वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा ने भाजपा आईटी सेल के प्रधान अमित मालवीय का ट्वीट रिट्वीट कर जमकर क्लास लगाई है। मालवीय ने उन स्वतंत्र पत्रकारों की तस्वीर साझा कर निशाना साधा है, जिन्हें जंतर-मंतर के प्रदर्शन में युवाओं का भरपूर समर्थन मिला। जबकि न्यूज़ चैनलों के पत्रकारों का क्या हाल किया गया, पूरे देश ने देखा। यह बात मालवीय को चुभ गई। जिसके बाद आईटी सेल मुखिया अपना प्रोपगंडा लेकर ट्वीटर (एक्स) पर उतरे हैं।
इनमें से एक पत्रकार बता दे मालवीय- जिसपर दंगा भड़काने को लेकर केस है. जो वसूली के आरोप में तिहाड़ जेल गया- जिसके भड़काऊ show को NBDSA ने हटाया? एक भी? अब बीजेपी ने सच्चे और सत्ता से सवाल पूछने वाले पत्रकारों पर war छेड़ दिया है. गोदी मीडिया का जंतर-मंतर protests पर सारा propaganda झूठा साबित हुआ! China लिंक- पाकिस्तानी लिंक- बांग्लादेश JEM लिंक. सब झूठ. झूठी तेरी पालतू मीडिया मालवीय. बेहूदा इंसान!
-अभिसार शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार
बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय के ट्वीट की हिंदी-
भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने जंतर-मंतर पर हालिया प्रदर्शन के बाद मीडिया की भूमिका को लेकर चल रही बहस पर टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि आजकल जिन पत्रकारों या मीडिया संस्थानों से वैचारिक असहमति होती है, उन्हें “गोदी मीडिया” कह देना एक फैशन बन गया है।
अमित मालवीय ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान कुछ पत्रकारों को निशाना बनाया गया और विशेष रूप से महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व आपत्तिजनक व्यवहार किया गया, जिसकी कोई भी उचित व्याख्या नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि दूसरी ओर, मीडिया के एक वर्ग को प्रदर्शनकारियों ने अपने बीच सहज स्वीकार किया, जबकि दूसरे वर्ग के पत्रकारों को “गोदी मीडिया” कहकर अपमानित किया गया। मालवीय ने सवाल उठाया कि यदि सत्ता के करीब माने जाने वाले पत्रकारों को “गोदी मीडिया” कहा जाता है, तो उन पत्रकारों को क्या कहा जाएगा जिन्हें किसी राजनीतिक दल, आंदोलन या वैचारिक समूह के निकट माना जाता है।
अपने पोस्ट में उन्होंने यह भी कहा कि 2014 से पहले भी पत्रकारों का एक प्रभावशाली वर्ग कांग्रेस नेतृत्व के बेहद करीब माना जाता था। उनके अनुसार, समय के साथ चेहरे और मंच बदल गए, लेकिन वैचारिक पक्षधरता और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह खत्म नहीं हुए।
मालवीय ने कहा कि पत्रकारों को केवल उनके वैचारिक दृष्टिकोण के आधार पर राजनीतिक खांचों में बांटना उचित नहीं है। यदि मीडिया की स्वतंत्रता को मानक माना जाता है, तो यह कसौटी सभी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
पोस्ट के अंत में अमित मालवीय ने एक तस्वीर साझा करते हुए लोगों से पूछा कि उसमें मौजूद लोगों के बीच समानता क्या है और उनके अनुसार उस फ्रेम में और किन लोगों को होना चाहिए या नहीं।

मालवीय का मूल ट्वीट-
There is a lot of chatter about sections of the media in the aftermath of the recent protest at Jantar Mantar. It has become almost fashionable to dismiss any journalist or media house one disagrees with as “godi media.” What happened to some journalists at the protest was unacceptable. A few were targeted, and women journalists, in particular, were subjected to vile sexual abuse. There can be no justification for that.
At the same time, it is equally evident that another section of the media was treated as part of the spectacle rather than as independent observers. They appeared to enjoy the confidence of the protesters while others were branded and abused. If one set is labelled “godi” for allegedly being close to those in power, what label applies to those perceived to be aligned with the organisers or a political ecosystem?
This selective outrage is hardly new. Long before 2014, there was an influential circle of journalists widely seen as enjoying extraordinary access to the Congress leadership. Over the years, the names and platforms may have changed, but the ecosystem, incentives and alignments have remained familiar. Some moved from television to YouTube, others reinvented themselves as independent voices, but the underlying partisanship often remained intact.
Perhaps it is time to stop reducing every journalist to a political label simply because they hold a different worldview. If media independence is the standard, it should apply consistently to everyone, not just those one happens to disagree with.
Incidentally, someone sent me the picture below. What do you think is the common thread between the people in it? And who else do you think belongs in the frame, or doesn’t?
आसिफ अली-
जंतर मंतर पर हुए छात्रों के प्रोटेस्ट में जब रीढ़ विहीन मीडिया वाले भगाए जा रहे थे, माहौल एकदम संवेदनशील था तब इन पत्रकारों ने काफी मजबूती से पूरे प्रोटेस्ट को कवर किया और छात्रों के हित की बात की।
- अजीत अंजुम
- राजीव रंजन
- अभिनव पाण्डेय
- श्याम मीरा सिंह
- शमदीश भाटिया
- काव्या कर्नाटक
- प्रज्ञा मिश्रा
- मेधा यादव
- हर्ष यादव
- तनुश्री पाण्डेय
और भी लोग होंगे जिन्होंने गुस्साई भीड़ में घुसकर अपनी पत्रकारिता दिखाई और बेहतरीन ग्राउंड रिपोर्टिंग किया।
सबसे बड़ी बात है कि इसमें से ज्यादातर लोग Independent Journalist हैं जो अपने यूट्यूब पर काम करते हैं। और यही लोग असली पत्रकारिता को जिंदा रखे हुए हैं।


