सौरभ द्विवेदी का जालौन में निपट चुका कार्यक्रम अब भी चर्चा में है। कोई कह रहा है वो 2027 में यूपी की राजनीति में एंट्री मारने जा रहे हैं तो कोई कह रहा है सौरभ ने अपनी अब तक जुटाई ताकत का लाइब्रेरी के नाम पर प्रदर्शन किया है। किसी का कहना है सौरभ पत्रकारिता भी करेंगे, फिल्मों में काम भी करेंगे और राजनीति भी करेंगे..क्या क्या करेंगे सौरभ? जितने मुँह उतनी बातें.. बहरहाल, आप नीचे पढ़िए कौन क्या लिख रहा है-
सचिन सिंह गूर्जर-
एक साथ दो नावों की सवारी तो आपने सुना है पर सौरव द्विवेदी एक साथ तीन नावों की सवारी कर रहे हैं। फिल्म पत्रकारिता और राजनीति जहाँ भी बात जम जाये। शायद सौरव द्विवेदी 2027 में राजनीति में हाथ आजमाना चाहते हैं।
सौरभ द्विवेदी ने अपने गाँव में पुस्तकालय खोला और इसको लेकर एक मेगा इवेंट कर दिया। जहाँ बृजेश पाठक, धनंजय सिंह जैसे राजनेताओं को बुलाया तो रंगे सियार कुमार विश्वास को भी ‘फ्री’ बुला लिया। ग्लैमर का तड़का भी रखा सोनाली बेंद्रे और गिरिजा ओक को बुलाकर। अब प्रश्न ये है कि अपने गाँव में एक लाइब्रेरी खोल भी दी तो इसका इतना हल्ला गुल्ला क्यों करना?


गाँव वालों के लिए पुस्तकालय खोला था उसे पूरी दुनिया को बताने की क्या जरुरत थी? पीआर तो महत्वकांक्षा की सीढ़ी चढ़ने के लिए होता है। लल्लनटॉप से निकाले जाने के बाद सौरभ की स्थिति उहापोह वाली हो गयी है।
गौरव पाल-
पत्रकार सौरभ द्विवेदी जल्दी ही उत्तर प्रदेश की सियासत में नजर आएंगे। दल भाजपा होगा
हाल ही में लल्लनटॉप छोड कर Indian Express के हिन्दी संस्करण को जॉइन करने वाले सौरभ ने जालौन स्थित अपने गाव चमारी में एक लाइब्रेरी की स्थापना की जिसमें यूपी के उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक, कैलाश सत्यार्थी, हरिवंश नारायण सिंह, कुमार विश्वास, सोनाली बेंद्रे, जाकिर खान और डॉ. विकास दिव्यकीर्ति पहुचे थे
सौरभ द्विवेदी के परिवार के शुरुआती संबध संघ से रहे हैं, उनकी शिक्षा सरस्वती विद्या मंदिर से हुई तो उनकी सोच भी संघ से मेल खाती हैं।
गांव में एक लाइब्रेरी खोलने की आड़ में अपनी शादी की सालगिरह पर डिप्टी सीएम से मंत्री, बाहुबली नेता, महिला विरोधी स्टैंडअप कॉमेडियन ज़ाकिर खान, बालीवुड अभिनेत्रियों सोनाली बेंद्रे व गिरिजा ओक, कथावाचक कुमार विश्वास आदि का जुटान.. पावर, पहुंच और प्रभाव के फूहड़ प्रदर्शन के अलावा कुछ नहीं.. -उमेश के रे, पत्रकार
गौतम कुमार-
सौरभ द्विवेदी ने अपने गांव में एक लाइब्रेरी बनवाई और उसके उद्घाटन में देश के कई बड़े और प्रसिद्ध लोगों को बुलाया। इनमें प्रसिद्ध कोचिंग संचालक विकास दिव्यकीर्ति, कथावाचक कुमार विश्वास, कॉमेडियन जाकिर खान, अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे शामिल थे।
इन लोगों को बुलाने से बढ़िया होता कि कुछ साहित्यकारों को बुला लेते क्योंकि लाइब्रेरी का उद्घाटन करना था न कि कोई बर्थ डे बगैरह मनाना था। और नहीं तो अपने गुरु पुरूषोतम अग्रवाल को ही बुला लेते।

लक्ष्मी सरन मिश्रा-
Saurabh Dwivedi जी की लाइब्रेरी क्या सच में ये कोई क्रांतिकारी कदम है? क्या सच में इससे बुंदेलखंड में कोई बदलाव आएगा? क्या इससे युवाओं को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी? दुर्भाग्य से इसका जवाब है – नहीं..
