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सुख-दुख

साईं की नगरी शिर्डी: श्रद्धा के बीच याचना और जीवन की कड़वी सच्चाइयाँ

राजशेखर पन्त-

उसके जैसे बहुतों को कल शाम यहां पहुंचने के बाद से ही देख रहा हूं, पर उसे देखने… बहुत देर तक देखते रहने का संयोग आज ही घटा है।

मैं शिर्डी में हूं, … साईं बाबा की शिर्डी। साईं बाबा -जिनकी आखों में, चेहरे पर, दया, करुणा और ममत्व का भाव, ऐसा लगता है जैसे ठहर गया हो, हमेशा… हमेशा के लिए। बहुत व्यवस्थित है साईं मंदिर परिसर, निहायत ही साफ सुथरा। अच्छा लगता है यहां आना, ठहरना।

विपत्ति, दुख और विपरीत परिस्थितियों का बाहुल्य एक सीमा के बाद मनुष्य को याचक बना देता है। याचना यूं भी एक सहज मानव स्वभाव है शायद। ईश्वर ने सब कुछ दिया है मुझे। पर यहां मैं एक याचक बन कर ही तो आया हूं।  ईश्वर की कृपा, उसके आशीष की निरंतरता की याचना निश्चित रूप से तब भी बनी रहती है जब आप एक ठीक ठाक जिंदगी जी रहे होते हैं। पर दुर्भाग्य की निरंतरता, प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष की शक्ति का चुक जाना, याचना के स्वरूप को, उसके केंद्र को ही परिवर्तित कर देता है। वह ईश्वर से हट कर मनुष्य पर केंद्रित होने लगता है।

शायद इसलिए क्योँकि मनुष्य ईश्वर या किसी पराशक्ति की तरह कथित रूप से अचिन्त्य और अनिवर्चनीय नहीं है। करुणाजन्य सहयोग और सहायता के तत्काल मिलने की संभावना तब याचक को ईश्वर से अधिक अपने जैसे इंसान में प्रतीत होने लगती है। पर ऐसा होता है क्या?

कल शाम से ही देख रहा हूं, उन छोटे छोटे लड़के लड़कियों को जो किसी लाचार से वृद्ध का हाथ थामे हुए भीख मांग रहे हैं। अत्यंत वृद्ध, कृशकाय स्त्रियां साफ सुथरे रास्तों के किनारे बैठ कर पांच-दस रुपये में बाबा की तस्वीर या लाल गुलाब का गुच्छा खरीद लेने या चंदन का टीका लगवा लेने की गुहार लगा रहीं हैं। कोई अंधा या अपाहिज एक ग्लास चाय पिलवा देने की याचना कर रहा है, जिसकी कीमत यहां सिर्फ दो रुपये है। एक बच्चा हाथों में बाबा के छोटे से ब्लैक एंड व्हाइट पोर्ट्रेट्स लिए उन्हें खरीद लेने की ज़िद कर रहा है। उसे इस बिक्री के पैसों से स्कूल के लिए नोट बुक खरीदनी है। सुबह दर्शन के बाद लौटते वक्त वह फिर मिल जाता है। ले लो ना अंकल, एक ही ले लो…उसके स्वर में याचना से अधिक झुंझलाहट है, जैसे कहना चाह रहा हो -इतना दिया है तुम्हें भगवान ने, क्या एक तस्वीर नहीं खरीद सकते? उसे अपने साथ किताबों की दुकान पर ले जा कर मैं दो नोटबुक दिलवा देता हूं। उस दुकान में बहुत सी बूढ़ी, फटेहाल महिलाएं इकट्ठी हो जाती हैं। उन्हें शिकायत है कि मैंने बच्चे को तो नोटबुक दिलवा दी पर उन्हें कुछ नहीं दिया। मुझे चेख़व की कहानी द बैगर का लशकोफ याद आ जाता है।

सरगई और ओल्गा ने अपनी सदाशयता से उसका जीवन बदल दिया था। स्वयं में सरगई और ओल्गा का अक्स तलाशते हुए मैं शायद खुद को एक उद्धारक सिद्ध करना चाह रहा हूं। लशकोफ को घटिया, शराबी और धोखेबाज़ मानना सरगई और वोल्गा के बेहतर इंसान होने की पहली शर्त है।

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पर आज शाम मैंने अपने पैरों को बाँस के एक डंडे के सहारे घसीटते हुए एक विकलांग (शायद दिव्यांग कहते हैं उसे आजकल) को देखा, द्वारिका माई के सामने। किसी से कुछ नहीं मांग रहा था वह। उसकी आँखों में एक अंदर तक कचोटने वाली वेदना थी। गीता द्वारिका माई के अंदर दर्शन करने गयी थी। द्वारिका माई -जहाँ साईं बाबा ने जीवन गुजारा था, न जाने कितनों का दुख, संताप हरा था। मैं बाहर उसका हैंडबैग और मोबाइल थामे उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने अपनी जेबें टटोलीं, पांच-पांच सौ के तीन नोट थे। पांच सौ रुपये भीख में देने के लिए मैं स्वयं को तैयार नहीं कर सका। गीता के पास भी छोटे नोट नहीं थे। किस किस को दोगे पैसे, बहुत हैं यहां… वह झुंझलाते हुए बोली और सामने एक दुकान की ओर बढ़ गयी। 

एक खूबसूरत सा कश्मीरी शॉल लेना था हमें, कल सुबह आरती के वक्त बाबा से ब्लैस कराने के लिए।

ठीक ही कह रही थी गीता- बहुत हैं यहाँ… वहाँ, शायद सब जगह।

संपर्क- बद्री भवन, साकेत, भीमताल 263136- [email protected] – 9412100304

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