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आज के अखबार : विमान हादसे की प्रारंभिक रिपोर्ट, गलती साबित करने की होड़ और राय बनाने का खेल

संजय कुमार सिंह

आज अंग्रेजी के मेरे सभी अखबारों की लीड अहमदाबाद विमान हादसे की प्रारंभिक रिपोर्ट है। हिन्दी वाले दोनों अखबारों में यह सेकेंड लीड है। अकेले अमर उजाला में दो पहले पन्ने हैं और यह दूसरे पहले पन्ने पर लीड है। इस तरह सेकेंड लीड ही हुआ। मेरी तीसरे हिन्दी और नौवें अखबार, देशबन्धु में भी आज यह रिपोर्ट लीड है। हिन्दी के दोनों अखबारों की लीड दिल्ली में चार मंजिला इमारत गिरने से उसमें छह लोगों की मौत की खबर लीड है। इसमें इंडियन एक्सप्रेस की खबर दब गई है जो आज सभी अखबारों में प्रमुखता से होनी चाहिये थी। आप जानते हैं कि बिहार की मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण का काम चल रहा है। उससे संबंधित विवाद हैं और चुनाव आयोग के अधिकार भी चर्चा में हैं। इन सबके साथ यह आशंका तो है ही चुनाव आयोग यह सब भारतीय जनता पार्टी के फायदे के लिए कर रहा है जो इस समय केंद्र के साथ कई राज्यों में सत्तारूढ़ है। ऐसे में आज खबर है कि चुनाव आयोग ने सभी राज्यों से सघन पुनरीक्षण की तैयारी करने के लिए कहा है। इसका मकसद चाहे जो हो, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो चुनाव आयोग को आगे की कार्रवाई शुरू करने से पहले फैसले का इंतजार करना चाहिये था। लेकिन यह तो तब होता जब मुख्य चुनाव आयुक्त की नियु्क्ति पर फैसला आया होता। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

विमान हादसे की प्रारंभिक रिपोर्ट के बारे में पायलट्स एसोसिएशन का दावा है कि यह पायलट की गलती साबित करने की हडबड़ी है। साथ ही यह आरोप लगाया है कि अभी तक जो जांच हुई है उसमें पारदर्शिता का अभाव है। इसके बावजूद आज यह खबर न सिर्फ सभी अखबारों में लीड या सेकेंड लीड है, कई अखबार कुछ न कुछ साबित करने की कोशिश में लगते हैं। सबसे अलग शीर्षक अमर उजाला का है। फ्लैग शीर्षक है, शुरुआती जांच के बाद रिपोर्ट और विमानन कंपनी – दोनों पर सवाल। ईंधन स्विच में गड़बड़ी पर सात साल पहले किया आगाह, एयरलाइंस ने की अनदेखी। तथ्य यह है कि सात साल में सैकड़ों विमानों ने हजारों उड़ान भरी और किसी में दुर्घटना नहीं हुई। ऐसे में यह कारण तो बमुश्किल उल्लेख करने लायक है और जांच में पारदर्शिता होती तो पता चलता कि अब इसका उल्लेख क्यों किया गया है। अगर पायलट एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि पायलट को दोषी ठहराने की हड़बड़ी है तो यह शीर्षक मामले को उलझाने या भटकाने की कोशिश या भटका हुआ ही लगता है। हालांकि, खबर में यह चेतावनी भी प्रमुखता से दी गई है कि, ईंधन (स्विच में) लॉक नहीं होने से अनजाने में बंद हो सकता है ईंधन। दूसरे अखबारों ने लिखा है और इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक में है, एक पायलट को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि मैंने नहीं किया है। और यह अखबार की खोज नहीं है, जांच रिपोर्ट के हवाले से ही कही गई है। 

अमर उजाला ने शीर्षक में लिखा है कि एयरलाइंस ने की अनदेखी जबकि एअर इंडिया का तर्क है कि परीक्षण सुझाव थे, अनिवार्यता नहीं। तथ्य यह है कि सात साल पहले एअर इंडिया का स्वामित्व सरकार के पास ही था और अगर तब कोई सुझाव नहीं माना गया तो अब खबर कैसे है? क्या तब खबर थी? वह भी तब जब एअर इंडिया ने कहा भी है कि परीक्षण की बात सुझाव थी, अनिवार्यता नहीं। कायदे से खबर यह होनी चाहिये कि इस सुझाव को अब अनिवार्य बनाने की जरूरत है या नहीं और है तो क्यों, या नहीं है तो क्यों। दूसरी ओर, टेलीग्राफ ने कई पायलट से बात करते बताया है कि न तो फुएल स्विच में गड़बड़ी है,ना गलती से ऑन-ऑफ करना आसान या संभावित है। ऐसे में कारण कुछ और हो सकता है और उसे पता लगाया जाना चाहिये। रिपोर्ट की आज की खबर और शीर्षक, दोनों फ्यूल स्विच बंद होने से हुआ था एअर इंडिया का हादसा (नवोदय टाइम्स) फैसले पर पहुंचने जैसा है। यहां एयरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एएलपीए) के हवाले से खबर है कि हादसे की जांच पायलट की गलती ढूंढ़ने पर फोकस नहीं होनी चाहिये। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, एआई171 : द बिग स्विच ऑफ। इसका मतलब हुआ, एआई 171 के क्रैश मामले में इंजन को ईंधन की सप्लाई बंद करने का मामले बड़ा सवाल है।

