह साबित करने के लिए भाड़े के जाने-पहचाने यूट्यूबों, चापलूसों, प्रवक्ता पत्रकारों की पूरी सेना जुटा दी गई है। लेकिन अंधभक्तों को छोड़ कर ये सब बेअसर रहने वाले हैं।

सर, कुछ नया, सकारात्मक सोचिए, अहंकार छोड़ कर इन युवाओं से सच्चा और ईमानदार संवाद करना सीखिए। ये आपके स्क्रिप्टेड, मंचित, टेलीप्रांप्टर-प्रवचनों से नहीं प्रभावित होने वाले।

कुछ तस्वीरें…

Two men on a nighttime street hold a handwritten protest sign while others stand in the background amid greenery.
Female reporter holding a microphone speaks to protesters; a long colorful banner with Hindi text and images is held behind her at night, scene outdoors.
A young boy on a dimly lit street holds a yellow handwritten sign, with adults nearby in a nighttime scene.
Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन