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सियासत

बांग्लादेश के लिबरल पत्रकारों का क्या होगा!

रंगनाथ सिंह-

स्विस पब्लिक रेडियो की एडिटर शैरलेट जैकमार्ट ने कल एक लेख में कहा कि बांग्लादेश में पत्रकारों की हालत पहले भी खराब रही है मगर अब जितनी खराब उसके इतिहास में कभी नहीं रही। महज चार महीने की “छात्र क्रान्ति” के दौर में 300 से ज्यादा पत्रकारों के ऊपर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जा चुका है। जाहिर है कि ये हत्या इन पत्रकारों ने नहीं की है, बल्कि इनके “विचार-समाचार” के आधार पर इन्हें गुनहगार ठहराया जा रहा है।

बांग्लादेश में तख्तापलट करने वाले निजाम के प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने कहा है कि वे “फासीवाद” को बढ़ावा देने वाले पत्रकारों के 15 साल के कामकाज की समीक्षा करेंगे। जाहिर है कि भारत के कई लल्लन पत्रकार चिहुँक उठे होंगे कि हाँ, हाँ हम भी समीक्षा करेंगे। आप सोशलमीडिया पर अक्सर ऐसी धमकियाँ देखते होंगे। मगर यह न भूलें कि शफीकुल जी जिन्हें फासीवादी कह रहे हैं, उन्हें अन्य लोग “लिबरल” पत्रकार मानते थे!

शफीकुल जी भोलेपन में लिबरल पत्रकारों को फासीवादी नहीं बता रहे हैं। वह जानबूझकर उस मुहावरे का इस्तेमाल कर रहे हैं जो उनके रिमोटकंट्रोल में बैट्री डलवाने वालों की समझ में आए। कहना न होगा फासिज्म, नाजिज्म और कम्युनिज्म सब यूरोप की कोख से निकले जिन्न हैं। विडम्बना ये है कि जिन लोगों ने कभी चुनाव नहीं लड़ा, उन लोकतंत्र के हत्यारों द्वारा लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को “फासीवादी” बताया जा रहा है!

चुनाव से पहले इन्होंने चुनाव का बहिष्कार कर दिया और सत्ता पर कब्जा करने के बाद खुद भी चुनाव करवाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं!

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