हेमंत शर्मा-
‘What India Thinks Today’ (WITT) केवल एक कॉन्क्लेव नहीं, बल्कि विचारों का वह बड़ा मंच है जहाँ भारत खुद को सुनता है. यह टीवी9 नेटवर्क का सबसे बड़ा वैचारिक मेला है. यहाँ अलग-अलग सोच, अलग-अलग विचार और अलग-अलग आवाज़ें मिलती हैं. और फिर बनती है चौतरफा शोर के बीच संवाद की जगह, कहने-सुनने की गुंजाइश. विचार फूटते हैं. बातें निकलती हैं और संवाद हासिल होता है. क्योंकि किसी भी देश की सोच ही उसकी दिशा और भविष्य को तय करती है. और जब सोच के लिए असहमत होने और अलग होने की गुंजाइश हो, तो पैदा होती है समता, बनता है लोकतंत्र और देश आगे बढ़ता है.
इस दफ़ा भी इसी सोच के साथ मंच सजा. आज जब दुनिया अनिश्चितताओं से घिरी है, देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी आए और संसद के बाद पहली बार यहीं से वैश्विक संकट पर भारत का पक्ष रखा. उन्होंने साफ कहा, “कि हमारा पक्ष सिर्फ भारत का पक्ष है. आज भारत, सिर्फ़ भारत के साथ खड़ा है”. और यही इस कॉन्क्लेव की धुरी बन गया.
दुनिया के तनाव भी यहाँ संवाद में बदले. टीवी-9 का इकलौता मंच रहा जहॉं इज़राइल के राजदूत की आवाज़ भी सुनाई दी और ईरान के सर्वोच्च नेता के एम्बेसडर भी आए. युद्ध की छाया से दूर, दोनों ने इस मंच से अपने हिस्से के विनाश और विमर्श का सच सुनाया.
जो नाम हर भारतीय की धड़कन में गूंज रहे हैं वो भी यहीं थे. विश्व विजेता भारतीय टीम के हीरो अक्षर पटेल, अर्शदीप सिंह, महिला क्रिकेट विश्वकप की ‘प्लेयर ऑफ टूर्नामेंट’ दीप्ति शर्मा और प्रतिका रावल जैसे चैम्पियन अपनी विश्व विजय की कहानी लेकर आए. और वो दादा—सौरव गांगुली—जिन्होंने टीम इंडिया को सिर उठाकर चलना सिखाया, उन्होंने यादें भी जगाईं और इसी मंच पर बल्ले से चौके-छक्के भी लगाए.
धर्म की उलझन को महा कवि कुमार विश्वास ने सुलझाया. स्वामी रामदेव ने योग और युद्ध के संयोग को शब्दों और शीर्षासन दोनों से समझाया. राजनीति में घटते करुण रस और बढ़ते वीर रस पर भी चिंतन हुआ. अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी और स्मृति ईरानी राजनीतिक चिंतन की धुरी पर थे. दक्षिण का उत्तर सुनाया रेवंत रेड्डी और डीके शिवकुमार ने. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के विचारों की नर्मदा और भगवंत मान के शब्दों की सतलुज का प्रवाह देखने को मिला. साहित्य देश के विचार की आधारशिला होता है. फिल्मों में शब्दों के बदलते स्वरूप पर समीर अंजान, नीलेश मिश्रा, यतीन्द्र मिश्र और आलोक श्रीवास्तव का वैचारिक मंथन भी हुआ.
दो दिन तक चला यह सम्मेलन सिर्फ़ आयोजन नहीं था, एक जिम्मेदारी थी. जिम्मेदारी, भारत की सोच को अवसर और मंच देने की, उसे समझने की, और उसी से सूझ बनाकर भविष्य गढ़ने की. क्योंकि भारत आज जो सोचता है, वही कल को आकार देता है, भविष्य को आधार देता है, अगली पीढ़ी को अवतार देता है. आयोजन पूरा हुआ, सफल रहा और अपना परचम लहराकर संपन्न हुआ. इसलिए थकान से ज्यादा संतुष्टि है, विदाइयों से ज्यादा दिख रहा है भविष्य का भारत और शांत हो चुके कोलाहल में भी गूँज रहे हैं उद्देश्य गढ़ते शब्द, दिशा देते वाक्य, अनुमोदन करती ध्वनियां.
कुछ छवियां आप सबसे साझा कर रहा हूं. जय जय.








