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सियासत

कुछ लोगों को मोदी विरोध और देश विरोध में अंतर समझ नहीं आ रहा!

अजीत कुमार पांडेय-

देश में कुछ लोगों को मोदी विरोध और देश विरोध में अंतर ही समझ नहीं आ रहा है..उनको लगता है कि पहलगाम हमले के बाद आतंकवाद पर हो रही भारतीय नभ,थल सैनिकों की प्रतिक्रिया वाले समय में अगर वो देश के साथ खड़े हो गए तो मोदी के साथ खड़े हो जाएंगे..सरकार से सवाल करने और नफरत करने में अंतर है…!!



अशोक कुमार पांडेय-

एक सामान्य सा नियम है अलिखित सारी दुनिया में। युद्ध जैसे हालात में देश और सरकार के साथ खड़े होना।

सरकार से सौ शिकायतें हो सकती हैं आपकी लेकिन जंग के हालात में आपकी सुरक्षा सरकार को ही करनी है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों से लेकर जंग के मैदान के फ़ैसले सरकार को ही करने हैं और फ़ैसले जो भी हों आप उसमें शामिल होने ही हैं।

मैं रक्षा मामलों के बारे में कुछ नहीं जानता। ब्लैक आउट के बारे में दूसरे विश्वयुद्ध के इतिहास और संस्मरणों में पढ़ा है, शानी की ‘युद्ध’ जैसी कहानी में पढ़ा है। 1971 के बाद इस देश ने युद्ध नहीं देखा है, कारगिल की लड़ाई उसी इलाक़े में हुई थी, बाक़ी देश में इसका वैसा असर नहीं हुआ। हम नहीं जानते युद्ध कैसा होता है, इतिहास बताता है कि भयावह होता है।

तो आज अगर सरकार कह रही है कि ब्लैक आउट की प्रैक्टिस कर लीजिए, मॉक ड्रिल कर लीजिए तो मैं बिना सवाल इन निर्देशों का पालन करूंगा।

युद्ध होना है, नहीं होना है, कैसा होना है यह सब सरकार को तय करना है। विपक्ष के नेता ने भी इन हालात में सरकार के साथ खड़े होने की बात की है। अगर कल ज़रूरत पड़ी तो सिविल डिफेंस जैसी पहल में शामिल होने में मुझे गर्व होगा।

यह मैं अपने लिए कह रहा हूँ, आप अपने लिए निर्णय करने को आज़ाद हैं। यह मेरा देश है, मैं यहीं पैदा हुआ हूँ और यहीं मर जाऊँगा।

यह मेरा देश है और मेरी क़िस्मत इससे जुड़ी हुई है। सत्ताएं आएंगी, जाएंगी। देश रहेगा। सत्ता का विरोध करना मेरा लोकतान्त्रिक हक़ है और देश के साथ खड़ा होना मेरा नागरिक फ़र्ज़ है।

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