दीपक डोभाल-
“यह यूपीए की सरकार नहीं है, हमारे यहाँ इस्तीफे नहीं होते” राजनाथ सिंह के इस चर्चित बयान को भारतीय राजनीति का न्यू नॉर्मल मानने वालों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि ‘पगलुओं’ की पीढ़ी जिसे ढीठ, उदासीन और सिर्फ पब-जी खेलने वाली नस्ल समझा जा रहा था, वो इतिहास का एक नया अध्याय लिख देगी!
एक टीवी पत्रकार के नाते मैं मानता हूं कि इस समूचे एपिसोड ने हमारे न्यूज़ रूम्स, राजनीति और सामाजिक संवाद के पुराने ढर्रे पर हमेशा-हमेशा के लिए एक बड़ा ‘फुल स्टॉप’ लगा दिया है! अब जो बुनियादी चीज़ें बदली हैं और जो बड़ी चुनौतियाँ सामने आई हैं, उन्हें बिना किसी पॉलिश के समझना ज़रूरी है:
- स्टूडियो-डिबेट पैटर्न की अप्रासंगिकता और कंटेंट जर्नलिज्म का उदय:
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि AC स्टूडियो में बैठकर तय किए जाने वाले प्राइम-टाइम डिबेट्स का पारंपरिक पैटर्न अपनी बौद्धिक प्रासंगिकता खो चुका है! दर्शकों को अब समझ आ गया है कि शाम 5 बजे से रात 10 बजे के शोर-शराबे में कोई ज़मीनी सच्चाई नहीं है! इस आंदोलन ने स्वतंत्र ‘कंटेंट जर्नलिज्म’ और न्यू-मीडिया को जन्म दे दिया है! हाथ में स्मार्टफोन और माइक लिए ग्राउंड पर खड़ा हर युवा, हर निर्भीक क्रिएटर अब अपने आप में एक स्वतंत्र ब्रॉडकास्टर बन चुका है! सूचना का यह प्रवाह अब न्यूज़ रूम्स के ‘टॉप-टू-बॉटम’ कंट्रोल से निकलकर पूरी तरह ‘बॉटम-अप’ हो गया है!
- एल्गोरिदम-हाइजैकिंग और ‘पूर्वाग्रह-मुक्त’ विरोध का साइंस:
इस नई पीढ़ी ने साबित कर दिया कि अपनी बात रखने के लिए पुरानी राजनीतिक उग्रता की ज़रूरत नहीं है! रील्स, एनिमेशन, ट्रेंडी म्यूज़िक और ‘कॉकरोच’ जैसे तीखे Sarcasm का इस्तेमाल करके इन युवाओं ने सोशल मीडिया के एल्गोरिदम को अपने पक्ष में मोड़ दिया! सबसे दिलचस्प बात यह थी कुछ वाकयों को छोड़ दें, तो largely इस प्रोटेस्ट में किसी राजनीतिक दल या पॉलिटिकल विचारधार के प्रति थीमैटिक रूप से कोई Prejudice था ही नहीं! मज़े की बात देखिए कि इन्हीं प्रोटेस्टर्स में से बहुत सारे युवा आज भी पीएम मोदी के प्रशंसक हैं! जब विरोध में कोई वैचारिक नफरत नहीं होती, तो सत्ता के पास उसे किसी नैरेटिव में बाँधकर ख़ारिज करने का कोई अवसर नहीं बचता!
- ‘लीडरलेस’ नेटवर्क और पारंपरिक नियंत्रण का बेअसर होना:
पारंपरिक सिस्टम की आदत रही है कि किसी भी आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए उसके नेतृत्व से संवाद या दबाव की नीति अपनाई जाती है! लेकिन जंतर-मंतर पर कोई एक घोषित चेहरा था ही नहीं! यह एक पूरी तरह से Decentralized नेटवर्क था! जब कोई एक केंद्रीय सिरा ही न हो, तो उसे नियंत्रित करने वाला पुराना प्रशासनिक ढाँचा पूरी तरह से असहाय हो जाता है!
