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आज के अखबार : बताते हैं कि सरकार ने बेहद मजबूरी में इस्तीफा लिया है, राहुल गांधी भी पहले पन्ने पर हैं

Hindi news clipping with an orange bullet and a Hindi headline; brief paragraph discusses statements to the Supreme Court about the Chief Justice.

संजय कुमार सिंह 

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आकाश से गिरे बबूल पर अटके जैसा है। लेकिन यह अलग मामला है। आज अखबारों ने यह भी बताया है कि सरकार ने बला टालने के लिए इस्तीफा लिया है और भले लग रहा है कि इस्तीफा हो गया लेकिन देश के लिए यह कोई राहत की बात नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया का फ्लैग शीर्षक है, अगली वार्ता चार हफ्ते बाद। इसलिए चार हफ्ता देखना दिलचस्प होगा लेकिन जो तृणमूल छोड़कर गद्दारी कर चुके वे क्या पाएंगे? दूसरी ओर सरकार ने अपने एक औऱ विरोधी सोनम वांगचुक को निपटा ही दिया है। सरकार के लिए यह भी उपलब्धि है। प्रहलाद जोशी किसी भी तरह धर्मेन्द्र प्रधान से बेहतर या अलग नहीं है। नुकसानदेह हों तो बाद में पता चलेगा। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड के एक उपशीर्षक का अंश है – भाजपा नेता प्रधान के साथ एकजुट। धर्मेन्द्र प्रधान के हवाले से कहा गया है, ….गुजरे 10 दिन की घटनाओं ने मुझे परेशान किया है …. यह निजी प्रतिष्ठा का मामला नहीं है …. मैंने इस्तीफा दे दिया है। बताना यह है कि जब निजी प्रतिष्ठा का मामला नहीं था तब इस्तीफा देने में 10 दिन लगे, परेशान रहे तब भी। कारण दूसरी खबरों में है, उसपर आगे। आज खबर यह भी नहीं है कि सीधे बात करने वाले प्रधानमंत्री ने कॉक्रोचों से जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह के जरिए बात की और सोनम वांगचुक को तो अनशन खत्म करने के लिए मजबूर ही कर दिया। योजनाबद्ध ढंग से खबर छपवाई फिर भी बात नहीं बनी तो इस्तीफा हुआ। इस्तीफा क्यों हुआ या क्यों लेना पड़ा इसपर आज कई खबर हैं। अमर उजाला, हिन्दुस्तान टाइम्स और दूसरी खबरों के अनुसार) अभिजीत दिपके ने कहा है, मैं सीजेआई सूर्यकांत का आभार जताता हूं कि उन्होंने हमें कॉक्रोच कहा। अगर आपने हमें कॉक्रोच नहीं कहा होता …. तो प्रधान का इस्तीफा नहीं होता। इसके साथ यह भी सही है आंदोलन नहीं होता तो सैकड़ों छात्र पुलिस के डंडों का शिकार नहीं होते। पुलिस ने जो ज्यादती की उसपर सीजेआई ने सुनवाई नहीं की, टाल दिया वह अलग मामला है। सोनम वांगचुक को गिरफ्तार नहीं किया गया था लेकिन उन्हें पसंद की अस्पताल जाने में तीन दिन लगे। वह भी वे लगभग जबरन ही कर पाए। जैसे उठाया और जैसे परेशान किया गया वह सब अलग।

