
आज मणिपुर में हिंसा की शुरुआत की बरसी है। प्रधानमंत्री मणिपुर नहीं गये ना हिंसा रोक पाये। फिर भी चुनाव प्रचार में बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ को छोड़कर, आज के अखबारों में मणिपुर नहीं के बराबर है। जैसे-जैसे प्रधानमंत्री के भाषण का स्तर गिर रहा है, विपक्ष की बातों को पहले पन्ने पर स्थान और महत्व जरूर मिल रहा है। प्रधानमंत्री की बातों से लग रहा है कि वे कांग्रेस की बढ़ती ताकत से परेशान हैं और चुनाव हार चुके हैं फिर भी किसी तरह सत्ता पाने के लिए परेशान हैं। भले ही यह सामान्य हो पर उनका भाषण राजनीति और खेल भावना के खिलाफ है। आज के हाल और उदाहरण देखिये। पत्रकार परेशान हैं कि राहुल गांधी अमेठी से भाग गये जबकि वायनाड से वे 2019 में जीत भी गये थे।
संजय कुमार सिंह
आज कई खबरें हैं और इनमें जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पर आरोप। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में लीड है लेकिन मेरे दूसरे अखबारों में इसे उतनी प्राथमिकता नहीं मिली है। कोलकाता के अखबार द टेलीग्राफ में आज पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है और आधे में यह खबर नहीं है। अंदर होने की सूचना भी नहीं। मेरी राय में पश्चिम बंगाल में राज्यपाल पर यौन उत्पीड़न का आरोप इसलिए महत्वपूर्ण है कि संदेशखाली में एक विधायक पर आरोप लगने के बाद राज्य सरकार पर विधायक को संरक्षण देने का आरोप था और भाजपा समर्थक विरोधियों पर आरोप लगाते थे कि वे उसकी चर्चा नहीं कर रहे थे जबकि उसपर कार्रवाई चल रही थी। आज की खबर के अनुसार राज्यपाल ने राजभवन में पुलिस का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया है। कर्नाटक में जनता दल एस के नेता का प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार किया था उसपर सैकड़ों महिलाओं के यौन शोषण और उसका वीडियो बनाने के आरोप लगे। संदेशखाली के मुकाबले यह मामला भी नहीं आया। उल्टे केंद्रीय गृहमंत्री ने कह दिया कि राज्य सरकार ने कार्रवाई क्यों नहीं की जबकि कार्रवाई शुरू हो चुकी थी और काफी कुछ किया जा चुका था।
डिप्लोमैटिक पासपोर्ट रद्द करने पर कुछ नहीं
मुद्दा यह है कि उसका डिप्लोमैटिक पासपोर्ट रद्द करके जर्मनी से उसे वापस भेजने के लिए कहा जा सकता है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर यह अपील की है। कल मैंने लिखा था कि अमर उजाला ने इस खबर को पहले पन्ने पर नहीं छापा था। आज अमर उजाला ने (लीड के ऊपर टॉप पर) चार कॉलम में छापा है, “लुक आउट नोटिस जारी, 24 घंटे में पेश न हुए तो गिरफ्तारी”। कहने की जरूरत नहीं है कि यह राज्य सरकार की कार्रवाई है और वह तो अपना काम कर ही रही है। आरोप केंद्र सरकार पर उसके समर्थन और संरक्षण का है। वैसे ही जैसे ब्रज भूषण सिंह के साथ हुआ था। उस पर आने से पहले बता दूं कि आज इस खबर के साथ डबल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, “यौन उत्पीड़न में घिरे प्रज्जवल को नहीं दी गई जर्मनी जाने की अनुमति : विदेश मंत्रालय”। सबको पता है और कल छप चुका है कि सांसद होने के नाते प्रज्वल के पास डिप्लोमैटिक पासपोर्ट है और उसकी विशेषताएं होती हैं। इसलिए उसे रद्द करने की मांग की गई है पर ऐसा नहीं करके मामले को घुमाने की कोशिश की जा रही है और खबर में भी लिखा है कि पासपोर्ट रद्द करने के बारे में पूछे गये सवाल का प्रवक्ता ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। पर लीड वह है जो प्रधानमंत्री ने कहा।
