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सुख-दुख

संजय दत्त पैसों के लिए बुढ़ापे में अपनी फजीहत करवा रहे हैं!

नदीम अख़्तर-

संजय दत्त फिर खलनायक साबित हुए। सरके चुनर नामक डबल मीनिंग गाना, जो नोरा फतेही के साथ फिल्माया गया है, उस पे बवाल है। सुना है पब्लिक के गुस्से के बाद नोटिस भी जारी हो गया है।

लेकिन असल सवाल ये है कि सेंसर बोर्ड ने इस गाने पर कैंची क्यों नहीं चलाई? उससे कौन जवाब मांगेगा? और संजय दत्त? उन्होंने कैसे इस गाने पे खुद को ढलने दिया? ये आदमी पैसे के लिए बुढ़ापे में अपनी फजीहत करवा रहा है। मां बाप, दोनों का नाम मिट्टी में मिला रहा है।

सुन रहा हूं कि पिद्दी और पुष्पा जैसी फिल्मों के लिए हिंदी में गाने लिखने वाला कोई रकीब नाम के आदमी ने इस गाने के हिंदी बोल लिखे हैं। लेकिन जब जूते पड़ने की नौबत आई तो कह रहा है कि मैंने नहीं लिखा। सिर्फ कन्नड़ से हिंदी में ट्रांसलेट किया है। असल कन्नड़ में यही बोल हैं।

तो भाई! अगर ऐसा है तो कर्नाटक की जनता अब तक चुप क्यों रही? क्या वहां के समाज में ये गाना स्वीकार्य हो गया था? क्या हिंदी वाले ज्यादा इंटेलीजेंट हैं?

सवाल कई हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल सेंसर बोर्ड पे है। क्या वहां मंगल ग्रह से आए लोग बैठे हैं, जिन्हें पृथ्वी की भाषा नहीं आती या फिर भ्रष्टाचार से सब संभव है? या फिर क्या मामला था वहां जो ये गाना पास हो गया।

केंद्र सरकार को इसकी तफ्तीश करनी चाहिए और कार्रवाई करनी चाहिए।

विवादित गाने से संबंधित ये खबरें भी पढ़ें…

सेक्सुअल पेनेट्रेशन की पूरी प्रक्रिया को बयां करने वाले बोल को अपनी अश्लील भाव-भंगिमाओं के जरिये नोरा फतेही ने पूरे विस्तार के साथ प्रस्तुत किया है!

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