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ऐसे सब-एडिटर दोस्त से भगवान बचाए!

भड़ासी चुटकुला!

एक पत्रकार साहब ने अख़बार की नौकरी छोड़ने के बाद मछली का कारोबार शुरू करने का इरादा बनाया, तो दुकान के लिए एक बोर्ड बनवाया जिस पर लिखा था:
“यहाँ मीठे पानी की ताज़ा मछली बेची जाती है”।

बोर्ड बन कर आया तो अखबार में कार्यरत अपने कुछ डिप्टी न्यूज़ एडिटर, सब एडिटर, सीनियर सब एडिटर, चीफ सब एडिटर दोस्त को मदद के लिए बुलाया कि साथ मिलकर भारी भरकम बोर्ड दुकान के ऊपर टांगा जा सके।

एक खड़ूस सब एडिटर दोस्त ने बोर्ड पढ़ा तो पूछा तुम्हारी इस कारोबार की कोई और ब्रांच भी है?

जी नहीं।
तो फिर “यहाँ” का लफ़्ज़ ज़्यादा है। अब बोर्ड इस तरह हो गया:
मीठे पानी की ताज़ा मछली बेची जाती है।

दूसरे सीनियर एडिटर दोस्त ने पूछा: क्या इस इलाक़े में मीठे पानी के अलावा खारा पानी भी होता है?
जी नहीं।
तो फिर “मीठे पानी” का लफ़्ज़ ज़्यादा है।
अब बोर्ड इस तरह हो गया: ताज़ा मछली बेची जाती है।

एक और चीफ एडिटर दोस्त ने पूछा: क्या बसी हुई मछली भी बेचोगे?
जी नहीं।
तो फिर “ताज़ा” लिखने की क्या ज़रूरत है, यह लफ़्ज़ ज़्यादा है।
अब बोर्ड इस तरह हो गया: मछली बेची जाती है।

एक और डिप्टी न्यूज़ एडिटर दोस्त ने पूछा: मछली मुफ़्त भी दोगे क्या?
जी नहीं।
तो फिर “बेची” का लफ़्ज़ ज़्यादा है। अब बोर्ड इस तरह हो गया: मछली होती है।

एक न्यूज़ एडिटर दोस्त बोले: मछली के अलावा भी कुछ बेचोगे?
जी नहीं।
तो फिर “मछली” का लफ़्ज़ ज़्यादा है।
अब बोर्ड इस तरह हो गया: होती है।

अब सब ने मिलकर ग़ौर किया तो इस बोर्ड का कुछ मतलब समझ नहीं आया, इसलिए बोर्ड के होने को ही बेमतलब और फालतू करार देकर बाहर फेंक दिया गया।

निष्कर्ष-

ज़्यादा एडिटिंग से नुक़सान भी हो जाता है इसलिए सब-एडिटर दोस्तों, दिमाग़ थोड़ा कम ही लगाया करो!

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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