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साहित्य

दिल्ली के मालचा महल और विलायत महल का रोचक किस्सा है अभिमन्यु की किताब ‘द हाउस ऑफ अवध’

किताब के लेखक अभिमन्यु

लक्ष्मण सिंह देव-

१९९२ में जब मैं किशोर था तो मैंने नवभारत टाइम्स में एक खबर पढ़ी थी जिसमें लिखा था कि दिल्ली का मालचा महल है जो जंगलों के बीच है उसमें एक शाही परिवार रहता है जिसमें एक महिला है जिसका नाम विलायत महल है और वो दो बच्चों और करीब एक दर्जन नौकरों के साथ और कुत्तों के साथ रहती है और वो किसी से भी मिलना पसंद नहीं करती और वो सिर्फ विदेशी पत्रकारों से मिलना पसंद करती है और उस महिला ने बताया कि मैं अवध के राजवंश की उत्तराधिकारी हूँ।

इस कहानी की शुरुआत तब हुई जब इस महिला ने बताया कि मैं अवध के भूतपूर्व नवाब परिवार वाजिद अली शाह की उत्तराधिकारी हूँ और हमें रहने के लिए कोई महल दिया जाना चाहिए और इस मांग को लेकर उसने उन्नीस सौ पचहत्तर में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी गेस्ट रूम में धरना देना शुरू किया।

उसके बाद वो धरना दस साल तक चलता रहा और विलायत महल ने अपनी मांग रखी कि उसे रहने के लिए एक महल दिया जाए। सरकार ने उसकी बातों पर ध्यान दिया और उसे कई विकल्प दिए, जैसे कि दिल्ली में एक डुप्लेक्स फ्लैट देने की पेशकश की। लेकिन जब सरकार ने विलायत महल की पृष्ठभूमि की जांच करने की कोशिश की, तो लखनऊ में अवध के शाही परिवार के लोगों से संपर्क किया गया, जिन्होंने विलायत महल के दावे को खारिज कर दिया।

बाद में पता चला कि विलायत महल का परिवार मूल रूप से कश्मीरी था और उसका पति लखनऊ विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार के पद पर था। इसके बावजूद, सरकार ने विलायत महल को मालचा महल आवंटित कर दिया, जो 14वीं शताब्दी में फिरोज शाह तुगलक द्वारा बनाई गई एक शिकारगाह थी और दिल्ली के रिज क्षेत्र में जंगलों के बीच स्थित है। विलायत महल और उसका परिवार वहाँ रहने लगे, लेकिन वहाँ न तो बिजली का कनेक्शन था और न ही पानी का कनेक्शन था।

उन्नीस सौ चौरानवे में बेगम विलायत महल ने आत्महत्या कर ली, ऐसा माना जाता है कि उन्होंने हीरों को पीसकर, खाकर अपनी जान दे दी। उनकी उम्र उस समय बासठ साल थी। अपनी माता की मृत्यु के बाद करीब दस दिन तक साइरस और बहन सकीना उसकी लाश से लिपट कर सोते थे। उनकी बेटी सकीना जिसकी मृत्यु भी कुछ सालों बाद हो गई। उनका एक छोटा भाई भी था, जिसका नाम शहजादा साइरस था। ये लोग किसी से मिलते-जुलते नहीं थे और बताते थे कि वे अवध के शाही परिवार से हैं।

वे बार-बार यही कहते थे कि नई व्यवस्था, यानी लोकतंत्र ने उन्हें बर्बाद कर दिया। उनका व्यवहार बहुत अजीब था। इनके कई नौकर थे और बहुत सारे शिकारी कुत्ते पाल रखे थे और जो भी महल में घुसने की कोशिश करता उस पर कुत्ते छोड़ देते थे।

अभिमन्यु कुमार (Abhimanyu Kumar), जो जेएनयू में स्पैनिश भाषा में मेरे जूनियर रहे हैं, इस पर एक किताब लिखी है जिसका नाम है “हाउस ऑफ अवध”। इस किताब में बताया गया है कि कई लोगों ने, जिनमें न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार एलन बेरी भी शामिल थे, इस परिवार के इतिहास की जांच की और दावा किया कि वे धोखेबाज थे। हालांकि, अभिमन्यु ने अपनी किताब में एक साल के रिसर्च के बाद और कश्मीर जाकर उनके परिचितों से बात करने के बाद पता लगाया कि वास्तव में इन लोगों का अवध के शाही परिवार से संबंध था, जो शायद शियाओं में होने वाले अस्थाई विवाह के माध्यम से था। जब अभिमन्यु लखनऊ आया इसी के बारे में शोध के सिलसिले में तो हमारी भी इस मुद्दे पर काफी बात हुई।

अभिमन्यु की इस किताब में बताया गया है कि कैसे आजादी के बाद कई परिवारों की संपत्ति छीन ली गई और वे लोग मानसिक रूप से असंतुलित हो गए। विलायत महल और उनके परिवार की कहानी भी ऐसी ही है, जिन्होंने महल में रहने की जिद पकड़ ली और आम लोगों से मिलने से इनकार कर दिया है। यह किताब एक दिलचस्प और अजीबोगरीब किस्सा है जो बताता है कि कैसे कुछ लोग अपनी जिद और अहम के कारण अपने जीवन को मुश्किल बना लेते हैं।

२०१७ में शहजादा साइरस अकेला रहता था इस महल में उसकी भी मृत्यु हो गई। अभिमन्यु ने कश्मीर, लखनऊ, और दिल्ली में उनके नौकरों, परिचितों और रिश्तेदारों को ढूंढ निकाला और साबित किया कि संभवत यह परिवार वाजिद अली शाह या उनके किसी वंशज के मुताह (शियाओं में होने वाला अस्थाई विवाह) का परिणाम हो सकता है।। ऐसी खोजपूर्ण किताब लिखने के लिए हार्दिक बधाई वीर अभिमन्यु

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