नई दिल्ली। प्रसार भारती के ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘वेव्स’ के लिए थंबनेल और मेटाडाटा तैयार कराने में करीब 3.87 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आई है। लेकिन इस खर्च से जुड़े दस्तावेज अब कई असहज सवाल खड़े कर रहे हैं—जिस एजेंसी को काम सौंपे जाने की बात फाइलों में दर्ज है, उसके बजाय दूसरी एजेंसी ने काम कैसे किया? क्या इस काम के लिए जरूरी मंजूरियां पहले ली गई थीं? 75 लाख रुपये से ज्यादा का खर्च का अंतर कैसे आया? और सबसे अहम सवाल—काम शुरू होने और ओटीटी लॉन्च हो जाने के बावजूद वर्क ऑर्डर कहां है?
नवंबर 2024 में ‘वेव्स’ लॉन्च हुआ था। इससे पहले 3 अक्टूबर 2024 को प्रसार भारती मैनेजमेंट कमेटी ने सीबीसी से सूचीबद्ध मल्टीमीडिया एजेंसियों के जरिए चाइल्ड एसेट्स तैयार कराने को मंजूरी दी थी। इसके लिए पांच एजेंसियां चुनी गई थीं। इनमें अंकुर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड को काम का सबसे बड़ा हिस्सा मिला था। लेकिन दस्तावेजों के मुताबिक बाद में ‘विड यूनिट’ नाम की एजेंसी इस काम को करती नजर आती है, जबकि वह चुनी गई पांच मल्टीमीडिया एजेंसियों में शामिल नहीं थी।
दिलचस्प बात यह है कि विड यूनिट का नाम काम आवंटित होने के करीब आठ महीने बाद सामने आता है। जून 2025 की एक फाइल में एजेंसीवार जानकारी देते समय उसका नाम अंकुर मीडिया के साथ कोष्ठक में दर्ज किया गया। मार्च 2026 में प्रसार भारती की ओर से एजेंसियों को काम का ब्योरा देने के लिए भेजे गए ई-मेल में भी अंकुर मीडिया की जगह विड यूनिट को मेल किया गया। विड यूनिट के प्रमुख सौरभ कुमार ने जवाब में मेटाडाटा, थंबनेल, पोस्टर और इन्फोग्राफिक्स समेत चाइल्ड एसेट्स तैयार होने की पुष्टि की।
न्यूज़़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार, विड यूनिट CBC में ऑडियो-विजुअल एजेंसी के तौर पर सूचीबद्ध है, मल्टीमीडिया एजेंसी के तौर पर नहीं। वहीं, प्रसार भारती के एक वरिष्ठ अधिकारी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि एजेंसियां कई बार अपना काम सब-कॉन्ट्रैक्ट कर देती हैं। अधिकारी ने इसे नियमों के खिलाफ बताया और कहा कि आधिकारिक पत्राचार उसी एजेंसी के साथ होना चाहिए जिसे मूल रूप से काम सौंपा गया हो।
मामले में खर्च का हिसाब भी सीधा नहीं दिखता। जनवरी 2025 में करीब 5,000 टाइटल्स के लिए लागत 2.30 करोड़ रुपये आंकी गई थी। जून में यह आंकड़ा करीब 4.63 करोड़ रुपये हो गया। फरवरी 2026 की फाइल में खर्च घटकर 3.87 करोड़ रुपये बताया गया, लेकिन उसी नोट में 4.63 करोड़ रुपये के भुगतान की मंजूरी मांगी गई। वित्त विभाग की अधिकारी प्रतिष्ठा सिंह ने इस पर सवाल उठाते हुए 75.11 लाख रुपये के अंतर को रेखांकित किया। बाद में इस अंतर की वजह ‘टाइपोग्राफिकल एरर’ बताई गई।
यानी एक तरफ खर्च के आंकड़े बदलते रहे, दूसरी तरफ काम करने वाली एजेंसी को लेकर भी सवाल बने रहे। इसी बीच मामले की जांच के लिए बनाई गई कमेटी में उमा रावला को कन्वीनर बनाया गया, जबकि दस्तावेजों के मुताबिक वह इस पूरी प्रक्रिया में पहले से शामिल थीं और एक्स-पोस्ट-फैक्टो मंजूरी के लिए फाइल आगे बढ़ा चुकी थीं। प्रसार भारती के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे हितों के टकराव का मामला बताया।
और फिर आता है सबसे बुनियादी सवाल—वर्क ऑर्डर कहां है? उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक एजेंसियों से काम लिया गया, दरें तय हुईं और ‘वेव्स’ 20 नवंबर 2024 को लॉन्च भी हो गया, लेकिन किसी वर्क ऑर्डर या औपचारिक कॉन्ट्रैक्ट जारी होने का रिकॉर्ड नहीं मिला।
दस्तावेजों के अनुसार मेटाडाटा, थंबनेल और प्रोमो के लिए प्रति टाइटल 3,500 रुपये प्लस जीएसटी, एपिसोडिक सिनॉप्सिस, थंबनेल और इन्फोग्राफिक्स के लिए 1,800 रुपये और अलग-अलग भाषाओं के इन्फोग्राफिक्स व थंबनेल के लिए 1,100 रुपये प्रति टाइटल की दर तय की गई थी।
न्यूज़लॉन्ड्री ने प्रसार भारती के सीईओ गौरव द्विवेदी और ‘वेव्स’ के प्रमुख आदित्य चतुर्वेदी से पूछा कि एजेंसियों को काम देने से पहले जरूरी मंजूरियां क्यों नहीं ली गईं, खर्च में इतना अंतर कैसे आया, विड यूनिट किस आधार पर यह काम कर रही थी और अब तक वर्क ऑर्डर क्यों जारी नहीं हुआ। रिपोर्ट प्रकाशित होने तक प्रसार भारती की ओर से जवाब नहीं आया था। उमा रावला ने कहा कि वह कॉन्ट्रैक्ट पर काम करती हैं और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन करती हैं।


