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साहित्य

बुद्ध नहीं, आत्मा की यात्रा है ‘सिद्धार्थ’

राम धनी द्विवेदी-

ज्ञान की तलाश में ‘सिद्धार्थ’

1942 में साहित्‍य के नोबेल सम्‍मान से सम्‍मानित हरमन हेस के उपन्‍यास ‘सिद्धार्थ’ की चर्चा सुनी तो पढ़ने का मन किया। यह उपन्‍यास 1922 में मूलत: जर्मन में लिखा गया था। बाद में अंग्रेजी में 1952 में अमेरिका में प्रकाशित हुआ। अब तो हिंदी में अनुवाद भी हो गया है। मैंने ऑनलाइन सर्च किया तो अमेजन नाउ 10 मिनट में उपलब्‍ध कराने का दावा करने लगा। मैंने आर्डर कर दिया और सचमुच में दस मिनट में किताब मिल भी गई। अमेजन ने यह नई सेवा शुरू की है। बाद में बेटी ने बताया कि उसके पास हिंदी अनुवाद भी है। खैर मैंने पहले थोड़ा अंग्रेजी में फिर हिंदी में पढ़ा। बीच-बीच में अंग्रेजी भी देख लेता था, अनुवाद के मूल भाव को समझने के लिए।

बहुत ही छोटा उपन्‍यास है, लगभग डेढ़ सौ पेज का। इसे हेस ने दो भागों में बांटा है और दोनों में मिलाकर 12 अध्‍याय हैं। पहले में चार और दूसरे में आठ। अंग्रेजी वाली में दोनों भागों को अलग-अलग लोगों को समर्पित किया गया है। हिंदी अनुवाद जो मैंने पढ़ा, उसमें यह समर्पण नहीं है। दोनों में कवर पेज पर गौतम बुद्ध का चित्र लगाया गया है जिससे भ्रम होता है कि कहीं यह बुद्ध पर लिखा उपन्‍यास तो नहीं है। बुद्ध इसमें हैं तो लेकिन बस संदर्भ मात्र में। उनके प्रवचन और उपदेश का उल्‍लेख है और महापरिनिर्वाण की भी चर्चा है। बस इतना ही। जर्मन में जो मूल उपन्‍यास छपा है, उसके कवर पर किसी तरह का कोई चित्र नहीं है।

यह उपन्‍यास एक ब्राह्मण युवक सिद्धार्थ की आध्‍यात्मिक यात्रा पर केंद्रित है। इस यात्रा में वह अकेला नहीं अपितु उसका बचपन का साथी गोविंद भी है। दोनों सत्‍य और ईश्‍वर की खेाज में रहते हैं। घर त्‍याग कर वे श्रमणों के साथ हो जाते हैं। लेकिन तीन साल बीत जाने पर भी उन्‍हें कोई ज्ञान नहीं प्राप्‍त होता तो वे श्रमणों का साथ त्‍याग देते हैं। इसी समय बुद्ध का प्रवेश होता है और वे उनका उपदेश सुनने जाते हैं। सिद्धार्थ का मित्र गोविंद बुद्ध के उपदेश से प्रभावित होता है और उनका शिष्‍य बन जाता है और श्रमणों में शामिल हो जाता है। सि़द्धार्थ बुद्ध से तर्क करता है। उनका शिष्‍य नहीं बनता और खुद ज्ञान की तलाश में रहता है।

इसलिए भी कि तथागत भी तो ‘अपने दीपक खुद बनने’ की सलाह देते हैं। इस बीच उसके जीवन में कई तरह‍ के उतार-चढ़ाव आते हैं जो खुद उसके बनाये होते हैं। वह एक रूपजीवा के प्रेम में पड़ता है, एक सेठ के यहां काम करता है, व्‍यापारिक कार्य में दक्ष हो जाता है। अचानक एक दिन उसे इस जीवन से वितृष्‍णा होती है और वह सब कुछ छोड़ कर निकल जाता है। वह उस मल्‍लाह के पास जाता है जिसने एक बार उसे नदी पार कराया था लेकिन जिसे उस समय वह उतराई नहीं दे पाया था। दोनों साथ रहने लगते हैं। सिद्धार्थ मल्‍लाह का जीवन जीने लगता है। पूरे उपन्‍यास का सार इस मल्‍लाह से हुई बातचीत है।

सिद्धार्थ पाता है कि वासुदेव नाम का यह मल्‍लाह कितने ही ज्ञानियों से अधिक ज्ञानी है क्‍यों कि वह नदी की आवाज सुनना जानता है। नदी उससे बात करती है। वह नदी की विभिन्‍न आवाजों को बहुत ही शांति से सुनता है और उसके मर्म को समझता है। वास्‍तव में यह नदी स्‍थूल नदी तो है ही लोगों के मन में बहने वाली नदी भी है। लोग जिस तरह धरती पर बहती नदी की आवाज नहीं सुनते और सुनते हैं तो समझते नहीं, ठीक उसी प्रकार वे अपने मन की आवाज भी नहीं सुनते। लेकिन वासुदेव ने सिद्धार्थ को नदी रूपी मन की आवाज सुनने की कला सिखाई जिससे उसे ज्ञान प्राप्‍त हुआ।