इंडियन एक्सप्रेस के बैनर हेडलाइन का आधा फ्लैग शीर्षक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का बयान है – भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए देश, युवा, छात्र किसी भी पद से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इसपर मेरा मानना है, अगर ऐसा है तो पूरी सरकार का इस्तीफा होना चाहिए था। उसके बारे में तो कोई सोच भी नहीं रहा है लेकिन सोशल मीडिया पर एक वीडियो घूम रहा है जिसमें एक भगवा गमछाधारी लंपट ने दो कॉक्रोचों को गालियां दी हैं, मारा है और धमकाया है। अभी तक इसपर किसी कार्रवाई की खबर नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार की कोशिश कॉक्रोचों के आंदोलन के साथ उन्हें निपटाने की भी थी। आज सोनम वांगचुक के मुकाबले राहुल गांधी की फोटो और खबर ज्यादा है। देशबन्धु में टॉप पर दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, मोदी सरकार को हटाने का वक्त आ गया है : राहुल। कांग्रेस नेता ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफा को छात्रों की जीत नवोदय टाइम्स में आज राहुल गांधी की खबर डेढ़ कॉलम में है और फोटो आधे कॉलम में। खबर का शीर्षक है, छात्रों की जीत हुई, अब सरकार को हटाने का वक्त। अमर उजाला में इस्तीफे के बाद पहला बयान के तहत धर्मेन्द्र प्रधान की खबर राहुल गांधी की खबर के बराबर ही है। थोड़ी सी बड़ी हो सकती है, ऊपर तो है ही। इसका कोई नियम नहीं है, संभव है कोई कारण भी नहीं हो। लेकिन हर बार राहुल गांधी पीछे या नीचे रहें तो उसका कारण होगा या मामला मानसिकता का हो सकता है और वह अक्सर दिखता है। दैनिक भास्कर में राहुल गांधी की खबर, ‘पक्ष विपक्ष ये कह रहे….’ के तहत है। सबसे ऊपर अमित शाह, राहुल गांधी और फिर सबसे नीचे सोनम वांगचुक को रखा गया है। राहुल गांधी ने जो कहा है उस लिहाज से तो यह खबर आज लीड भी बन सकती थी पर वह अलग मामला है। दैनिक भास्कर के अनुसार उन्होंने कहा है, अमित शाह ने पेलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति दी। इसे संसद में उठाएंगे। युवाओं की आवाज न सुनी तो भविष्य में इससे भी बड़ा आंदोलन हो सकता है। अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ ने दो कॉलम की खबर के साथ राहुल गांधी की फोटो छापी है। इसका शीर्षक है – विपक्ष ने छात्रों की प्रशंसा की, मोदी, आरएसएस पर आरोप लगाए। अखबार ने इस खबर के साथ रायटर की फोटो छापी है जिसका कैप्शन है, नई दिल्ली में आयोजित एक मीडिया कांफ्रेंस में एआईएसए की प्रेसिडेंट नेहा बोरा, सीपीआईएमएल लिब्रेशन पार्लियामेंट्री पार्टी के ऑफिस इंचार्ज एन साई बालाजी और राहुल गांधी। दि एशियन एज ने राहुल गांधी की खबर को आनुपातिक जगह दी है। सोनम वांगचुक का पक्ष यहां और ज्यादातर अन्य अखबारों में भी नहीं है। इसलिए माना जा सकता है कि उन्होंने कुछ कहा नहीं है या उनसे किसी ने उनका पक्ष मांगा ही नहीं। सात कॉलम की लीड के नीचे ठीक बीच में चार कॉलम की खबर के बीच में दो कॉलम की फोटो है। यह उसी कांफ्रेंस की लगती है जिसकी फोटो द टेलीग्राफ ने छापी है। हालांकि इस फोटो में राहुल गांधी ही मुख्य रूप से दिख रहे हैं। इस खबर का मुख्य शीर्षक है – राहुल गांधी ने कहा, ‘सत्ता बदलने’ का समय। फ्लैग शीर्षक है, विपक्ष अयोध्या में चंदा चोरी, ई20 और मणिपुर हिंसा पर सरकार को घेरेगा। अंग्रेजी अखबार, द हिन्दू में राहुल गांधी की कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है। हालांकि, सात कॉलम की लीड के तीन उपशीर्षक में एक राहुल गांधी की बात है, यह किसानों, मजदूरों, गरीबों के लिए संकेत है कि इस दमनकारी सरकार के खिलाफ उठ खड़े हों। इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर राहुल गांधी की फोटो या शीर्षक में नाम नहीं है।

प्रधान का इस्तीफा लेने की मजबूरी

अमर उजाला में चार कॉलम के बॉटम के अनुसार, आईबी और (अमित) शाह की रिपोर्ट से चिंतित थी सरकार। इसमें बताया गया है कि आईबी को अंदेशा था कि हल नहीं निकला तो हालात बेकाबू हो सकते हैं। इस्तीफे से 24 घंटे पहले आईबी, गृह मंत्री अमित शाह व संघ-भाजपा की अलग-अलग रिपोर्ट ने नीट पेपर लीक आंदोलन मामले में सरकार की चिंता बढ़ा दी थी। सबसे अहम आईबी की वह रिपोर्ट थी, जिसमें अंदेशा जताया गया था कि अगले 48 घंटे में समाधान नहीं निकाला गया तो आंदोलन हाथ से निकल सकता है। इसी दौरान गृह मंत्री की रिपोर्ट में समाधान न निकलने पर विपक्षी एकता के फिर से बहाल होने और भाजपा संघ की रिपोर्ट में आंदोलनों के राज्य में व्यापक रूप धारण करने का अंदेशा जताया गया था। खुफिया इनपुट में यह बात साफ हो चली थी कि अगर रविवार और सोमवार तक समाधान नहीं निकला तो युवाओं का यह प्रदर्शन सरकार के हाथ से पूरी तरह निकल सकता है। इस रिपोर्ट के बाद आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर ताबड़तोड़ निर्णय लिए गए। राजधानी में केंद्रीय बलों की 45 कंपनियों को मोर्चे पर लगाया गया। आईबी के इनपुट पर 16 कंपनियों को विभिन्न राज्यों से दिल्ली में रिपोर्ट करने के लिए कहा गया। इनपुट बता रहे थे कि दिल्ली ही नहीं, बल्कि दूसरे प्रदेशों में भी छात्रों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। पहले सरकार मानकर चल रही थी कि सोनम वांगचुक का अनशन खत्म होने के बाद छात्रों का आक्रोश शांत हो जाएगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सोनम का अनशन खत्म हुआ, लेकिन प्रदर्शन तेज हो गया और कई राज्यों में फैल गया। सरकार को परिसीमन व महिला आरक्षण बिल की चिन्ता थी क्योंकि बिल को समर्थन दे रहे दल आंदोलन से असहज थे। संभव है सूत्रों की यह खबर सरकारी प्लांटेशन हो ताकि आंदोलन खत्म करने में सफलता पाने का श्रेय भी मिले और जो हुआ उसे जरूरी भी माना जाए। दैनिक भास्कर ने लिखा है कि प्रधान ने पांच दिन पहले इस्तीफे की पेशकश की थी; फैसला तब (हुआ) जब आंदोलन देश में तेजी से फैलने लगा। आगे – अब सरकार का ध्यान मानसून सत्र के एजंडे पर होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार को यह भी बताना है कि धर्मेन्द्र प्रधान महान हैं और इसीलिए उन्हें हटाया नहीं जा रहा था फिर भी उन्होंने इस्तीफा देकर जो महानता दिखाई है वह भाजपा में बहुत आम नहीं है। इससे पहले ऐसा कांग्रेस से आयातित एमजे अकबर ने ही किया था जिनपर मीटू के आरोप थे। संभवतः इसी क्रम में भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा है और नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर छपा है, प्रधान का इस्तीफा ईमानदारी का उच्चतम मानदंड।  

