संजय सिन्हा-
बतौर पत्रकार मैंने जीवन में एक बहुत बड़ी गलती की थी। बात तब की है जब मैंने प्रिंट मीडिया छोड़कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (ज़ी न्यूज़) में कदम रखा था। एक दिन हमारे पास एक निमंत्रण आया, किसी नई कंपनी की आयुर्वेदिक दवा के लॉन्च का। मेरे बॉस ने मुझे उसे कवर करने भेजा। वो 1999-2000 का साल था।
मैं कंपनी के प्रोडक्ट को कवर करने गया, और यहीं मुझसे चूक हो गई। कंपनी ने प्रेस को आमंत्रित किया था अपने प्रोडक्ट को प्रमोट करने के लिए। कंपनी किसी एक दवा से कैंसर का इलाज करने का दावा कर रही थी। उस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नया था, और मुझ जैसे प्रिंट मीडिया के अनुभवी पत्रकार से यह चूक हो गई कि मैंने प्रेस कांफ्रेंस में किए गए दावों को जस का तस रिकॉर्ड कर अपने नाम से रिपोर्ट बना दी।
उस समय टीवी मीडिया अपनी शुरुआत में था। सिर्फ दो ही 24 घंटे के न्यूज़ चैनल थे- ज़ी न्यूज़ और स्टार न्यूज़।
मुझे अपनी गलती का अहसास अगले दिन हुआ जब हमारे ऑफिस में फोन की बाढ़ आ गई – सैकड़ों, फिर हज़ारों कॉल्स। हर कोई रिसेप्शन पर संदेश छोड़ रहा था कि आपके रिपोर्टर संजय सिन्हा ने कैंसर की एक दवा के बारे में बताया है, कृपया उसकी विस्तार से जानकारी दें। कुछ लोगों को मेरा मोबाइल नंबर भी मिल गया था, और वे मुझसे सीधे संपर्क करने लगे।
ऑफिस में मुझे बधाइयाँ मिल रही थीं। मेरी रिपोर्ट की तारीफ हो रही थी कि संजय सिन्हा की रिपोर्ट पर इतनी ज़बरदस्त प्रतिक्रिया आई है। कुछ लोगों ने तो मुझसे यह भी कहा, ”संजय जी, कंपनी में दवा खत्म हो गई है, कृपया किसी से कहकर दिलवा दीजिए।”
मैं कंपनी का नाम नहीं लिख रहा, लेकिन मुझे पहली बार अहसास हुआ कि किसी पत्रकार के कहे या लिखे शब्दों का कितना गहरा असर हो सकता है। कंपनी अपने मकसद में कामयाब हो गई थी, और बताने की जरूरत नहीं कि वह रातों-रात सुपरहिट हो गई।
मुझे समझ आया कि इस देश में कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहे लोग टीवी पर दी गई बस एक खबर से कितनी उम्मीदें बांध लेते हैं। उस आयुर्वेदिक दवा का पूरा लॉट बिक गया।
बाद में किसी ने मुझसे पूछा, ”क्या आपने इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण देखा था? आपके पास कोई केस स्टडी थी जिससे यह साबित होता कि उस कंपनी की दवा से किसी का कैंसर ठीक हुआ?” “नहीं।”
बतौर पत्रकार, यह मेरी बहुत बड़ी चूक थी। उस दिन के बाद मैंने कभी किसी कंपनी के किसी प्रोडक्ट का प्रचार नहीं किया।
लाख प्रलोभन मिले, लेकिन जिसने खुद अपनी मां को कैंसर से मरते देखा हो, वह इतनी अवैज्ञानिक बात को अपने माध्यम से प्रचारित कैसे होने दे सकता था? यह मीडिया का दुरुपयोग था।
मुझे इस विषय पर किसी मेडिकल एक्सपर्ट से बात करनी चाहिए थी, फिर रिपोर्ट प्रसारित करनी चाहिए थी। तब लोग पत्रकारों के कहे पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते थे।
तब न्यूज़ चैनलों पर एडवर्टोरियल (पैसे देकर खरीदे गए स्लॉट) का ज़माना नहीं था। लोग सीधे-सीधे अपने प्रोडक्ट या उपलब्धियों को लेकर प्रेस कांफ्रेंस करते थे और पत्रकारों के लिए लंच, ड्रिंक और गिफ्ट की व्यवस्था करते थे।
मैं दावे से कह सकता हूँ कि मैंने सैकड़ों प्रेस कांफ्रेंस कवर किए, कभी एक भी गिफ्ट नहीं लिया, लेकिन खाना खाया और मूर्खतापूर्ण रिपोर्टिंग की – वही रिपोर्ट जो प्रेस कांफ्रेंस में परोसी गई थी।
तब मैं खुद रिपोर्टर (प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट) था। संपादक जो असाइनमेंट देते थे, उसे कवर करना पड़ता था। हालाँकि मेरी रुचि मानवीय कहानियों में थी, लेकिन राजनीतिक और बिजनेस रिपोर्टिंग भी करनी होती थी।
पर उस एक गलती ने मुझे बहुत अफसोस से भर दिया। मुझे यह बात बहुत दिनों तक कचोटती रही कि मेरे रिपोर्ट दिखाने से कितने लोगों को झूठी उम्मीदें मिल गई होंगी, जबकि मैं जानता था कि उस दवा से कोई मरीज ठीक नहीं हुआ होगा। पर जो होना था, वह हो चुका था।
आज मैं इस भूल की चर्चा क्यों कर रहा हूं?
