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प्रेस काउंसिल की तर्ज पर बने जर्नलिस्ट काउंसिल

इलाहाबाद। श्रृंग्वेरपुरधाम में हुए पत्रकार सम्मेलन में पत्रकारों का दर्द छलका। कहा गया कि हर महीने लाख-हजारों रूपए पगार उठाने, एयरकंडीशन दफ्तर और कंफर्टेबल चेयर पर बैठकर काम करने वाले पत्रकारों को श्रमजीवी पत्रकारों की श्रेणी में रखा गया है, पर देहात-कस्बों में बिना किसी पगार व सुविधा के कई साल से काम कर रहे पत्रकारों को श्रमजीवी पत्रकार का दर्जा नहीं दिया जाता। जबकि देश के अस्सी फीसदी हिस्से में ऐसे ही पत्रकार काम कर रहे हैं। ऐसे पत्रकारों के साथ भेदभाव कब तक किया जाएगा? पत्रकारों ने आवाज उठाई कि मौजूदा हालात के मद्देनजर प्रेस काउंसिल की तरह जर्नलिस्ट काउंसिल बनाया जाना चाहिए, जो केवल पत्रकारों के लिए कार्य करे।

इलाहाबाद। श्रृंग्वेरपुरधाम में हुए पत्रकार सम्मेलन में पत्रकारों का दर्द छलका। कहा गया कि हर महीने लाख-हजारों रूपए पगार उठाने, एयरकंडीशन दफ्तर और कंफर्टेबल चेयर पर बैठकर काम करने वाले पत्रकारों को श्रमजीवी पत्रकारों की श्रेणी में रखा गया है, पर देहात-कस्बों में बिना किसी पगार व सुविधा के कई साल से काम कर रहे पत्रकारों को श्रमजीवी पत्रकार का दर्जा नहीं दिया जाता। जबकि देश के अस्सी फीसदी हिस्से में ऐसे ही पत्रकार काम कर रहे हैं। ऐसे पत्रकारों के साथ भेदभाव कब तक किया जाएगा? पत्रकारों ने आवाज उठाई कि मौजूदा हालात के मद्देनजर प्रेस काउंसिल की तरह जर्नलिस्ट काउंसिल बनाया जाना चाहिए, जो केवल पत्रकारों के लिए कार्य करे।

श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि, विख्यात पौराणिक स्थल श्रृंग्वेरपुरधाम में गंगातट पर आयोजित पांच दिवसीय राष्ट्रीय रामायण मेला का तीसरा दिन पत्रकार सम्मेलन को समर्पित था। यूपी के अलावा बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में पत्रकारों का जुटान हुआ। भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के बैनर तले ‘राष्ट्र निर्माण में पत्रकारों की भूमिका’ विषयक संगोष्ठी हुई। इस दौरान पत्रकार और पत्रकारिता की मौजूदा विसंगतियों को लेकर कई मुद्दों पर चर्चा हुई। कहा गया कि पत्रकारिता पर संकट है, पर उससे बड़ा संकट पत्रकारों के सामने है। अनिश्चय का माहौल है। संपादक से लेकर संवाद सूत्र तक इसकी चपेट में हैं।

