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JMD न्यूज वाले अपने कर्मचारियों का खून पीते हैं!

मनीष दुबे-

भारत में स्वतंत्र टीवी न्यूज़ चैनल की शुरुआत 1999 में होनी बताई जाती है. 1995 में दूरदर्शन से शुरू होकर आज तक पहला प्राइवेट स्वामित्व वाला समाचार प्रसारक बना. खूब पत्रकारिता हुई. टीवी का अकूत ग्लैमर और पावर देख तमाम काले, पीले, कुत्सित लोग भी इसमें घुसे. ऊट पटांग धंधे कारनामों को दबाने-लुकाने तक के लिए लोगों ने न्यूज़ चैनल या अखबार बनाए.

पत्रकारिता को धंधा बनाकर इसके माध्यम से तमाम वारे न्यारे किये गए. बावजूद इसके करोड़ों अरबों कमाने वाले इन चैनल अख़बार मालिकों ने अपने अंडर काम करने वाले कर्मचारियों को वो अधिकार और तवज्जो अब तक नहीं दी जो उसे मिलनी चाहिए. हालांकि अच्छी बात यह है कि मीडिया में अभी भी ऐसे लोगों का एक अच्छा-खासा वर्ग है जो इसकी विश्वनीयता और साख को बचाकर इसे चला रहे हैं।

एक छोटा सा उदाहरण कानपुर के सिविल लाइन से प्रसारित JMD न्यूज का देखिये. तेज तर्रार मौजूदा संपादक और कर्मचारियों की बदौलत चैनल तरक्की के मार्ग पर है. आगे और कर सकता है. परंतु यहां के मालिकान को कुछ उदार होने की जरूरत है. ऐसा बिलकुल नहीं है कि इनके पास धन की कमी है. ईश्वर कृपा से JMD के पास डेन अम्बे नेटवर्क, जेमडी स्कूल, होटल, जेएमडी चौराहा जैसी दुधारू संस्थाएं हैं. कई और भी व्यापार हैं लेकिन उनका यहां जिक्र निरर्थक होगा. भाइयों की जोड़ी पर शहर को नाज है लेकिन कमी वही उदारता वाली. खासकर उनके साथ उदारता निभानी बड़ी जरूरी होती है जो आपको बढ़ाने के लिए आपसे जुड़े हों. माने आपके कर्मचारी.

अब ये स्क्रीनशॉट देखिये. जेएमडी न्यूज से आई सैलरी का है. अपने दुर्दिन समय में मैं यहां नौकरी करने गया था. जिसके 15 दिन की एवज में मिली ये तनख्वाह है. 4333 रू. जबकि 10 हजार की तय सैलरी का आधा हुआ 5 हजार. तो बाकी का पैसा कहां गया? इसका उत्तर भी है मेरे पास. जिस मुताबिक ये बाकी का पैसा उस मद में कटा जो मैं 9 घंटे की नौकरी में समय से पहले उठ आया. मैं नया था तो पता नहीं चला कि काम खत्म होने के बाद वहां बैठकर समय बिताना भी क्वालिटी है. थंब में घंटा 9 का ही टन्न बोलना है. इन लोगों को कर्मचारी, काम, रूटीन सब फन्नेखां चाहिए, लेकिन दमड़ी जितनी कम से कम लगे खास ख्याल रखा जाता है. चैनल के पंडीजी HR नई आमद से बेहतरीन बारगेनिंग कर मालिक का दिल खुश किये रहते हैं.

मैं कोई नया बउआ नहीं हूं. तुमने हवा में हुनर लिए होंगे तो मेरे पास जनरल डब्बे का एक्सपीरिएंस है. कई नामचीन संपादकों के साथ काम किया है. अब भी कर रहा हूँ. काम और काम का इनाम मुझसे बेहतर कोई नहीं बता सकता. सुबह घर से सिविल लाइन महीने का 1500 रू. का पेट्रोल. दस के साढ़े आठ में कोई मुँह में मुसक्का लगाकर बैल तो बन नहीं जाएगा. हो सकता है यहां के मालिकान को यही लगता हो? तिसपर ये कटिंगबाजी, अलबत्ता मैं दुबारा वहां नहीं गया, जाना भी नहीं था.

ये बात सिर्फ एक जेएमडी की नहीं है, बल्कि देश के उन तमाम संस्थानों की है जो अपने सुख के आगे अपने लिए काम कर रहे उन तमाम कर्मचारियों का हक मार जाते हैं जो वाजिब है. हक तो छोड़िए तमाम उदाहरण मेरे पास ऐसे भी हैं, जब रिपोर्टर्स बताते हैं कि वे फ्री में सेवा दे रहे हैं. मजबूरी में दिनभर की दौड़-भाग, पेट्रोल, चाय-नाश्ता, शाम की दारू आदि का खर्चा रिपोर्टर वहीं से निकालेगा, जिसके लिए लोग छाती में मुक्का मारकर पत्रकारिता की बदनामी कराने का ठीकरा फोड़ते हैं.

अक्सर देखने में आता है कि पर्दे के पीछे जीत का हीरो कोई और होता है लेकिन उसका श्रेय पप्पू या पनौती किस्म के लोग उठा ले जाते हैं. बिना किसी झिझक शर्म के. श्रेय हमेशा असली किरदारों को मिलता तो भट्ठों पर ईंट पाथने वाली लेबर कौम के पास भी एक आध ऑस्कर या मैग्सेसे जैसा लेबल लगा-मिला होता. है की नहीं?

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2 Comments

2 Comments

  1. Anuj Tripathi

    December 4, 2023 at 1:36 pm

    ये मंदिरों में भंडारा तो करा सकते है लेकिन अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे सकते है अच्छा ,उनको खुश नहीं रख सकते है इनके जैसे बहुत व्यापारी उद्योगपति है कानपुर में

  2. Unknow

    December 5, 2023 at 12:27 am

    Bhaiya Yeh choro se battar hai or sath hi jo HR hai unko poori duniya me koi job na de.

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