ठीक है कि, प्रधानमंत्री कुछ भी कहें, बड़ी खबर है। उसे आप सर्वोच्च प्राथमिकता दे सकते हैं। लेकिन उनका कहा पहली ही नजर में झूठ हो, किसी के लिए अपमानजनक हो या उनके पुराने व्यवहार-आचरण पर सवाल उठाने वाला हो तो संपादक को देखना चाहिये कि उसे खबर को कितना महत्व देना है, कैसे छापना है। खासकर तब जब चुनाव चल रहे हों और दिख रहा हो कि संवैधानिक संस्थान दबाव में है, लोकतंत्र खतरे में है और कहा जा रहा हो कि इस बार जीत गये तो अगला चुनाव नहीं होगा। चंडीगढ़ के बाद सूरत हो चुका हो, इंदौर में वैसा ही नहीं हुआ पर कोशिश तो थी ही, जो हुआ वह कम नहीं है। इलेक्टोरल बांड के बारे में सब को पता है। ऐसे में सरकार का समर्थन तो नहीं ही किया जाना चाहिये विरोध आप भले नहीं करें। ठीक है कि नरेन्द्र मोदी सरकार का विरोध करने के लिए हिम्मत चाहिये, मालिकों का साथ जरूरी है पर उनके कहे को हर बार, हर रोज सर्वोच्च प्राथमिकता देना जरूरी नहीं है। फिर भी आज अमर उजाला का शीर्षक है, “देश में कांग्रेस मर रही, वहां पाकिस्तान रो रहा …. चाहता है शहजादा पीएम बनें : मोदी”। उपशीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने गुजरात में कहा – दुश्मन चाहते हैं देश में कमजोर और भ्रष्ट सरकार”।
प्रधानमंत्री ने कहा है तो यह कई अखबारों में है। उसकी चर्चा करने से पहले बता दूं कि मेरे सात अखबारों में सबसे ज्यादा महत्व अमर उजाला ने दिया है। नवोदय टाइम्स में भी यह खबर लीड है। शीर्षक है, “पाक को ‘शहजादा’ पसंद है मोदी”। तीन कॉलम की इस लीड के साथ अखबार ने दो कॉलम में राहुल गांधी की बात भी छापी है। शीर्षक है, “पीएम को मांगनी चाहिये देश की हर महिला से माफी : राहुल”। उपशीर्षक है – “कहा, प्रज्वल ने 400 महिलाओं से किया बलात्कार”। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री को इसका जवाब देना चाहिये और वे यह तो कह ही सकते हैं कि कार्रवाई चल रही है, बख्शा नहीं जायेगा आदि। पर जो कहा जा रहा है वह विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता द्वारा। आप ऊपर पढ़ चुके हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, “गुजरात के प्रचार मे प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को पाकिस्तान से जोड़ा”। मुझे लगता है कि यहां संपादक की भूमिका दिख रही है और मौजूदा हालत में संपादक जो कर सकता है उसे सर्वश्रेष्ठ ढंग से निभाया गया है।
फिर भी इनहेरीटेंस टैक्स का आरोप
द हिन्दू में यह खबर नहीं है और टाइम्स ऑफ इंडिया में इसका मुख्य शीर्षक अलग है। राहुल और पाकिस्तान की बात इंट्रो में है। मुख्य शीर्षक है, “लोकतंत्र, संविधान का अपमान है ‘वोट जिहाद’ की अपील : प्रधानमंत्री”। इस खबर के साथ अखबार ने प्रियंका गांधी का वह जवाब भी छापा है जो प्रधानमंत्री ने राजीव गांधी पर लगाये हैं। आपने पढ़ा होगा कि अमेरिका में रहने वाले सैम पित्रोदा ने कहा कि वहां विरासत कर (इनहेरीटेंस टैक्स) लगता है। प्रधानमंत्री ने इसे लपक लिया और कह दिया कि कांग्रेस सत्ता में आई तो विरासत कर लगायेगी। मेरा मानना है कि विरासत के नियम तय हो जायें, एक कानून बन जाये और विरासत का बंटवारा आराम से होने लगे तो टैक्स देने में दिक्कत नहीं होनी चाहिये। सरकार का काम है कानून बनाना, वह बनाये। इसके बावजूद विरोध जारी है पर तथ्य यह है कि कांग्रेस सरकार ने ही इस टैक्स को खत्म किया था तो उन्होंने कह दिया कि ऐसा उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री और अपनी मां इंदिरा गांधी की संपत्ति को विरासत में प्राप्त करने और उसपर टैक्स से बचने के लिए किया था। पर मुद्दा यह है कि यह कानून जिस तारीख से प्रभावी हुआ उससे पहले इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी।