अंग्रेजी अखबारो में टाइम्स ऑफ इंडिया ने तीन कॉलम की खबर छापी है, वांगचुक के मामले में जो हुआ (आधी रात को अनशन तुडवाना और अनुकूल खबर छपवाना)  उससे विरोध प्रदर्शन खत्म नहीं होने पर सरकार ने इस्तीफे की मांग मानी। खबर के अनुसार प्रधान 2014 से मंत्री है और उनके इस्तीफे से पार्टी को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। इंडियन एक्सप्रेस ने एक्सप्रेस स्पेशल में लिखा है, फास्ट ट्रैक कोर्ट, अपराधियों को सजा देने के लिए सख्त कानून बनाने के आश्वासनों से भी प्रधान को लेकर भावनाएं अनुकूल नहीं हो रही थीं। भाजपा और सरकार के शिखर के सूत्रों के हवाले से कहा गया है, 48 घंटे पहले इस्तीफा सरकार के दिमाग में नहीं था। लेकिन पुलिस की सख्त कार्रवाई के बावजूद आंदोलन तेज हो गया और सरकार को चिन्ता थी कि मामला नहीं निपटा तो संसद का मानसून सत्र बेकार जा सकता है। इसके अलावा, सरकार के भिन्न प्रयासों और घोषणाओं का भी फायदा नहीं हुआ था। हिन्दुस्तान टाइम्स ने तीनों मांग और उनकी स्थिति बताने के लिए एक तालिका पेश की है। पहली मांग तो ठीक है, पूरी हो गई लेकिन दूसरी आत्महत्या करने वाले नीट परिक्षार्थियों को एक करोड़ रुपए देने की मांग थी। नड्डा ने यह कहा बताते हैं कि सरकार नियमों के अनुसार सम्मानजनक क्षतिपूर्ति देने के लिए सहमत हुए हैं। तीसरी मांग आंदोलनकारियों के खिलाफ  एफआईआर वापस लेने की थी। इसका आश्वासन है। देखा जाए। मुझे इस सरकार पर भरोसा नहीं है। असल में इच्छा शक्ति की ही कमी दिखती है – लेकिन वह अलग मुद्दा है। द हिन्दू की खबर में एक उपशीर्षक है, ‘पीएम को माफ़ी मांगनी चाहिए’। इसमें कहा गया है, छात्रों को उनकी जीत पर बधाई देते हुए, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि मिस्टर प्रधान का हटना शिक्षा व्यवस्था को फिर से बनाने की दिशा में एक “प्रतीकात्मक” लेकिन बड़ा कदम है। हालांकि, उन्होंने कहा कि अभी भी दो और मांगें हैं, 1) जिन लोगों ने छात्रों के साथ मारपीट की, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाए  और प्रधानमंत्री को छात्रों से माफ़ी मांगनी चाहिए। राहुल गांधी ने आगे कहा, डरो मत।आइए इस सरकार से छुटकारा पाएं।” एक्स पर पर एक पोस्ट में, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने लिखा है, “प्रधानमंत्री को युवाओं से माफ़ी मांगनी चाहिए। जिन्होंने लाठी और पैलेट गन का इस्तेमाल किया, उनके खिलाफ़ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।” चर्चा यह भी है कि भाजपा ने इससे बचने के लिए शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लिया। 

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।   

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