पूरे उपन्‍यास में नदी का प्रसंग अद्भुत है। सिद्धार्थ ने नदी से सीखा ‘सुनना, शांत चित्‍त से, एकाग्र हो कर, प्रतीक्षा करते हुए, खुलेमन से, बिना किसी आवेग के, बिना किसी इच्‍छा के, किसी तरह का निर्णय दिए बिना, बिना कोई धारणा बनाए।‘ सिद्धार्थ का मानना है कि ‘उस वस्‍तु को जानना चाहिए जिसका जानना अनिवार्य हो।‘ वह कहता है ‘प्रज्ञा का हस्‍तांतरण संभव नहीं। ऐसी प्रज्ञा जिसे कोई प्रबुद्ध व्‍यक्ति किसी और को हस्‍तांतरित करने का प्रयत्‍न करता है, सदा मूर्खतापूर्ण वस्‍तु जैसी प्रतीत होती है। ज्ञान तो दूसरों तक पहुंचाया जा सकता है, प्रज्ञा नहीं।‘

सिद्धार्थ का मानना है कि ‘प्रत्‍येक सत्‍य का विलोम भी उतना ही सत्‍य होता है। ऐसी सभी बातें जिनको सोचा जा सकता है, शब्‍दों में कहा जा सकता है, एक पक्षीय होती हैं। सब आधा है। सबमें पूर्णता का अभाव है।‘ इसी से वह गुरुओं की बातों पर अविश्‍वास करता है। बुद्ध से तर्क वितर्क करता है। उसका साथी श्रमण बन जाता है, लेकिन वह नहीं बनता। वह तो कहता है कि निर्वाण जैसी भी कोई चीज नहीं होती। यह मात्र शब्‍द है।

उपन्‍यास का हिंदी अनुवाद सामान्‍य है। पहला अध्‍याय थोड़ा उबाऊ लगता है। हो सकता है, बहुत लोग इसे पढ़ने के बाद आगे पढ़ने का मन न बनाएं। यह हिंदी और अंग्रेजी दोनों रूपों में है। लेकिन जब थोड़ा आगे बढ़ते हैं तो उपन्‍यास रुचिकर होने लगता है। कुछ बातें भारतीय परिवेश से मेल नहीं खातीं। जैसे पहली बार वासुदेव से मिलने के बाद और उसके घर में रुकने के बाद सिद्धार्थ उसे शुल्क देना चाहता है। वह तो अतिथि के रूप में रुका था। अतिथि से शुल्‍क लेने की भारतीय पंरपरा नहीं है, उपहार में भले ही कुछ ले लिया जाए।

उपन्‍यास जर्मन से अंग्रेजी और फिर अंग्रेजी से हिंदी में होने के कारण कई जगह शब्‍दों का चयन उचित नहीं हुआ। जैसे भारत में किसी नदी का पानी हरा नहीं होता, वह साफ या नीला हो सकता है। इसी तरह स्‍टोव को अंगीठी लिखना भी उचित नहीं। हम बुद्ध के समय की बात लिख रहे हैं, चूल्‍हा लिखा जाना चाहिए था। इसी तरह वासुदेव की झोपड़ी में जहां बकरी रहती है, उसे अस्‍तबल लिखने का क्‍या तुक है। दुनिया जानती है कि अस्‍तबल में घोड़े रहते हैं। हालांकि अंग्रेजी में ‘स्‍टबल’ ही लिखा गया है।

हिंदी अनुवाद मदन सोनी ने किया है जिसे मंजुल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। अंग्रेजी वाली मुझे प्रकाश बुक्‍स से इसी साल प्रकाशित पुस्‍तक मिली। कई अन्‍य प्रकाशकों ने भी इसे प्रकाशित किया है। हिंदी में अन्‍य लोगों ने भी इसका अनुवाद किया है। एक अनुवाद डा प्रभाकरन हेब्‍बार इल्‍लत ने किया है। कहते हैं, यह बेहतर अनुवाद है। कुछ लोग हरमन हेस को हेरमन हेस्‍से भी लिखते हैं। केरल के तेल्लिचेरी में हरमन हेस सोसायटी ऑफ इंडिया नामक एनजीओ है जो हेस की रचनाओं के अनुवाद का काम कर रहा है। यहीं हेस के नाना हरमन गंटर्ड रहते थे और यहीं उनकी मां का जन्‍म हुआ था।

हरमन गंडर्ट ईसाई धर्म प्रचारक और विद्वान थे। उनसे हरमन बहुत प्रभावित थे और उनकी लाइब्रेरी में पढ़ कर उन्‍होंने अपने को समृद्ध किया। इस सोसायटी का लक्ष्‍य हरमन हेस की रचनाओं से दुनिया को परिचित कराना है। इसी से यह विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में उनका अनुवाद करा रही है।

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