सौरभ-
बुलंदशहर। 3 अगस्त 2002 को सिकंदराबाद कोतवाली क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में बीटेक के प्रवेशार्थी प्रदीप कुमार की मौत के मामले में 22 साल बाद न्यायालय ने सेवानिवृत्त सीओ रणधीर सिंह समेत आठ पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया है। इस फैसले से पुलिस विभाग में संतोष की लहर है, जबकि मृतक के परिजनों में निराशा व्याप्त है।
मामले का विवरण
3 अगस्त 2002 को सिकंदराबाद कोतवाली के तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक रणधीर सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि बुलंदशहर कोतवाली देहात सीमा से टीम के साथ गश्त करते हुए सिकंदराबाद की ओर लौटते समय गांव आढ़ा मोड़ के निकट बिलसूरी की तरफ से फायरिंग की आवाज सुनाई दी। मौके पर पहुंचने पर, एक रोडवेज बस से उतरकर तीन बदमाश भागते हुए दिखाई दिए। पुलिस टीम के रोकने पर बदमाशों ने फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस ने भी गोली चलाई। इस मुठभेड़ में एक बदमाश की मौत हो गई, जिसकी पहचान प्रदीप कुमार (23) पुत्र यशपाल सिंह निवासी गांव सहपानी थाना सिकंदराबाद के रूप में हुई।
पुलिस का दावा था कि प्रदीप ने दिल्ली से लखनऊ जा रही रोडवेज बस के कंडक्टर को गोली मारी थी और वह लूटपाट में शामिल था। हालांकि, प्रदीप के पिता यशपाल सिंह ने इस मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए कहा कि उनका बेटा बीटेक का प्रवेशार्थी था और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था। उन्होंने तत्कालीन थाना प्रभारी रणधीर सिंह सहित आठ पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया।
न्यायालय की कार्यवाही और फैसला
मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई, जिसने मुठभेड़ को सही मानते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। हालांकि, पीड़ित पक्ष ने न्यायालय में प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की, जिसके बाद न्यायालय ने एफआर निरस्त कर सभी पुलिसकर्मियों के खिलाफ वाद दायर कर जांच के निर्देश दिए। इस दौरान सात पुलिसकर्मियों ने न्यायालय में सरेंडर कर जेल गए, जबकि सेवानिवृत्त सीओ रणधीर सिंह ने 25 हजार रुपये का इनाम घोषित होने के बाद सरेंडर किया।
मंगलवार को एडीजे/एफटीसी 4 बुलंदशहर के न्यायाधीश ने गवाहों के बयान, साक्ष्यों का अवलोकन और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद सेवानिवृत्त सीओ रणधीर सिंह समेत सभी आठ पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया। बचाव पक्ष के अधिवक्ता धीरेन्द्र सिंह ने बताया कि अदालत ने इस मुठभेड़ को पुलिसकर्मियों के कर्तव्यों का सही निर्वहन माना।
प्रतिक्रियाएं
फैसले के बाद पुलिसकर्मियों के परिजनों में खुशी की लहर है, जबकि प्रदीप के पिता यशपाल सिंह ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि वे 23 वर्षों से न्याय के लिए लड़ रहे हैं और इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे।
यह मामला वर्षों तक चर्चा में रहा और पुलिस विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहा। अब न्यायालय के फैसले के बाद पुलिसकर्मी राहत महसूस कर रहे हैं, लेकिन प्रदीप के परिवार को अभी भी न्याय की उम्मीद है।