इसमें बताया गया है कि रिपोर्ट से यह संकेत मिलता है कि विमान को ईंधन की सप्लाई बंद की गई थी। इसके साथ रहस्य के 29 सेकेंड का विवरण है और यह भी बताया गया है कि सारा जोर पायलट की जानबूझकर की गई कार्रवाई पर है। इस तरह, अखबारों की खबर बताती है कि रिपोर्ट के हवाले से जो कहा गया है वह क्या है या क्या नहीं है जबकि अमर उजाला की खबर सात साल पहले के सुझाव की चर्चा कर सुझाव नहीं मानने को मुद्दा बनाती है जबकि ऐसा हो ही नहीं सकता है। हालांकि पूर्व में एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया है कि इस तरह के विमानों की खराबी का असर 12-15 साल बाद दिखेगा। लेकिन यह सब आम पाठकों के लिए नहीं होता है और तकनीकी जानकारों के लिए होगा। अखबार की खबर ऐसी नहीं होनी चाहिये। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार इंजन को ईंधन की सप्लाई 3 सेकेंड में कट/काट (दी) गई। स्विच को वापस सही किया गया; कारण स्पष्ट नहीं है। इसमें भी 29 सेकेंड का विवरण है और इसके साथ यह भी बताया गया है कि विमान कोई दो घंटे पहले दिल्ली से अहमदाबाद पहुंचा था। इसके साथ विमान के फुएल कंट्रोल स्विच की तस्वीर है और यह बताया गया है कि स्विच दुर्घटनाग्रस्त विमान का नहीं है।

द हिन्दू ने रिपोर्ट के हवाले से अपने पाठकों को बताया है कि विमान दुर्घटना ईंधन बंद होने से हुई। यह शुरुआती रिपोर्ट है और दुर्घटना का कारण नहीं बता रही है रिपोर्ट जो कह रही है उसे बता रही है। यही तरीका है। इसके साथ की एक खबर बता रही है, रिपोर्ट विमान हादसे का कारण मानवीय हस्तक्षेप को बता रही है और इससे संबंधित दूसरी रिपोर्ट में कहा गया है कि यह हस्तक्षेप पायलट का ही हो सकता है। लेकिन खबर यह भी है कि पायलट ऐसा ‘गलती से’ नहीं कर सकता है और जानबूझकर क्यों करेगा। अगर दोनों पायलट ने नहीं किया  (जैसा डाटा रिकार्डर से साफ है तो सवाल है कि क्या किसी अन्य ने ऐसा हस्तक्षेप किया तो सवाल होगा कि क्या कोई बाहरी व्यक्ति विमान में रहते हुए या विमान गिरने से पहले बाहर से या अंदर जाकर ऐसा कर सकता है। निश्चित रूप से इन सब बातों की जांच की जरूरत है और अभी निर्णय की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। पर कई अखबारों ने जल्दबाजी में शुरुआती रिपोर्ट को ही आकलन के रूप में पेश कर दिया है। द हिन्दू की खबर में एक और खास बात को हाईलाइट किया गया है। वह यह कि एएआईबी की रिपोर्ट ने बोइंग 787-8 विमानों या इसके जीई  जीईएनएक्स-1बी इंजन के लिए किसी कार्रवाई की सिफारिश नहीं की है।

हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक भी रिपोर्ट के हवाले से कहता है कि विमान के इंजन को ईंधन की सप्लाई विमान क्रैश करने से कुछ ही सेकेंड पहले बंद की गई थी। भले ही कुछ रिपोर्ट में इसके लिए पायलट को दोषी ठहराने की कोशिश की गई है और यह समझाने का प्रयास लग रहा है कि पायलट गलती से ऐसा कर सकते हैं पर जीवन मरन का कारण बनने वाली गलती कोई आम आदमी कर दे तो कर दे अनुभवी पायलट क्यों करेंगे और जानबूझकर भी करें तो उसका कारण समझ में आना चाहिये। जो भी हो, जांच एजेंसियों का काम है कि वे संतोषजनक कारण का पता लगाकर बतायें। अभी यह काम नहीं हुआ है और प्रचार शुरू है। ऐसे में हिन्दुस्तान टाइम्स ने उन प्रमुख सवालों को छापा है जो अनुत्तरित हैं। इसके साथ यह भी बताया गया है कि इसके बाद अब क्या हो सकता है और यह सब जानते हुए जो खबर छपी है और जो नहीं छपी है तथा अंतरिम रिपोर्ट को जो महत्व दिया गया है वह हेडलाइन मैनजमेंट के कारण भी हो सकता है। दूसरे कारण भी राजनीतिक हों तो कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिये। इसमें यह भी कहा गया है अंतिम रिपोर्ट आने में महीनों या वर्षों लग सकते हैं। दि एशियन एज का शीर्षक है, कॉकपिट ऑडियो से ईंधन का प्रवाह बाधित किये जाने का संकेत मिलता है, भ्रम : एएआईबी। रिपोर्ट की और भी जानकारियों से स्पष्ट होता है कि मामला साजिश का हो सकता है क्योंकि पक्षी टकराने की आशंका खत्म हो गई है। पायलट की संस्था ने कहा है विमान हादसे की उचित जांच होनी चाहिये। उड्डयन मंत्री ने कहा है कि हम किसी निष्कर्ष पर छलांग न लगायें। लेकिन मुद्दा यही है हर रिपोर्ट की खबर इतनी विविधतापूर्ण होगी तो अंतिम निष्कर्ष आने से बहुत पहले लोगों की राय बन गई रहेगी। और यही हेडलाइन मैनेजमेंट है जो जारी है।

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