
संजय कुमार सिंह
आज मेरे आठ में से पांच अखबारों में मणिपुर की खबर लीड है। तीन अखबारों – इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और दि एशियन एज में यह लीड नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में यह सेकेंड लीड है और जो लीड है वह दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से तो नहीं ही है। इसलिये यह मामला बाकी के दो अखबारों से अलग है। वैसे भी इन दोनों अखबारों में मणिपुर सिंगल कॉलम की खबर है और जो लीड है उसके बारे में जानकर आप समझ सकेंगे कि मणिपुर की खबर का लीड नहीं होना क्यों महत्वपूर्ण है। आज इन्हीं खबरों की चर्चा। मेरा मानना है कि हेडलाइन मैनेजमेंट सरकार तो करती-कराती और चाहती ही है, अखबार भी अपनी तरफ से सेवा में ऐसा करते हैं। आइये, सबसे पहले मणिपुर की खबर को जान लें। इसके लिए पांच अखबारों की लीड के बाद इंडियन एक्सप्रेस की सेकेंड लीड और फिर इन दोनों अखबारों के सिंगल कॉलम के शीर्षक देख लीजिये।
1. नवोदय टाइम्स
मंत्रियों विधायकों के घर में घुसे प्रदर्शनकारी। फ्लैगशीर्षक है, मणिपुर के जिरीबाम में तीन लोगों के शव मिलने के बाद भड़का आक्रोश।
2. अमर उजाला
मणिपुर में फिर हिंसा, मंत्रियों-विधायकों के घरों पर हमला, तोड़फोड़ और आगजनी। उपशीर्षक है, छह हत्याओं के बाद इंफाल घाटी के पांच जिलों में बेमियादी कर्फ्यू, सात जिलों में इंटरनेट बंद।
3. टाइम्स ऑफ इंडिया
मणिपुर में प्रदर्शन, मुख्यमंत्री के रिश्तेदार और मंत्रियों के घरों पर हमला। इंट्रो है, तीन जिलों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू, सात में इंटरनेट प्रतिबंध।
4. द हिन्दू
मणिपुर में शव मिलने के बाद अराजकता की शुरुआत। उपशीर्षक है, प्रदर्शनकारियों ने इंफाल में विधायक के घर पर हमला किया और सभी विधायकों से कहा कि ‘महिलाओं व बच्चों के हत्यारों’ को सजा नहीं दिला सकते तो छोड़ दें; इंफाल ईस्ट, इंफाल वेस्ट, बिष्णुपुर में कर्फ्यू लागू।
5. द टेलीग्राफ
हत्याओं ने क्रोधोन्माद को नये सिरे से तेजी दी। फ्लैग शीर्षक है, मणिपुर के प्रदर्शनकारियों का गुस्सा भाजपा के मंत्रियों, विधायकों पर।
6. इंडियन एक्सप्रेस
जिरीबाम में आग से इंफाल झुलसा : भीड़ ने मुख्यमंत्री बिरेन, विधायकों के घरों को निशाना बनाया। उपशीर्षक है, महिला, दो बच्चों के शव मिले कर्फ्यू लगाया गया
7. दि एशियन एज
मणिपुर में प्रदर्शनकारियों ने दो मंत्रियों, तीन विधायकों के घर पर धावा बोला
8. हिन्दुस्तान टाइम्स
प्रदर्शनकारियों द्वारा दुकानें जलाये जाने के बाद इंफाल में कर्फ्यू (यह सूचना किसी और शीर्षक में नहीं है, संभव है मुख्यमंत्री, विधायकों, मंत्री के घरों पर हमले के बाद इसे सामान्य माना गया हो। और तब दूरी किसी शहर में कर्फ्यू लीड बने यह जरूरी नहीं है।