मैंने 12 साल पब्लिक लाइब्रेरी सिस्टम में काम किया है। ब्रिटिश कौंसिल जैसी दुनिया की बेहतरीन लाइब्रेरी से लेकर म.प्र. के जिला पुस्तकालयों तक सब संभाला है। उसके आधार पर ये कह सकता हूँ कि यह केवल सांकेतिक कदम है इससे कुछ नहीं बदलेगा।
चलिए सबसे पहले बात सौरभ जी की वे हमारी पीढ़ी के बेहद निर्भीक, उत्साही और बौद्धिक व्यक्ति हैं मैं उनसे एक बार अपने सेंटर पर मिला हूँ। और मिलते ही उनका प्रशंसक बन गया था जो अब भी हूँ। इसलिए ये टिपण्णी उनके इरादों पर नहीं है मैं तो बस सबको लाइब्रेरीज की वास्तविकता बताने आया हूँ।
भारत में फिलहाल 2 तरह की लाइब्रेरीज हैं-
- लाखों बुक्स से भरी हुईं स्कूल/कॉलेज/शहरों की लाइब्रेरीज जहाँ ना तो अब कोई जाता है, ना ही कभी कोई किताब पढ़ता है। ये बस जगह घेरे हुए रद्दी के गोदाम बन गए हैं।
- रीडिंग रूम्स/प्राइवेट लाइब्रेरीज जो देश के हर छोटे-छोटे कस्बे में दर्जनों की संख्या में मौजूद हैं। जहाँ इतनी भीड़ है कि 800 से 1000 रु महीने में भी आपको बैठने की जगह ना मिले, पर यहाँ ‘किताब’ नाम की कोई चीज़ नहीं होती। ये असल में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले बच्चों के क्यूबिकल्स होते हैं जहाँ वो बिना किसी डिस्टर्बेंस के अपने नोट्स लाकर 10-12 घण्टे पढ़ सकें।
तो जहाँ लाइब्रेरीज खाली पड़ी हैं, वहीँ रीडिंग रूम्स में बैठने की जगह नहीं है। मुझे नहीं पता सौरभ जी का प्लान पूरे बुंदेलखंड में 100 लाइब्रेरीज खोलने का है या रीडिंग रूम्स खोलने का।
चलिए अब बात करते हैं जरुरत की? बुंदेलखंड और पूरे उत्तर भारत को जिस चीज़ की जरुरत है वह है – कम्युनिटी इंगेजमेंट सेंटर… जो चाय के टपरों और चौपालों की जगह ले सके। जहाँ सब लोग दिन में एकाध घंटे बैठकर बतिया सकें। जहाँ लोग मोबाइल फ़ोन से दूर होकर एक दूसरे से जुड़ें। जहाँ उन्हें गांव के सभी लोगों की खैर खबर मिल सके। जहाँ उन्हें देश दुनिया की जानकारी मिल सके। ताकि घरों में सिमटते लोग फिर से परिवार बन जाएँ।
सार- इस समय किताबें कोई नहीं पढ़ता, क्योंकि किसी को अब किताब पढ़ना ही नहीं आता। इसलिए फिलहाल जरुरत हैं उन्हें मोबाइल से बाहर निकालकर एक कम्युनिटी स्पेस पर इकठ्ठा करने की जहाँ आकर वो खुद आगे बढ़ने का रास्ता खोज लें।
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