यही नहीं, इंदिरागांधी ने तो नेहरू परिवार की संपत्ति दान कर दी थी और उसमें इलाहाबाद का उनका बंगला आनंद भवन भी है। ऐसे में कौन सी संपत्ति विरासत में प्राप्त करने के लिए राजीव गांधी ने यह कानून खत्म किया होगा। यह भी तथ्य है कि इंदिरा गांधी ने जय प्रकाश नारायण के सवाल के जवाब में कहा था और अब यह सार्वजनिक है कि सांसद नहीं रहने पर उनका खर्च उनके पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू की लिखी किताबों की रॉयल्टी से चल जाता था। ऐसे में नरेन्द्र मोदी क्या बोल रहे हैं वही समझते होंगे और यह लीड बनाने के लिए कितना उपयुक्त है इसे संपादक को तय करना होता है। प्रियंका गांधी ने जनसभा में नरेन्द्र मोदी के आरोप का जवाब दिया और कहा कि उनके पिता को विरासत में शहादत मिली थी। आप समझ सकते हैं कि जनता पर इसका कैसा असर होगा और अब अगर वे कांग्रेस की निराधार आलोचना कर रहे हैं तो उससे क्या लाभ हो सकता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड और सेकेंड लीड लगभग एक जैसी है। भाजपा ने अपने चहेते सांसद बृजभूषण को छोड़कर उनके बेटे को टिकट दिया है। ऐसा क्यों किया है समझना मुश्किल नहीं है पर इसमें वंशवाद देखने वालों को पता होगा कि भाजपा ने अपने पूर्व नेता दिवंगत प्रमोद महाजन की बेटी और सांसद का टिकट काटकर पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब के सरकारी वकील उज्जवल निकम को टिकट दिया है जिनके बारे में चर्चा है कि कसाब को जेल में बिरयानी खिलाने का झूठा आरोप लगाकर इन्होंने उस समय की सरकार की आलोचना करवाई थी और उसी के ईनाम के रूप में अब यह टिकट प्राप्त किया हो सकता है। मेरे सात अखबारों में अकेले द हिन्दू ने प्रज्वल की खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, “प्रज्वल के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज, लुकआउट सर्कुलर जारी”। इस खबर का उपशीर्षक है, कर्नाटक सरकार ने प्रधानमंत्री से कहा कि सांसद के डिपलोमैटिक पासपोर्ट को रद्द कर दिया जाए, पीड़ितों से अपील की है कि वे सामने आयें। महिलाओं के उत्पीड़न और अपहरण के मामले में प्रज्वल के पिता का भी नाम है, एसआईटी के समन को अंजरअंदाज कर अग्रिम जमानत प्राप्त करने का प्रयास।
राज्यपाल पर आरोप
इंडियन एक्सप्रेस भी पश्चिम बंगाल के राज्यपाल की खबर को लीड बनाने वाला मेरा अकेला अखबार है। खबर के अनुसार राजभवन की महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया है कि राज्यपाल ने उसे दफ्तर में बुलाकर छुआ। मुख्य शीर्षक है, “बंगाल के राज्यपाल पर यौन उत्पीड़न का आरोप, उन्होंने कहा ‘कहानी’ झूठी”। उपशीर्षक है, तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने महिला के आरोप को महत्व दिया, राज्यपाल, सीवी आनंद बोस ने कहा, झुकूंगा नहीं, राजभवन में पुलिस का प्रवेश प्रतिबंधित। एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड में बताया गया है कि राज्यपाल को पद पर रहने तक सुरक्षा है। मेरा मानना है कि नैतिक आधार पर अगर मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना चाहिये तो राज्यपाल को भी देना ज्यादा जरूरी है। राज्यपाल तो प्रधानमंत्री द्वारा वैसे ही चुने जा सकते हैं जैसे उन्होंने प्रज्वल को चुना है। लेकिन मुख्यमंत्री तो कई विधायकों का नेता होता है और विधायक जनता के चुने हुए होते हैं।
