दीपक पाण्डेय-
Bhadas4media पर एक खबर पढ़ी कि एक यूट्यूबर ने अपना स्टूडियो जला दिया, जिसे उसने अपना घर बेचकर बनाया था। उसने अपना चैनल भी बंद कर दिया। यहां दोष उस यूट्यूबर का नहीं, बल्कि समय और फैसले का है। अगर आप सही समय पर सही निर्णय नहीं लेते, तो ज़िंदगी में सिर्फ पछतावा ही बचता है।
अपने अनुभव से बताता हूं।
जब मैंने जून 2022 में दैनिक जागरण डिजिटल जॉइन किया था, उस वक्त मेरा यूट्यूब चैनल The Daily Road चल नहीं रहा था, बल्कि दौड़ रहा था। मेरे व्यूज हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में थे। कई वीडियो मिलियन व्यूज पार कर चुके थे। इस चैनल को मैंने अप्रैल 2019 में शुरू किया था।

इसकी शुरुआत भी एक अजीब से हालात में हुई थी। मैं उस समय एक न्यूज चैनल में वीडियो प्रोड्यूसर था। एक सीनियर वीडियो एडिटर से मेरे प्रोग्राम में गलत विजुअल लगाने को लेकर बहस हो गई। उसने ताना मारते हुए कहा— “तू बड़ा ज्ञानी बनता है, तो खुद क्यों नहीं वीडियो एडिटर बन जाता? खुद से एडिट कर लिया कर।”
उसकी बात मुझे लग गई। उसी दिन से मैंने वीडियो एडिटिंग सीखना शुरू कर दिया। लेकिन सवाल था—वीडियो बनाऊं तो किस टॉपिक पर?
ऑफिस से बाहर निकला तो सड़क पर एक बड़ा ट्रक गुजरता दिखा। तभी दिमाग में आया—ये चीज मैं रोज देखता हूं, लेकिन इसके बारे में खुद मुझे कितनी जानकारी है? अगर मैं ही नहीं जानता, तो आम लोग क्या जानते होंगे?
बस वहीं से The Daily Road का आइडिया और पहला टॉपिक मिला।
मैंने ट्रकों और ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर रिसर्च शुरू की, स्क्रिप्ट लिखी, वीडियो फुटेज जुटाए और पहली बार खुद टूटी-फूटी आवाज़ में वॉइस ओवर किया। पूरे पांच दिन लगे पहला वीडियो बनाने में। फिर उसे यूट्यूब पर अपलोड कर दिया।
नतीजा चौंकाने वाला था। सिर्फ एक महीने में उस वीडियो पर 7 लाख व्यूज आए और करीब 2 हजार सब्सक्राइबर मिल गए। उस समय यह यूट्यूब मोनेटाइजेशन के लिए परफेक्ट नंबर था।
मैंने यह बात अपने जूनियर दोस्त अखिलेश को बताई, जो एक वीडियो एडिटर था। उसने कहा— “आप इसे कंटीन्यू रखो, पहले ही वीडियो पर इतना अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है, यह बहुत पॉजिटिव संकेत है।”
हकीकत यह है कि वीडियो एडिटिंग मुझे उसी अखिलेश ने सिखाई थी। उसी ने सॉफ्टवेयर दिया था। जब मैं न्यूज चैनल में प्रोग्राम करता था, वही मेरे शो एडिट करता था।
जागरण जॉइन करने से पहले, मैं नौकरी के साथ पार्ट टाइम काम करते हुए The Daily Road से अच्छी खासी कमाई कर रहा था। एक दोस्त को मैंने सोशल मीडिया देखने के लिए नौकरी तक दे दी थी, जो कोरोना में बेरोजगार हो गया था।
तब मेरे पास कोई स्टूडियो नहीं था। सिर्फ एक स्मार्टफोन और एक लैपटॉप था। पूरा काम घर से ही होता था। लेकिन मेरे पास सबसे बड़ी पूंजी थी—यूनिक कंटेंट।
जीरो निवेश पर शुरू किया था। सिर्फ शौक में। करियर बनाने की कोई सोच नहीं थी। धीरे-धीरे वॉइस ओवर, शूटिंग, स्क्रिप्टिंग, एडिटिंग और यूट्यूब एल्गोरिदम सब सीख गया। वन मैन आर्मी की तरह काम करता था।
हफ्ते में दो छुट्टियों में ही वीडियो बनाता था। उसी यूट्यूब की कमाई से गाड़ी खरीदी। जब भी समय मिलता, सड़क पर निकल जाता कंटेंट खोजने।
लैपटॉप भी नौकरी की सैलरी से नहीं खरीदा था। 2019 लोकसभा चुनाव और 2020 दिल्ली चुनाव में एक पॉलिटिकल एजेंसी के लिए फ्रीलांस काम करके मिले पैसों से खरीदा था।
सच कहूं तो मेरे पास ऐसा कोई आर्थिक दबाव नहीं था कि मुझे दैनिक जागरण जॉइन करना पड़े। वो ऐसा वक्त था जब मैं नौकरी छोड़कर पूरी तरह यूट्यूब पर फोकस करता, तो मेरा नुकसान नहीं, बल्कि फायदा ही होता।
लेकिन किस्मत कहूं या खुद की मूर्खता—मैंने यूट्यूब के पीक टाइम पर उसे छोड़ दिया और एक नौकरी पकड़ ली। यानी जिस वक्त मैं खुद एक ब्रांड बन सकता था, उस वक्त मैंने अपने ही हाथों अपना ब्रांड खत्म कर दिया।
जब मैंने The Daily Road पर काम बंद किया, तो स्पॉन्सरशिप भी खत्म हो गई, एडसेंस की कमाई भी बंद हो गई। जो दोस्त सोशल मीडिया देखता था, वह भी अलग हो गया। रिश्ते खराब हो गए।
आज हालत यह है कि मैं फिर से अपने चैनल को खड़ा करने की कोशिश कर रहा हूं। पहले से कहीं ज्यादा मेहनत कर रहा हूं, लेकिन रिजल्ट लगभग शून्य है। कुछ स्पॉन्सरशिप मिल रही है, लेकिन इतनी नहीं कि उससे घर चल सके।
इसलिए कह रहा हूं—सही समय पर सही फैसला सबसे जरूरी होता है। वरना इंसान के हाथ में सिर्फ पछतावा रह जाता है।
फ्रस्ट्रेशन में कोई स्टूडियो जलाता है, कोई अपना घर। लेकिन असल जरूरत है खुद की गलतियों को स्वीकार करने की और नए सिरे से प्लान बनाने की। स्टूडियो जलाने से पहले अगर इंसान Plan-B पर काम करे, तो न जलने की नौबत आएगी, न जलाने की।
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