मणिपुर की खबर कर्फ्यू के बाद या उसके बिना बड़ी खबर है। डेढ़ साल से ज्यादा समय से वहां हिंसा चल रही है। सरकार ने जो किया, जैसे किया जब यह दिखाने की कोशिश की कि स्थिति सामान्य हो रही है तो अचानक बिगड़ गई और छह थाना क्षेत्रों में फिर से आफस्पा लागू करना पड़ा। भारतीय सेना अपने इन विशेष अधिकारों से कितनी मजबूत होती है और स्थिति नियंत्रण में लाने में ये अधिकार कितने मददगार होते हैं वह अलग मामला है। असल में इन अधिकारों के दुरुपयोग की शिकायत ज्यादा है और इससे सैनिकों को अपने ही देश के नागरिकों से ज्यादाती करने के अधिकार मिल जाते हैं। इसके बाद जो होता है वह सबको पता है और अभी मुद्दा नहीं है। अभी मुद्दा यह है कि दिल्ली के मेरे जिन दो अखबारों ने इन्हें लीड नहीं बनाया उनकी लीड क्या है। सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस को लेता हूं। इसकी लीड किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से पहले पन्ने पर नहीं दिखी और मुझे लगता है कि दिल्ली के अखबारों के लिए यह भी बड़ी खबर है बशर्ते उनके पास होती।
मामला खालिस्तान समर्थक अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नूं की हत्या की कथित साजिश में एफबीआई द्वारा वांछित विकास यादव का है। उसने दिल्ली की अदालत में कहा है कि उसकी जान को खतरा है क्योंकि उसकी पहचान से संबंधित विवरण सार्वजनिक हैं और इस कारण वह अदालत में उपस्थित नहीं हो सकता है। मामले की गंभीरता और उससे जुड़े तथा इससे हो सकने वाले प्रभावों के मद्दनेजर यह निश्चित रूप से एक बड़ी खबर है। लेकिन किसी और अखबार में नहीं है तो इसलिए कि आजकल पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रह गई है। मुझे याद है, जनसत्ता में रोज एक रिपोर्ट बनती थी जिसमें बताया जाता था कि फलाने अखबार की अमुक खबर अपने यहां नहीं है या छोटी सी छपी है। निश्चित रूप से यह अपने अखबार को बेहतर करने के लिए था और अपने आठ अखबारों के लिए मैं मुफ्त में यही कोशिश करता हूं। पर कितनी कामयाबी मिली या मैं निराश क्यों नहीं हूं वह अलग मुद्दा है। फिर भी, मुझे लगता है इंडियन एक्सप्रेस में खबरों का चयन ठीक है और कोई पूछता होता कि बाकी अखबारों में यह खबर क्यों नहीं है तो उसे पूछना चाहिये। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस को पता होता या रूटीन की यह खबर रूटीन तरीके से आई होती तो शायद लीड नहीं होती। एक्सक्लूसिव है, यह भी इसकी खासियत है और इसीलिये इसपर महेन्द्र सिंह मनराल की बाईलाइन है।

दि एशियन एज में पहले पन्ने पर
जहां तक दि एशियन एज की बात है, यहां प्रधानमंत्री का बयान लीड है। इसके अनुसार उन्होंने कहा है, वोटबैंक की राजनीति ने सरकार में भरोसा तोड़ दिया, हमलोगों ने इसे बहाल किया है। प्रधानमंत्री क्या बोलते हैं और कैसे बोलते हैं या उसका आधार क्या होता है – यह सब हमलोग 10 साल से अच्छी तरह झेल रहे हैं। इस बयान या दावे में भी कुछ नया और अलग नहीं है। ऐसे में यह क्यों और कैसे लीड बनी या प्रधानमंत्री जो कुछ 10 साल से बोल रहे हैं या जो दावे किये हैं वह अलग अनुसंधान का विषय हो सकता है। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि यह किसी भी तरह से लीड हो सकती है। लेकिन चुनाव का समय है और प्रधानमंत्री 10 साल बाद भी प्रधान प्रचारक का अपना विशेष कार्यभार नहीं छोड़ पा रहे हैं तो यह उनका, उनकी पार्टी और संघ परिवार का सिरदर्द हो सकता है। इसे पाठकों का सिरदर्द या उसका कारण नहीं बनाया जाना चाहिये। मैं इसे इसीलिए रेखांकित कर रहा हूं।