प्रस्ताव आया कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की तरह जर्नलिस्ट काउंसिल बने और इसका विस्तार राज्यों तक होना चाहिए। पत्रकारों की मान्यता भी तहसील और कस्बा स्तर तक लागू की जाए। तर्क दिया गया कि पचास साल पुराने नियम को मौजूदा परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो काफी विसंगतियां सामने आ रही हैं। शहरों की तरह देहात में भी पत्रकारीय प्रतिस्पर्धा तेज हुई है। ब्लॉक, तहसील और कस्बों के पत्रकारों पर वर्क लोड बढ़ा है। सभी बीट्स पर अकेले कार्य करते हैं। आठ दस किमी रेंज की खबरों को कवर करना, बाहर के अन्य एडीशन के लिए आनन फानन भेजना, विज्ञापन और प्रसार भी देखना… काफी मेहनत होती है। आठ-दस घंटे की मेहनत। पेट्रोल, मोबाइल का खर्च जेब से देना पड़ता है। अखबार मानदेय तक नहीं देते। दोयम दर्जे की दशा में काम करना पड़ रहा है। ज्यादातर अखबार इनको पत्रकार न मानकर सामाजिक सेवा करने वाला मानते हैं। इस आशय का फार्म भी भरा लिया जाता है। देश के करीब अस्सी फीसदी रेंज में बिना किसी पगार या मानदेय के काम करने वाले ये मेहनतकश पत्रकार ही असली श्रमजीवी हैं। कायदे से सरकारी सुविधा के पहले हकदार तो यही पत्रकार हैं। देहात में कार्य करने वाले पत्रकारों को परिवहन, चिकित्सा, आवास, सुरक्षा समेत सरकारी मान्यता भी दिया जाना चाहिए।

मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति सुधीर नारायण ने पत्रकारिता को चुनौती भरा पेशा बताते हुए कहा कि पहले की अपेक्षा हालात काफी बदल गए हैं। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया केवल मीडिया संस्थानों तक सिमट कर रह गया है, ऐसे में जर्नलिस्ट काउंसिल बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसके पहले वरिष्ठ पत्रकार बृजेंद्र प्रताप सिंह ने ठेके की पत्रकारिता के खतरों का जिक्र किया। पत्रकारों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि चुनौतियों का डटकर मुकाबला करें। साफतौर पर कहा कि पत्रकारों का सबसे बड़ा नुकसान उन मठाधीश टाइप के पत्रकारों से हो रहा है, जो शीर्ष पदों पर बैठे निर्णायक भूमिका में हैं। वे पत्रकारो से ज्यादा मालिकों के हितैषी बने हैं।

अमृत प्रभात के कार्यकारी संपादक एवं भारतीय पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुनेश्वर मिश्र ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की कार्यशैली पर निशाना साधते हुए कहा कि अक्सर पत्रकारों के उत्पीड़न के मामले में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की चुप्पी अखरने वाली होती है। सबलोग पत्रिका के यूपी ब्यूरोचीफ शिवाशंकर पांडेय ने शहरी-गैर शहरी पत्रकारों की दशा का जिक्र करते हुए नए सिरे से बदलाव करने पर जोर दिया। कहा कि धंधेबाज मीडिया हाउस में  पत्रकारिता कैद हो गई है। जुगाड़ संस्कृति हॉवी है। पांव पसारती ‘अखबारी-बनियागीरी’ ने पत्रकारिता को चौपट कर दिया है।

भारतीय पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक भगवान प्रसाद उपाध्याय ने पत्रकारों की लड़ाई को लड़ने का संकल्प दोहराया। कहा कि तहसील और कस्बा स्तर पर कार्य करने वाले पत्रकारों को सरकारी मान्यता दी जानी चाहिए। मथुरा प्रसाद धुरिया, राजीव ओझा, डॉ0 बालकृष्ण पांडेय, छत्तीसगढ़ से आए पत्रकार श्याम नारायण श्रीवास्तव, मध्य प्रदेश के पुरूषोत्तम मिश्रा, नोएडा के राहुल चौहान, सच्चिदानंद मिश्र, अंजनी पांडेय, विजय यादव समेत अन्य कई पत्रकारों ने विचार रखे। इस अवसर पर जेएन यादव, विनोद मिश्र, रूमा मित्रा, सुरेंद्र प्रताप नारायण पांडेय, रिजवान उल्ला, विनोद तिवारी ‘चंदन’ अनिल तिवारी ’ब्रम्हानंद’ आदि सैकड़ों पत्रकार मौजूद रहे। इस दौरान कई पत्रकारों को सम्मानित भी किया गया।

वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रपट. मोबाइल- 9565694757

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