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महाराष्ट्र

नौकरी के डर से मजीठिया का नाम लेने से भी घबराते हैं मुंबई के पत्रकार

प्रति,
     यशवंत जी
     नमस्कार,
               आपने मजीठिया की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए भड़ास के माध्यम से जो प्रयास किया है, वो प्रशंसनीय ही नहीं, वंदनीय भी है। आपके इस प्रयास के चलते जिन संस्थानों में यह वेतन आयोग लागू हो जायेगा, उससे जुड़े कर्मचारी आजन्म आपके ऋणी होंगे। कृपया प्रयास जारी रखें, उम्मीदों का दीया जलाये रखें। बहुत लोग आपकी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। मुझे उम्मीद ही नहीं यकीन है कि एक दिन आपको कामयाबी अवश्य मिलेगी। आप यशस्वी होंगे।

प्रति,
     यशवंत जी
     नमस्कार,
               आपने मजीठिया की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए भड़ास के माध्यम से जो प्रयास किया है, वो प्रशंसनीय ही नहीं, वंदनीय भी है। आपके इस प्रयास के चलते जिन संस्थानों में यह वेतन आयोग लागू हो जायेगा, उससे जुड़े कर्मचारी आजन्म आपके ऋणी होंगे। कृपया प्रयास जारी रखें, उम्मीदों का दीया जलाये रखें। बहुत लोग आपकी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। मुझे उम्मीद ही नहीं यकीन है कि एक दिन आपको कामयाबी अवश्य मिलेगी। आप यशस्वी होंगे।

बात ये है कि मेरे एक पुराने पत्रकार मित्र हैं। मुंबई के एक लीडिंग हिंदी डेली पेपर से जुड़े हुए हैं। पद भी बड़ा ही है उनका। फेसबुक पर हर छोटी बड़ी बात अपडेट करते रहते हैं। दो दिन पहले उनसे हमारी मुलाकात हो गयी। बातों की शुरूआत हालचाल से हुई और पहुंच गयी राजनीति पर। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीतियों की प्रशंसा करने लगे। बातचीत अपने शबाब पर थी कि मैंने मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों का जिक्र छेड़ दिया। जानते हुए भी अनजान बनकर मैंने पूछ लिया कि उनके यहां मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू हुईं कि नहीं? उन्होने इस बारे में फेसबुक पर कुछ नहीं लिखा?

उनका जैसे मूड ही उखड़ गया। चेहरा देखकर लगा, जैसे उनके विरुद्ध कोई सवाल पूछ लिया हो। कहने लगे इस बारे में कुछ नहीं ही पूछो तो बेहतर है। लेकिन क्यों? जवाब दिया कि कौन अपनी नौकरी गंवायेगा। उनके इस बयान को सुनने के बाद मैं ये सोचने पर विवश हो गया कि इस महानगर के पत्रकार मजीठिया से कितने खौफजदा हैं।

कैसी विडंबना है कि पत्र पत्रिकाओं के मालिक निश्चिंत हैं। उन्हें न तो कानून का डर है और न ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू न करने को लेकर किसी तरह का खौफ, जबकि यहां के पत्रकार हैं कि डर के मारे पतले हुए जा रहे हैं।
 
एक आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा मांगी गयी जानकारी में बताया गया कि टाइम्से ऑफ इंडिया को छोड़कर यहां बाकी किसी भी पत्र पत्रिका में मजीठिया की सिफारिशें नहीं लागू की गयी हैं, फिर भी न तो पत्रकार ही इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, न ही पत्रकारों के विभिन्न संगठन ही इसे संबंधित अधिकारियों की नजर में लाने का प्रयास कर रहे हैं। श्रम मंत्रालय हो या श्रम आयुक्त कार्यालय, कहीं से कोई कार्यवाई नहीं की जा रही है। न जाने क्या होगा यहां के पत्रकारों का भविष्य।

हर क्षेत्र में राष्ट्रहित या लोकहित की कोई न कोई कार्यवाई करती नजर आ रही मोदी सरकार क्या मीडिया से जुड़े लोगों के हितों के लिए आवाज उठायेगी? क्या केंद्र सरकार संबंधित मंत्रियों को ये निर्देश देने की हिम्मित जुटायेगी कि वे सभी पत्र पत्रिकाओं के मालिकों को मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार वेतन दिलाने के लिए उचित कार्रवाई करें? सुप्रीम कोर्ट का फैसला सर्वोपरि होने की बात का डंका पीटने वाली सरकार की ये जिम्मेदारी बनती है कि वह संबंधित संस्थाओं या उनके मालिकों को उसका पालन करने के लिए मजबूर करे। काश ऐसा होता।
 
धनंजय
मुंबई

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2 Comments

2 Comments

  1. IMRAN HUSSAIN

    August 19, 2014 at 9:30 am

    आप संगर्ष करते रहो और जो मदद आपको जरुरत पड़े वो पुरे भारत के पत्रकार आपके साथ है।

  2. Kashinath Matale

    August 26, 2014 at 1:10 pm

    Aise hi daroge to har jagah dar hi dikhega. Har employer aapko daryega.
    Sath me ladho union banao. Union se jude raho.
    Kanun kayde sabke liye hai. Darkar kuchh hasil nahi hoga, sirf dar ke siva.
    Isiliye daro mat. Nyay ke liye ladho. khud ke liye ladho. Khud ke liye nahi ladho ge to dusre ke liye kaise ladhoge. Saociety me dusre ke liye bhi ladhna padta hai, parntu pahale khud ke liye ladhna sikho. Ghabrao nahi. Ghabarahat aadmi ko bar bar mar deti hai, to ladhi ke liye tayya ho jao.

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