कांग्रेस को पाकिस्तान से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने जो कहा है उसे इंडियन एक्सप्रेस ने दो कॉलम में छापा है। इसके ठीक नीचे दो कॉलम में शरद पवार के भाषण की खबर है। इसका शीर्षक है, “किसी अन्य प्रधानमंत्री ने ऐसे भाषण नहीं दिये …. वे 230-240 पार नहीं करेंगे :पवार”। इंडियन एक्सप्रेस में बृजभूषण को भाजपा टिकट नहीं मिलने और उनके बेटे को टिकट दिये जाने की खबर भी दो कॉलम में है। शीर्षक में परिवारवाद भी है। नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी को शहजादे कहते हैं तो वह छपता है लेकिन खुद बृजभूषण सिंह को छोड़ नहीं पा रहे हैं और उनकी जगह बेटे को टिकट दे रहे हैं तो अखबारों को परिवारवाद के खिलाफ उनके प्रवचन याद नहीं है। ना ही किसी ने उन्हें और उनके समर्थकों को याद दिलाने की कोशिश की है।
यही हालत, उत्तर प्रदेश में अमेठी और रायबरेली के लिए कांग्रेस के उम्मीदवारों को लेकर रही। राहुल गांधी पिछली बार अमेठी से चुनाव हार गये थे। इसबार भाजपा का दावा 2019 से ज्यादा सीटों का है तो अमेठी से कोई लड़े भाजपा की जीत पक्की होनी चाहिये और राहुल गांधी को हारने के लिए क्यों लड़ना चाहिये? खासकर तब जब वे वायनाड से जीत गये थे और इस बार भी हारने के कोई लक्षण नहीं हैं। दूसरी जगह से उम्मीदवारी तो तभी होगी जब पहली जगह से हारने का शक हो। इस लिहाज से मुझे राहुल गांधी के दो जगह से लड़ने का मतलब नहीं समझ में आता है। फिर भी वे रायबरेली से लड़ रहे हैं और प्रियंका गांधी नहीं लड़ रही हैं तो उनकी आलोचना हो रही है। लड़ें तो वंशवाद, न लड़ें तो लड़की हूं, लड़ नहीं सकती। कायदे से सोनिया गांधी ने यह सीट छोड़ी है तो भाजपा को यहां से मजबूत उम्मीदवार देना चाहिये जो जीत जाये और 400 पार भी हो जाये। लेकिन पत्रकारों को कांग्रेस के उम्मीदवार की ही चिन्ता है और वे चाहते हैं कि प्रियंका गांधी ही लड़ें। भाजपा यह सीट हर जाये या जीतने की उम्मीद ही नहीं करती है।
ठेका कर्मचारी बर्खास्त
जो भी हो इस सरकार में बेरोजगारी बढ़ने के आरोप हैं। इसका कारण नोटबंदी और जीएसटी के कारण छोटे उद्योगों तथा व्यवसायों का बंद होना है। यही नहीं, इस सरकार ने हजारों गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के विदेशी सहायता प्राप्त करने के लाइसेंस रद्द किये हैं और इस कारण कई एनजीओ काम नहीं कर पा रहे हैं औऱ इससे भी बेरोजगारी है। यही नहीं हजारों शेल कंपनियां बंद कराने का दावा किया गया है पर उनकी परिभाषा ही तय नहीं है। इससे भी रोजगार व्यवसाय की संभावानाएं कम हुई हैं। इसका फायदा नहीं मालूम है तब भी सरकार ने ऐसा किया है तो सिर्फ इसलिए कि ऐसे लोग सरकार का विरोध कर सकते हैं और वह ऐसे लोगों को नियंत्रित नहीं कर पाती है। ऐसे में आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहलने पन्ने पर खबर है कि दिल्ली के राज्यपाल ने 2016-17 की एक रिपोर्ट के आधार पर 52 ठेका कर्मचारियों की नौकरी खत्म करने की सहमति दे दी है। आम आदमी पार्टी ने इस बेरोजगारी के लिए दिल्ली के उपराज्यपाल को जिम्मेदार ठहराया है. टाइम्स ऑफ इंडिया में यह बात शीर्षक में नहीं है। द हिन्दू में यह बात शीर्षक में है तो खबर पहले पन्ने पर नहीं है। देश में यह हालत तब है जब 50 दिन में सपनों का भारत बनाना था और नीयत में खोट होने पर किसी भी चौराहे पर चले आना था।