- मिडिलक्लास के कलेक्टिव ट्रॉमा का सड़क पर आना:
यह केवल NEET के पर्चे लीक होने का तात्कालिक गुस्सा नहीं था! यह उस पूरे ‘कलेक्टिव ट्रॉमा’ की अभिव्यक्ति थी जिसे देश का मध्यमवर्ग सालों से चुपचाप झेल रहा था..मैंने अपने शो में कितनी बार डमी स्कूलों की घुटन, कोचिंग हबों का डिप्रेशन और परीक्षा प्रणाली की अनिश्चितता का मुद्दा उठाया! इस साझा दर्द ने सामाजिक विभाजनों को पाटकर उन मा-बाप को भी सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया जो कभी किसी प्रदर्शन का हिस्सा नहीं बनते थे!
- भारतीय राजनीति का नया पुनर्गठन और पारंपरिक ढर्रे का पतन:
इस एक घटनाक्रम ने भारत की पूरी राजनीतिक बिसात का भूगोल बदल दिया है! एक तरफ जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझ आ गया कि अब पारंपरिक स्टाइल ऑफ कम्युनिकेशन से परे जाकर युवाओं के साथ सीधे और ऑर्गेनिक या Authentic Engagement के साथ उतरना पड़ेगा, वहीं कांग्रेस जैसे स्थापित विपक्षी दलों को तो जैसे काठ मार गया! दशकों से राजनीति कर रहे बड़े-बड़े रणनीतिकार बग़लें झांकते रह गए कि बिना किसी राजनीतिक बैनर, फंडिंग या पार्टी कैडर के यह Gen-Z पीढ़ी इतनी तेज़ी से अपना नैरेटिव कैसे सेट कर गई! विपक्ष की पुरानी ढर्रे की धरना-प्रदर्शन राजनीति यहाँ पूरी तरह अप्रासंगिक और असहाय साबित हुई! RSS को भी इस बात का अहसास हुआ कि इस पीढ़ी को आप पुराने अनुशासन या राष्ट्रवाद के मुहावरों से नियंत्रित नहीं कर सकते…इनसे जुड़ना है तो ‘कमांड’ नहीं, बल्कि ठोस ‘लॉजिक’ देना होगा!
- बदसलूकी, गालियाँ और ‘बिलो द बेल्ट’ अटैक:
इस पूरे उभार का एक कड़वा सच और सबसे बड़ा ‘डार्क साइड’ यह रहा कि मेन स्ट्रीम फील्ड पत्रकारों के साथ बदसलूकी हुई, अभद्र टिप्पणियाँ की गईं, गालियाँ दी गईं और कई जगहों पर बेहद घटिया ‘बिलो द बेल्ट’ अटैक किए गए! इस बदज़बानी और हुड़दंग ने आंदोलन के गरिमामय फ्लेवर को काफ़ी हद तक ख़राब करने का काम किया! यह इस नई पीढ़ी का एक ऐसा बड़ा ड्रॉबैक और विकृति है जिसे ‘कोर्स करेक्शन’ का नाम देकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता! यह सीधे-सीधे एक गंभीर चुनौती है! हालाँकि आंदोलन के आख़िरी दौर में कुछ सीनियर लोगों और संजीदा कंटेंट क्रिएटर्स ने इस अराजकता को रोकने और स्थिति को संभालने की कोशिश ज़रूर की, लेकिन ज़मीनी हक़ीकत यह है कि इस मोर्चे पर अभी बहुत काम बाकी है! अगर ‘जेन-जी’ नागरिक चेतना की नई भाषा गढ़ना चाहती है, तो उसे विरोध और गुंडागर्दी के बीच की महीन रेखा को समझना ही पड़ेगा!
कुल-कुलांक बात :
नियंत्रण और नैरेटिव बिल्डिंग का पुराना पूरा तंत्र अब अप्रासंगिक हो चुका है! यह भारत के नागरिक उभार का एक बिल्कुल ‘नया दौर’ है! युवाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि अब मीडिया, राजनीति और संवाद पुराने डिबेट पैटर्न्स पर नहीं चलेंगे….दिशा अब ज़मीनी हक़ीकत और जागरूक आवाज़ों से तय होगी! थोड़ी और लोकतांत्रिक परिपक्वता की उम्मीद के साथ इस ‘पगलू’ पीढ़ी को खूब प्यार और बधाई!