आज की सबसे अस्वाभाविक लीड हिन्दुस्तान टाइम्स की है। इसके अनुसार प्रधानमंत्री ने कहा है, “एचटी की यात्रा विकसित भारत बनाने में हमारी सहायता कर सकती है”। इंट्रो है, हिंदुस्तान टाइम्स के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया संस्थान की 100 साल की विरासत पर निशाना साधा और एक विकसित भारत के लिए अपना विजन पेश किया। जाहिर है, कल हिन्दुस्तान टाइम्स के 100 साल पूरे होने का जश्न था और प्रधानमंत्री ने 22वें हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में उद्घाटन भाषण किया। ऐसे में अखबार ने प्रधानमंत्री के भाषण को लीड मान लिया और छाप दिया। मैं इस पत्रकारिता से सहमत नहीं हूं और मुझसे पूछा जाता तो मैं कहता कि यह पुलआउट की सामग्री है। फिर भी समूह के हिन्दी अखबार ने तो अति कर दी है और प्रधानमंत्री के अभी तक के सबसे फूहड़ बयान, आतंकी अपने घरों में डरने लगे को लीड बना दिया है। यह दूसरे अखबारों में भी है और हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा है। पहले ऐसा नहीं होता था। पहले पन्ने पर तो बिल्कुल नहीं। सौ साल का जश्न था और अखबार ने इसे सबसे ज्यादा महत्व दिया है तो यह सामान्य भी लग सकता है पर मैं ऐसा नहीं मानता और ऐसे में मणिपुर की आज की खबर को सिंगल कॉलम में छापना संपादकीय विवेक का मामला है।
मुझे यह सामान्य नहीं लगा और अखबार इस मौके पर चार पन्ने के पुलआउट का जैकेट पहन लेता तो खबरों के साथ अन्याय नहीं होता। वरना कहने वाले तो कहते ही हैं, व्हेन रेप इज इनएविटेबल, लाय डाउन एंड एंजॉय इट लेकिन यह उसका नजरिया नहीं हो सकता है जिसके साथ बलात्कार होता है। इसलिये मुझे आज हिन्दुस्तान टाइम्स का पहला पन्ना ठीक नहीं लगा। यह तो फिर भी किसी कारण से है। दि एशियन एज का अपनी ढपली, अपना राग बजाना भी उतना ही अटपटा है। मुझे लगता है कि मीडिया को अब प्रधानमंत्री के बयानों, दावों को उनके पुराने बयानों और दावों के संदर्भ में देखना चाहिये और उन्हें बताया जाना चाहिये कि वे जो बोल रहे हैं वह बहुतों को पसंद नहीं आ रहा है और बहुत सारे लोग उसपर यकीन नहीं कर रहे हैं।

झारखंड विधानसभा चुनाव | बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा का होर्डिंग मतदाताओं को दो विकल्प देता है – घुसपैठियों को बसाना या आदिवासियों को बचाना। टेलीग्राफ का फोटो कैप्शन।
समस्या यह है कि अखबारों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अनावश्यक प्रचार मिलने के बावजूद भाजपा समर्थकों ने फूलपुर उपचुनाव में पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में बुलडोजर रैली निकाली। दि एशियन एज ने आज इसे पहले पन्ने पर छापा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को फूलपुर की जनता, भाजपा उम्मीदवार और सरकार ने कितनी गंभीरता से लिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि पटाखों पर प्रतिबंध के बावजूद सुप्रीम कोर्ट और प्रशासन अगर पटाखे चलाना नहीं रोक पाया और अभी तक किसी के खिलाफ किसी कार्रवाई को कोई खबर नहीं है तो बुलडोजर न्याय, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब इस रैली का क्या मतलब है और यह अवमानना का मामला बनता है कि नहीं तथा बनता हो तो क्या सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेगा और नहीं लेगा तो उसके फैसले का असर होने की उम्मीद अगर उसे है या हो सकती है तो उसका आधार क्या होगा। मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है।