कल मेरे परिचित और वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र सेंगर का अचानक निधन हो गया। जनसत्ता में रहते हुए मैं उनसे बहुत कम मिला था, लेकिन मैंने अपने मित्र अमरेंद्र कुमार राय से उनकी बहुत तारीफ सुनी थी। उनके निधन की खबर मुझे वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नक़वी की फेसबुक वॉल से मिली।
मैंने सोचा सत्तर साल के आसपास थे, शायद उम्र के कारण निधन हो गया।
लेकिन फिर मैंने संजय कुमार सिंह की फेसबुक वॉल पर पढ़ा कि मरने से पहले ही सेंगर जी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था कि वे देसी कंपनियों द्वारा शुगर की नकली दवा बेचे जाने का विरोध कर रहे थे। उन्होंने चेताया था कि अगर आपको डायबिटीज़ है, तो किसी झांसे में न आएं। केवल वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित अंग्रेजी दवा और इंसुलिन पर ही भरोसा करें, न कि किसी चूर्ण, कैप्सूल, अर्क आदि पर।
मैं भी यही दावा करता हूं। जो लोग डायबिटीज़ जैसी बीमारी में वैज्ञानिक इलाज को छोड़कर किसी और पद्धति पर यकीन करते हैं, वे अपने जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं।
सेंगर जी इन दिनों इसी सोशल मार्केटिंग का विरोध कर रहे थे, और उन्हें धमकियाँ और प्रलोभन मिल रहे थे। Sanjaya Kumar Singh ने उनकी उस पोस्ट का हवाला दिया है। सीधे शब्दों में कहूं तो फर्जी दवा कंपनियां उनसे पूछ रही थी -“ कितने में बिकोगे सेंगर बाबू?” और जो नहीं बिके, तो…?
बताया जाता है कि वीरेंद्र सेंगर जी बिल्कुल ठीक थे। बस अचानक उनकी मृत्यु हो गई। मैं यह नहीं कह रहा कि उनकी मृत्यु किसी षड्यंत्र का नतीजा थी। कोई भी “सडन कार्डियक अरेस्ट” से मर सकता है। पर जब कोई पत्रकार लगातार धमकियां पाता है और फिर अचानक मर जाता है, तो संदेह उठते ही हैं।
भारत में इस समय कॉर्पोरेट अपराध चरम पर है।
बड़े व्यापारी धन के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं – नकली दूध, नकली घी, नकली दवा बनाना इसी कड़ी का हिस्सा है। नकली खबरें भी उसी श्रेणी में आती हैं। आज डिजिटल मार्केटिंग के दौर में कुछ भी बेचा जा रहा है – सिर्फ झूठ।
आज अगर कोई दस लोगों से (पैसे खिला कर) यह बुलवा दे कि “मैंने यह गोली खाई और मेरी शुगर जड़ से खत्म हो गई,” तो हारा-थका मरीज उस पर यकीन कर लेता है। यहां तक कि कई देसी डॉक्टर भी अंग्रेजी दवा को चुनौती देकर अपना ज्ञान बेच रहे हैं, और पढ़े-लिखे लोग भी उन पर यकीन कर रहे हैं।
मेरे अपने मामा, जो एक आईपीएस अधिकारी थे, शुगर के कारण अपनी किडनी गंवा बैठे।
(1) क्यों?
- क्योंकि उन्होंने वैज्ञानिक इलाज छोड़कर एक बाबा की दवा और योगा पर भरोसा कर लिया था।
- याद कीजिए, कोविड के समय एक बाबा ने खुलेआम दावा किया था कि उन्होंने कोविड की दवा बना ली है।
(2) क्यों?
क्योंकि वे मीडिया संस्थानों को करोड़ों का विज्ञापन देते थे, और पत्रकार (असल में मालिक) उनके दावे के आगे बिछ गए थे। अगर कानून (सरकार) सख्त होता, तो ऐसे अवैज्ञानिक दावे करने वालों और उनके प्रचारकों को जेल होनी चाहिए थी। पर हुआ क्या? जो हुआ भी बाद में, तब तक तो घर-घर में दवा पहुंच चुकी थी।
- मैंने कम लिखा है, पर आप अधिक समझिए।
- आज अगर हम नहीं जागे, तो बहुत देर हो जाएगी।
नोट: लिखकर रख लीजिए-डायबिटीज़ का इलाज सिर्फ वैज्ञानिक दवाओं और इंसुलिन से ही संभव है। खान-पान और टहलने से आप उस पर सिर्फ नियंत्रण रख सकते हैं। बाकी सब धोखा है।


