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सियासत

गोदी मीडिया को क्यों पसंद आ गये दिलीप मंडल?

श्याम मीरा सिंह-

लितों में स्कॉलरों की कमी नहीं है, दलितों में लेखकों और बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है. लेकिन गोदी मीडिया को जब दलितों के मुद्दों पर बुलवाना था तो उन्होंने बनिया- दलित चिंतक को बुलाना शुरू कर दिया. दिलीप मंडल दलित मुद्दों पर साथ देते देते दलितों के प्रतिनिधि बन गए. जहाँ भी आज दलित प्रश्न पर बात होगी दिलीप मंडल को बोलने के लिए बुला लिया जाता है.

इंट्रेस्टिंग बात ये है कि वे खुद दलित नहीं हैं. ये ऐसे हुआ जैसे महिला अधिकारों पर बात करने वाले किसी पुरुष को, धीरे धीरे फेमिनिज्म का नेता बना दिया जाए. और फेमिनिज्म पर होने वाले इंटरव्यूज की सीट पर किसी महिला की जगह पुरुष को ही बुलाना शुरू कर दिया जाए. कोई भी प्रगतिशील व्यक्ति जाति धर्म, वर्ग देखे बिना क्रोस सपोर्ट कर सकता है. करना चाहिए यही शिक्षा का मंतव्य है. लेकिन दूसरे समाज, दूसरे वर्ग, दूसरे लिंग का व्यक्ति दूसरे वर्ग का नेता, मसीहा या प्रतिनिधि नहीं हो सकता. सहयोग करना अलग है, प्रतिनिधित्व अलग है, कन्धा बनना अलग है, मुकुट बन जाना अलग. समर्थक बनना अलग है और नेता ही बन जाना अलग है.

ये महीन मगर सरल सी बात है. अन्य वर्गों और जातियों के लोग उनका साथ दे सकते हैं, उनके मुद्दों पर समर्थन जता सकते हैं, आन्दोलनों में जा सकते हैं, लेकिन उनके मंच पर जाकर मुख्य अतिथि नहीं बन सकते. दलित मुद्दों के लिए आयोजित मंच का मुख्य अतिथि केवल एक दलित हो सकता है, आदिवासी मुद्दे पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एक ठाकुर, ब्राहमण, बनिया, यादव, जाट या गुर्जर कैसे हो सकता है? मानकर चलिए मैं दलितों के मुद्दों पर उनकी बातों से सहमती जताऊँ, या उनका समर्थन करूं, और कल कोई दलितों के मुद्दे पर किसी बड़े कार्यक्रम में मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाए तो मेरा रिप्लाई क्या होना चाहिए? स्वभाविक है मैं कहूँगा कि मैं दलितों, आदिवासियों या अन्य किसी वंचित वर्ग का महज एक समर्थक हूँ, उनका नेता नहीं, उनका प्रतिनिधि नहीं. आप दलित मुद्दे पर बोलने के लिए गैर दलित को कैसे बिठा सकते हैं?

ANI पर इंटरव्यू का मौका बहुत कम लोगों को मिलता है, ये विरली जगह हैं, समाज की दिशा, दशाएं इन समाजिक डिस्कोर्स के मंचों से तय होती हैं. यहाँ कोई पुरुष किसी स्त्री का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? कैसे कोई ठाकुर चार बातें बनाकर पूरे दलित वर्ग का नेता बन सकता है? हाँ वह सहयोगी बने, समर्थक बने, समान रूप से बैठे, उठे, खाए पीये नारे लगाए, लेकिन उसे दलितों के प्रतिनिधित्व के आरक्षित जगह क्यों मिलनी चाहिए. उसे राजपूत समाज में प्रतिनिधित्व करना चाहिए और अपने समाज को दलित समाज के प्रति संवेदनशील बनाना चाहिए. वहां वह नेता बने, मसीहा बने, प्रतिनिधित्व करे उसका पूरा हक़ है. लेकिन वैसे ही दलित मुद्दों पर प्रतिनिधित्व का हक़ केवल दलितों का है, मुसलमानों के मुद्दों पर प्रतिनिधित्व का मुद्दा केवल मुसलमानों का है. आदिवासियों का प्रतिनिधित्व केवल आदिवासी कर सकता है. ये नहीं है कि ब्राहमणों का नेतृत्व भी तुम करो, राजपूतों का नेतृत्व भी तुम करो और दलितों आदिवासियों के नेता भी तुम ही बन जाओ.

दिलीप मंडल जगह जगह मंचों पर गए, दलितों के नाम पर उन्हें अनगिनत जगहों पर बुलाया गया, मुसलमानों ने भी उन्हें दलित समझ अपने मंचों पर बुलाया. उन्होंने अपनी पहचान एक दलित मसीहा की तरह स्थापित की, लेकिन कभी नहीं बताया कि वे दलित नहीं हैं, वे बनिया हैं. सबसे बड़े मीडिया संस्थान में दलितों के मुद्दे पर इंटरव्यू का मौका आया तो दलित वर्ग से आने वाले किसी स्कॉलर को बुलाने के बजाय वे खुद गए, फिर अलग अलग पॉडकास्ट में गए, क्या दलितों के पास स्कॉलर नहीं थे? या दलितों के पास अपने पत्रकार नहीं थे. अगर दलितों के मुद्दे पर इंटरव्यू में गेस्ट होने की जगह एक बनिया खा जाएगा तो दलित वर्ग से आने वाले भंवर मेघवंशी का नंबर कब आएगा? फिर राहुल सोनपिम्पले को कौन बुलाएगा? सुमित चौहान को मीडिया इंटरव्यू देने क्यों नहीं बुलाती? मीना कोटवाल को भारत के टीवी मीडिया में कितनी बार बुलाया गया?

