गोदी मीडिया को आईना दिखाने वालों में एक प्रमुख नाम सौरभ शुक्ला का है। जब गोदी अपने मोदी की चमचागिरी में व्यस्त थे उस वक़्त Saurabh युवाओं के आंदोलन को अपनी ज़मीनी रिपोर्टिंग से बल दे रहे थे।
खाने का इंतज़ाम करने के कारण पुलिस ने जुनैद के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया। देखिए ये रिपोर्ट।
-संजय सिंह, सांसद, राज्यसभा
जिनेश जैन-
मीडिया के लिए सबक
जंतर मंतर के छात्र आंदोलन ने देश की मीडिया को भी कड़वा सबक दिया है। युवाओं ने पक्षपाती व एकतरफा मीडिया को खारिज कर दिया। उसने मैसेज था कि चाटुकारिता अपनाई तो समाज में ऐसी मीडिया के लिए अब कोई जगह नहीं है। यह तेजी से दिख भी रहा है। वो अलग बात है कि मीडिया को यह बदलाव समझ में नहीं आ रहा।
कुछ दशकों में मुख्यधारा की मीडिया अपनी साख को खूब नुकसान पहुंचा चुकी है। चाहे वह प्रिंट हो या टीवी न्यूज चैनल, देश का युवा इनसे पूरी तरह कट गया है। बड़े-बड़े अखबारों का सर्कुलेशन लगातार गिर रहा है। टीवी चैनलों की विश्वसनीयता सबसे निचले स्तर पर है।
इस पतन का कारण कोई रहस्य नहीं है।
वजह है दोनों ही माध्यम को सरकार परस्त होने में आनंद आ रहा है। न्यूजरूम में खबरें जनहित में नहीं, बल्कि सत्ता के संकेतों से तय हो रही हैं। जैसे ही सरकार विरोधी खबरें आती हैं, न्यूजरूम में बैठे साथियों के हाथ कांपने लगते हैं। संपादक से लेकर मालिक ऐसी खबरों को दफन करने में नहीं हिचक रहे हैं। अखबारों और चैनलों पर सरकारों की पीआर वाली खबरें भरी हैं। सवाल है, रीडर ऐसी खबरों को क्यों झेले।
यहां एक बात बहुत गहराई से समझने की है। देश के दिल में सच्चे व निडर पत्रकार के प्रति पूरा सम्मान है। जंतर मंतर के आंदोलन में भी यह सम्मान साफ झलका। युवाओं ने ऐसे स्वतंत्र पत्रकारों से काफी बातें की। उन्हें कवरेज का पूरा मौका दिया। आक्रोश उन चेहरों और संस्थानों से था, जिनका एकमात्र काम सरकारों की चालीसा पढ़ने का रह गया है।
जनता में यह बदलाव एक दिन में नहीं आया है। युवाओं ने बरसों पहले ही अखबारों को पढ़ना लगभग बंद कर दिया। टीवी न्यूज चैनलों से दूरी बना ली है। मीडिया हाउस की मीटिंग में यह सुनने को मिल जाएगा कि युवा क्यों नहीं जुड़ रहा है। कोई भी असली कारण पर नहीं जाना चाहता है। भाई, युवाओं ने हमें ठुकरा दिया है। वह हमारे दोहरे चरित्र से खुश नहीं है।
सच यह है कि मुख्यधारा का अधिकतर मीडिया सरकारी विज्ञापनों और मदद पर जीवित है। मीडिया संस्थानों का लगभग दो-तिहाई रेवेन्यू सरकारों की मेहरबानी पर टिका है। वे सरकार की रेवेन्यू पाने के लिए खुद को सहर्ष सौंप चुके हैं। सरकारी गोद में बैठना मीडिया मालिकों की पसंद बन गया है। अब कोई नहीं कहता है। उसका शिकार सरकार में बैठी छोटी मोटी मछलियां होती हैं। इसी ने पत्रकारिता की आत्मा को छलनी कर दिया है।
दिक्कत यह है, हमारे देश की मीडिया ने कभी अपने पैरों पर खड़ा होना ही सीखा नहीं। उनके पास कोई ऐसा मॉडल नहीं है, जो बिना सरकारी सहायता के उन्हें जिंदा रख सके। छात्र आंदोलन यह ताकीद करता है कि देश को आत्मनिर्भर मीडिया की सख्त जरूरत है। जो जनता की खबरों से सौदा नहीं करे और सरकारों को जिम्मेदार और जवाबदेह बनाकर रख सके।
अब यह भी तय मान लीजिए, अगर प्रिंट और टीवी मीडिया ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया तो उन्हें कोई माफ नहीं करेगा।


