
दया शंकर शुक्ल सागर-
एक पुरानी कहावत है एक समझदार दुश्मन, एक मूर्ख दोस्त से ज्यादा बेहतर है। लेकिन भारत के साथ दिक्कत ये है कि उसके दोस्त और दुश्मन दोनों महामूर्ख हैं। भारत के कथित दोस्त ट्रंप के नए ट्वीट ने कश्मीर मसले से मध्यस्था की पेशकश कर के भारत सरकार को मुश्किल में डाल दिया है। कश्मीर मसले पर ‘कोई तीसरा देश नहीं चाहिए’ ये भारत का बहुत पुराना, समझदारी भरा और मजबूत स्टैंड है।
शिमला समझौते में यह बात पत्थर की लकीर की तरह लिख दी गई थी। देश के किसी राजनेता की यह हिम्मत नहीं कि वह इस स्टैंड से पीछे हटे। आप देखेंगे मोदीजी भी दो टूक शब्दों में इससे इंकार कर देंगे क्योंकि वर्तमान सरकार का भी इस मसले पर यही स्टैंड है। लेकिन जोकर ट्रंप का कोई क्या ही करे?
पहले बचकाने तरह से सीजफायर की ऐलान और अब ये ‘हजार साल ‘ पुराना कश्मीर विवाद से जुड़ी पेशकश। दोस्त बनके ये बंदा न जाने कौन सी दुश्मनी निकाल रहा है। चलो पड़ोसी तो हम नहीं चुन सकते हैं न पड़ोसी को बदल सकते हैं लेकिन दोस्त का चुनाव तो हमारे हाथ में है। तो समझदार के लिए ये इशारा काफी होना चाहिए।
क्या पाकिस्तान ने चीन की मदद से फ्रांस के चर्चित फाइटर जेट राफेल को भारत की सीमा के अंदर ही मार गिराया था?
भारतीय वायुसेना सभी से अटकलों और असत्यापित सूचनाओं के प्रसार से बचने का आग्रह करते हुए ट्वीट किया है कि, “…चूंकि ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी है, इसलिए समय आने पर विस्तृत ब्रीफिंग की जाएगी। “

‘द टेलीग्राफ’ में आज छपा यह लेख देश के हर नागरिक के लिए चिंताजनक है। इसका दावा है कि भारतीय वायु सेना कभी भी सीमा पार नहीं कर पाई। क्योकि वे जानते थे कि आगे क्या इंतजार कर रहा है।
मेरी समझ से ये आपरेशन सिंदूर तब तक जारी रहना चाहिए था जब तक भारत सरकार चुन-चुन कर एक-एक आतंकी को मारने का अपना वादा पूरा नहीं करती। इसमें एक साल लगे या पचास साल। पाकिस्तान या तो अपने सभी आतंकियों को भारत के हवाले करे या हर साल, हर महीने, हर घंटे, हर लमहे भारत की फौज के हमले की आशंकाओं के आतंक के साए में अपना देश चलाए। उजड़ी हुई मांगों के लाल सिंदूर का बदला तभी पूरा होता। लेकिन क्रूर राजनीति की बंजर जमीन पर ऐसी भावुकता भरी बातें बेमानी हैं।
खैर आप माने न माने असल विश्वगुरू की भूमिका में तो डोनाल्ड ट्रंप हैं। कल सारी लंबी रात वे भारत और पाकिस्तान को मनाते रहे। हालांकि वे जानते थे कि दोनों उनकी बात मानने को तैयार बैठे हैं। और बेहद नाटकीय ढंग से युद्ध विराम का एलान भारत और पाकिस्तान से पहले ही अमेरिका ने कर दिया। सच पूछिए तो पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमले का ये सबसे सही व सटीक वक्त नहीं था। लेकिन विपक्ष के सेंकेंड लाइन के नेताओं और भारतीय मीडिया ने देश में युद्धोन्माद का ऐसा वातावरण तैयार किया कि सरकार को भी लगा अब कुछ कर के दिखा देना चाहिए।
युद्ध से जुड़ी तमाम किताबों में पलटवार के दो सटीक तरीके लिखे हैं। एक हमले के तुरंत बाद, त्वरित जवाबी हमला करना ताकि दुश्मन को कुछ सोचने समझने का मौका ही न मिले। दूसरा तरीका है बगुले की तरह पूरे धैर्य के साथ घात लगा कर बैठना और दुश्मन जब बिलकुल बेफिक्र हो, उस पर पूरी ताकत के साथ हमला कर उसे मिटा देना। सात मई के हमले में इन दोनों विकल्पों को अनदेखा किया गया।
नौ आतंकी ठिकाने के ढांचे जरूर तबाह हो गए लेकिन सारे आतंकी बच निकले क्योंकि उन्होंने वे ठिकाने बहुत पहले ही छोड़ दिए थे। मैंने सीएनएन न्यूज में मुरीदके का एक फुटेज देखा जिसमें हमले में घायल हाथ में प्लास्टर बांधे एक लड़का एक लोकल रिपोर्टर को बेहद मासूमियत से बाइट दे रहा था कि हम सबको मालूम था कि यहां हमला होगा। क्योंकि यहां जेहादी ट्रेनिंग होती है।
इस मरकज यानी केन्द्र में पहले ही सबकी छुट्टी कर दी गई थी। सबको वहां से हटा दिया गया था। कुछ आतंकी, जो कुछ ज्यादा ही बेफिक्र व बेपरवाह थे, जिन्हें लगा भारत कुछ नहीं करेगा, वे गफ़लत में मारे गए। मरने वालों में पांच कथित बड़े आतंकियों के नाम बड़े प्रयोजित ढंग से मीडिया के जरिए सामने लाए जा रहे हैं। इसमें सच्चाई कितनी है खुदा जाने। बाद में उनके ताबूतों को पूरे राजकीय सम्मान से जमीदोज किया गया। आज देश को इंदिरा गांधी की याद आ रही है जिसने अमेरिका को ठेंगा दिखा कर पाक को ऐसा सबक सिखाया कि वह आज तक नहीं भूल पाया।