इन्हें क्यों नहीं बुलाया जाता? इन्हें कब बुलाया जाएगा? यहाँ दिलीप मंडल की जिम्मेदारी बनती थी कि वे अपना पत्रकारीय कार्य करते मगर जहाँ मंचों पर दलितों के रूप में किसी गेस्ट को बुलाने की बात आती, इंटरव्यू की बात आती, तो वे किसी दलित स्कॉलर को कॉल करके जाने के लिए बोलते. होस्ट से कहते कि मैं दलित नहीं हूँ, वह जगह मेरी नहीं है. मैं दलितों के पीड़ा समझ सकता हूँ मगर पूरा दलित कैसे हो सकता हूँ, दलित के रूप में मैंने जब जीवन जिया ही नहीं तो मैं दलितों का प्रतिनिधि कैसे हो सकता हूँ एक मंच पर?

अभी तक दिलीप मंडल को भी मीडिया में नहीं बुलाया जाता था, सब जानते हैं भारत का टीवी मीडिया दो तीन जातियों के हितों के बाहर नहीं जा सकता. ऐसे किसी आदमी को जगह नहीं दे सकता जो ऊपर की दो तीन जातियों को नुकसान पहुंचाए. दलित चेतना पर तीक्ष्ण बोलने और लिखने वाले लोगों का इंटरव्यू आज तक ANI ने नहीं लिया, वे कभी नहीं लेंगे. भारत के मीडिया ने कभी हंसराज मीणा, बबिता कुमारी, मीना कोतवाल, भंवर मेघवंशी को टीवी पर नहीं बुलाया? हाँ वे कई बार इस्लामी चरमपंथियों को जगह देते हैं क्योंकि इससे समाज में विभाजन करने का मौका मिलता है, लेकिन वे कभी पढ़े-लिखे मुस्लिम स्कॉलर को नहीं बुलाएंगे. क्योंकि इससे मुस्लिम समाज के अच्छे लोग टीवी पर दिखेंगे. जबकि मीडिया मुस्लिमों की खास छवि दिखाना चाहती है.

ANI कभी दलित समाज से आने वाले- भंवर मेघवंशी, राहुल सोनपिन्प्ले, सुमित चौहान, मीना कोटवाल को इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाएगी? क्यों? क्योंकि मीडिया के पास दिलीप मंडल जैसे ‘मैनेज्ड एंड compromised लोग हैं, जो दलितों के स्पेस को खाने के लिए ही नहीं बल्कि उसे बेचने के लिए भी तैयार हैं. बेच भी रहे हैं.

दलित विमर्श कांग्रेस विरोधी हो सकता है, सपा विरोधी हो सकता है. लेकिन वह कभी भी भाजपा समर्थक नहीं हो सकता. आरएसएस समर्थक नहीं हो सकता. जितना मैंने आम्बेडकर को पढ़ा उसमें यही पाया कि इन्होने इस्लामी चरमपंथ की जितनी आलोचना की, अपरकास्ट सोच की जितनी आलोचना की उतनी ही उन्होंने हिंदू राष्ट्र और हिंदू चरमपंथ की की. आज आरएसएस और भाजपा उसी सोच के प्रतिनिधि हैं. और अपने चरम पर हैं जिसकी कठोर आलोचना डॉक्टर साहब आम्बेडकर ने की. लेकिन यहाँ एक अनोखा दलित विमर्श खड़ा किया जा रहा है जो कांग्रेस विरोधी है, अखिलेश विरोधी है, लेकिन भाजपा समर्थक है, वह अमित शाह में ताकतवर नेता देखता है, मोदी में उद्धारक. इसलिए आरएसएस प्रेमी मीडिया को दिलीप मंडल के रूप में ऐसा व्यक्ति मिल गया जो असली दलित, असली आदिवासी, असली अति पिछड़े वर्ग से आने वाले व्यक्ति की जगह बुलाया जा सकता है. और वह बाहरी तौर पर एक आदिवासी, एक दलित जितना ही है. मतलब कमसे उसका सामाजिक आवरण तो यही है, भले ही असल में वह नहीं है.

मुसलमानों से लेकर अन्य प्रगतिशील समूहों के मंचों पर दिलीप मंडल ‘दलित मसीहा’ के रूप में बुलाए गए, उन्होंने दलित वर्ग की बातें भी रखीं, आज जब बड़े हो गए तो उस ताकत की बारगेनिंग करने लगे, भाजपा-आरएसएस से तोल-मोल में जुड़ गए. इस तरह सामाजिक डिस्कोर्स में जो प्रतिनिधित्व दलितों, आदिवासियों, अति पिछड़ों को मिलना चाहिए था उस पर दिलीप मंडल बैठ गए. इसलिए पॉडकास्ट से लेकर इंटरव्यूज में दलितों की बात जहाँ होती है वहां उन्हें बुलाया जाता है. जो जगह भंवर मेघवंशी की थी, जो जगह सुमित चौहान की थी, जो जगह मीना कोतवाल और बबिता कुमारी की थी, जो जगह राहुल सोनपिन्प्ले जैसे तेज तर्रार विचारक और वक्ता की थी वहां दिलीप मंडल बैठ गए. मतलब जिस चीज की लड़ाई दलित विमर्श ने शुरू की कि वे सक्षम हैं, योग्य हैं किसी से कम नहीं, वे अपनी लड़ाई और अपना प्रतिनिधित्व खुद कर सकते हैं., उन्हें किसी ठाकुर, बनिया, जाट, राजपूत, गुर्जर, यादव, पटेल की जरूरत नहीं है वही हो गया. पूँछ की तरह लटका एक समाज, और ऊपर मुकुट पर बैठा एक दूसरे वर्ग का आदमी. विडंबनापूर्ण, हास्यास्पद परिणाम.

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