वैसे भी, आज दि एशियन एज में पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री और अमित शाह डर फैला रहे हैं : खरगे ने भाजपा पर विभाजक राजनीति करने का आरोप लगाया। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा जब बटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं जैसी राजनीति कर रही है, चुनाव आयोग रोक नहीं रहा है और झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 10 बच्चों की आग लगने से मौत हो सकती है जो ना एक रह सकते थे ना बंट सकते थे। ऐसे में सरकार के नारे और विपक्ष के आरोप का क्या मतलब है और उसे अखबारों में प्रमुखता नहीं दिये जाने का क्या कारण हो सकता है, समझना मुश्किल नहीं है। मीडिया अगर बांटने वाली राजनीति का इस तरह समर्थन करेगा तो नतीजे का अनुमान छोड़िये, चुनाव की भी जरूरत नहीं है और जो हालात हैं उसमें वह स्थिति दूर नहीं लग रही है। इसी तरह, एशियन एज के अनुसार, चुनावी राज्य झारखंड में मुद्दा यह है कि भाजपा आदिवासी राजनीति के भूल- भुलैया में कामयाब हो पायेगी कि नहीं। द टेलीग्राफ की खबर का शीर्षक है, भाजपा के होर्डिंग मतदान के बाद के इरादे साफ करते हैं। इस खबर के अनुसार भाजपा ने घुसपैठ को मुद्दा बना रखा है। यह अलग बात है कि भाजपा झारखंडी पार्टियों के मुकाबले आदिवासियों की हिमायती होने की हिमाकत कर रही है। द टेलीग्राफ ने एक होर्डिंग की तस्वीर छापी है जिसमें हरे और भगवा रंगों पर क्रम से लिखा है, घुसपैठियों को बसाना है या आदिवासियों को बचाना है। यह अलग बात है झारखंडियों पर घुसपैठियों को बसाने बचाने का आरोप कितना असरकारक होगा। पर हुआ तो कामयाब हो सकता है। अखबार की खबर के अनुसार झारखंड में करीबन हर दूसरे ट्रैफिक जंक्शन पर भाजपा के ये विशालकाय होर्डिंग हैं जो मतदाताओं को दो ही विकल्प देते हैं। कुल मिलाकर यह भी भाजपा की डराने वाली राजनीति है पर कितनी कामयाब होगी यह तो समय ही बतायेगा।
अपनी इस खबर में अखबार ने बताया है कि झारखंड से बांग्लादेश की दूरी सबसे कम है और यह पाकुड़ जिले से नौ किलोमीटर दूर है। इसके बाद बंगाल की सीमा में गंगा नदी है उस पार बांग्लादेश है। इसके अलावा घुसपैठ अगर होती है तो रोकना केंद्र सरकार का काम है। भाजपा 10 साल से केंद्र में सत्ता में है। फिर भी यह आरोप लगा रही है और इसे मजबूत बनाने के लिए छापा पड़ चुका है और उसका कोई काम लायक विवरण सार्वजनिक नहीं है। कुल मिलाकर भाजपा चुनाव जीतने के लिए तमाम ऐसे उपाय कर रही है जो उसे करने ही नहीं चाहिये। चुनाव आयोग को रोकना चाहिये वह अलग मुद्दा है और राहुल गांधी संविधान की बात कर रहे हैं तो नरेन्द्र मोदी की परेशानी देखते बनती है। नवोदय टाइम्स के अनुसार राहुल गांधी ने कहा है, देश का डीएनए है संविधान। ऐसे में मुद्दा यह भी है कि लोकतंत्र का यह जहर जनता तक कितना कैसे पहुंच रहा है और वे इसका सेवन कर रहे हैं कि नहीं। इसे जानने का अभी कोई तरीका नहीं है। कुछ दिनों बाद ही इसका पता चलेगा।


