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उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के सदस्यों के वेतन भत्ते मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को चेताया

त्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के सदस्य राजेंद्र सिंह द्वारा दिनांक 30 सितंबर 2021 को एक पत्र माननीय सर्वोच्च न्यायालय को, इस आशय का भेजा गया कि राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्यों का वेतन जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष से बहुत कम है जबकि राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्य जिला जज सुपर टाइम स्केल के अधिकारी हैं और उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा इनको उत्तर प्रदेश सरकार के विशेष सचिव का न्यूनतम वेतन अर्थात 1,31,100.00 रुपए और इसमें से पेंशन को घटाते हुए निश्चित किया गया जबकि सुपर टाइम के जिला जज का वेतन 2,16,500.00 या इससे ऊपर है। इस नियम से राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्य मात्र 22,000.00 रुपए वेतन पाएंगे जबकि जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष लगभग 90,000.00 रुपए वेतन पाएंगे।

यूपी राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्यों को 09 अगस्त 2019 को राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग उत्तर प्रदेश द्वारा विज्ञापन संख्या 32/ एस.सी.डी. आर. सी. / अधि. 42 /19 द्वारा प्रेस विज्ञप्ति निर्गत की गयी कि राज्य आयोग के न्यायिक और गैर न्यायिक सदस्य कि नियुक्ति हेतु चयन प्रक्रिया उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1983 तथा उत्तर प्रदेश उपभोक्ता संरक्षण 14वां संशोधन नियमावली 2019 के नियम 6(ख )प्रावधानों के अंतर्गत की जाएगी। इस प्रकार हमारी नियुक्ति उपरोक्त अधिनियम और नियमावली के अंतर्गत की गयी जिस नियम के अंतर्गत नियुक्ति होती है। वही नियम सेवा निवृत्ति तक लागू होती है लेकिन भारत सरकार द्वारा उपभोक्ता संरक्षण (राज्य आयोग और जिला आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का वेतन भत्ते एवं सेवा की शर्तें मॉडल नियम, 2020) बनाया गया है।

इस मॉडल नियम के क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा “उत्तर प्रदेश उपभोक्ता संरक्षण (राज्य आयोग और जिला आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का वेतन भत्ते एवं सेवा शर्तें) नियमावली 2021” बनाई गयी। यह नियम उनपर लागू होगा जो इस नियम के गजट में प्रकाशन के बाद सदस्य के पद पर नियुक्त हुए हों लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इसे पूर्व तिथि से लागू किया गया जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के विपरीत है।

राज्य उपभोक्ता आयोग के सदस्यों को जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के विरुद्ध जाँच करने का अधिकार है। जिला उपभोक्ता आयोग के निर्णयों के विरुद्ध अपील और रिवीज़न सुनने का अधिकार है। राज्य उपभोक्ता आयोग, जिला उपभोक्ता आयोग का पर्यवेक्षण करने का अधिकारी है लेकिन उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा राज्य उपभोक्ता आयोग के सदस्यों का वेतन जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष से बहुत कम कर दिया गया। विडम्बना यह है कि कई मामलों में जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष अपने अंतिम आहरित वेतन से अधिक पा रहे हैं जो संभव नहीं है लेकिन राज्य के इस नियमावली ने उसे भी संभव बना दिया।

इससे क्षुब्ध होकर राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्य राजेंद्र सिंह पूर्व जिला जज ने कई प्रत्यावेदन भारत सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार को भेजा लेकिन न्याय नहीं मिला। बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्यों को मिलने वाला वाहन भत्ता और मंहगाई भत्ता 01 जून 2020 से बंद कर दिया। इस अमानवीय व्यवस्था से क्षुब्ध होकर राज्य उपभोक्ता आयोग के न्यायिक सदस्य राजेंद्र सिंह ने एक पत्र सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 2021 में और सर्वोच्च न्यायालय ने इसे रिट याचिका के रूप में स्वीकार किया और इस रिट याचिका (C) संख्या 1144/2021 के रूप में सुनवाई शुरू की तथा राजेंद्र सिंह की ओर से श्री गोपाल शंकरनारायणन वरिष्ठ अधिवक्ता को न्याय मित्र बनाया गया।

इस मामले में कई पेशी के बाद पूरे इंडिया के समस्त राज्यों से राज्य उपभोक्ता आयोग के सदस्यों को मिलने वाले वेतन भत्तों के सम्बन्ध में विवरण माँगा गया। इसके पश्चात सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय मित्र से इस सम्बन्ध में सुझाव मांगे जो न्यायलय में प्रस्तुत किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस सम्बन्ध में एक आदेश दिनांक 07 जनवरी 2025 को किया और भारत सरकार को निर्देश दिया और कहा की न्याय मित्र द्वारा मॉडल रूल्स 2020 में संशोधन हेतु अपने सुझाव दे दिए गए हैं और हम आपको इन सुझाव को देखने के लिए निर्देश देते है और मॉडल रूल्स में संशोधन हेतु फरवरी 2025 तक उपयुक्त निर्णय लेने के लिए भी निर्देशित करते हैं। और इस याचिका को सुनवाई के लिए 5 मार्च को दिन में 2 बजे प्रस्तुत करने के लिए लिखा।

भारत सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में कोई कार्यवाही नहीं की गयी। तब दिनांक 05 मार्च 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि इस मामले में विचार विमर्श चल रहा है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने फटकार लगाते हुए कहा मामले कि गंभीरता को देखता हुए यदि यूनियन ऑफ़ इंडिया निश्चित दिनांक तक कोई निर्णय नहीं लेती तब हम अनुच्छेद 142 भारतीय संविधान के अंतर्गत अपना छेत्राधिकार लागू करने पर विचार करेंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि तत्कालीन विद्यमान नियमों के अंतर्गत वेतन व अन्य सुविधाएं तुरंत प्रदान करें और यह भी कहा कि यदि इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है तब संबंधित पक्षकार इस सम्बन्ध में एक नोट एमिकस क्यूरी को दे सकते हैं जिससे कि यह कोर्ट समुचित आदेश पारित करे। साथ ही साथ बिहार सरकार को भी आदेश दिया गया कि वह कोई भी वसूली कार्यवाही नहीं कर सकती है। इस मामले में सुनवाई कि अगली तारीख 8 अप्रैल निश्चित की गयी है।

अनुच्छेद 142 भारतीय संविधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत, सुप्रीम कोर्ट को किसी भी मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए ज़रूरी आदेश देने की शक्ति मिलती है। इस अनुच्छेद के तहत, सुप्रीम कोर्ट को कुछ विशेषाधिकार मिलते हैं।

अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट के अधिकार:

सुप्रीम कोर्ट अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करके ऐसा कोई भी फ़ैसला दे सकता है, जो संविधान का उल्लंघन न करे।

सुप्रीम कोर्ट को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र के संबंध में किसी व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करने, दस्तावेज़ों की खोज या पेश करने, या अपने किसी अवमान की जांच या दंड देने के लिए आदेश देने की शक्ति है।

सुप्रीम कोर्ट को किसी भी मामले में फैसला लेने के लिए आज़ाद होता है।

पूर्व सदस्य यू एस अवस्थी और विजय वर्मा का भी वेतन भी “उत्तर प्रदेश उपभोक्ता संरक्षण (राज्य आयोग और जिला आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का वेतन भत्ते एवं सेवा शर्तें) नियमावली 2021″ के अनुसार लगभग 22000.00 प्रतिमाह निर्धारित किया गया। यू. एस. अवस्थी द्वारा इस सम्बन्ध में कई प्रत्यावेदन उत्तर प्रदेश सरकार को भेजा गया और अंततः उत्तर प्रदेश उपभोक्ता आयोग के सदस्य के रूप में दिनांक 23 जुलाई 2023 को उनका निर्धारित मानदेय अंतिम आहरित वेतन माइनस पेंशन के आधार पर निश्चित किया गया। इस प्रकार कई वर्षों के बाद उनके मामले में नियमों का पालन हुआ।

लेकिन हमारे मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार ने आदेश जारी नहीं किया और इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना की जा रही है।

देखें शिकायत और सुप्रीम कोर्ट का आदेश….

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