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सुख-दुख

पत्रकार दिलीप सिन्हा की प्रथम पुण्यतिथि पर ब्रजेश पाठक-दयाशंकर सिंह की झूठी घोषणाओं की मौत

पुत्री ने लिखा पिता को भावुक पत्र…

नवेद शिकोह-

प्रथम पुण्य तिथि पर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सिन्हा की यादों में कुछ वादों के मर जाने का भी अहसास हुआ। एक वर्ष पूर्व रोडवेज की बस दुर्घटना से जीवन गवाने वाले दिलीप सिन्हा की शोक सभा में सैकड़ों पत्रकारों के बीच उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक और परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने दिवंगत पत्रकार की पत्नी और बेटियों से वादा किया था कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहयोग अवश्य दिया जाएगा।

उप मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री सहायता कोष से सहयोग राशि दिलवाने की घोषणा की थी और परिवहन मंत्री ने तो खुद अपने विभाग की नियमावली याद दिलाते हुए कहा था कि रोडवेज की बस दुर्घटना में मरने वाले को विभाग की तरह से आर्थिक सहयोग दिया ही जाता है, यहां इतने वरिष्ट पत्रकार की रोडवेज की बस से दुखद मृत्यु हुई है तो हम जल्दी से जल्दी आर्थिक सहयोग पहुंचा देंगे।

इन वादों और घोषणाओं को एक वर्ष बीत गया, एक रुपए का भी कोई आर्थिक सहयोग कहीं से न मिला। न मुख्यमंत्री सहायता कोष से न परिवहन निगम से।

हुक्मरानों-सत्ताधारियों के वादों की मौत के साथ पत्रकार संगठन भी मृत साबित हो गए। एहसास हुआ कि पत्रकारों की संगठन बाजी, जन्मदिन सेलिब्रेशन, शोक सभाओं-तेरहवीं में सेल्फी बाजी,फोटो बाजी, वाट्सएप बाजी, फेसबुक बाजी, रील बाजी, बड़े-बड़े जमावड़े, पत्रकार सम्मेलन, चुनावी राजनीति, प्रेस कक्षों और भाषणों में बड़ी-बड़ी कसमें, प्यार, वफा वादे हैं वादों का क्या!

बता दें कि उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति के हर चुनाव में पत्रकारों के सबसे अधिक वोट पाने वाले स्वर्गीय सिन्हा पांच दशक से पत्रकारों की हर गतिविधि में सबसे सक्रिय पत्रका थे। प्रेस क्लब , एनेक्सी, विधानसभा, लोक भवन के प्रेस कक्षों में उनकी मौजूदगी सदाबहार रहती थी। नवजीवन से सेवानिवृत्त दिलीप जी पत्रकारों के किसी भी कार्यक्रम,सभा या संवाददाता समिति की हर बैठक की रौनक थे।

एक वर्ष पूर्व विधानसभा प्रेस रूम में एक पत्रकार साथी के जन्मदिन की महफिल में शरीक होने जाते वक्त रास्ते में एक बस दुर्घटना में उनका देहांत हो गया था।

प्रथम पुण्य तिथि पर दिलीप सिन्हा जी की बेटी ने अपने पापा के न रहने की टीस को शब्दों में उकेरा है। खास बात ये है कि इस बिटिया के सिर पर हाथ रखकर ही मंत्रियों ने आर्थिक सहयोग का वादा किया था। लेकिन दिलीप जी की बेटी ने अपनी संवेदनाओं का जो भावनात्मक पत्र लिखा उसमें ये जिक्र भी नहीं किया कि उनके पापा की एनेक्सी में आयोजित भव्य शोक सभा में मंत्रियों ने जो घोषणाएं की थी वो झूठी थी। ये शिकायत न करने का कारण ये होगा कि सब जानते हैं कि हुकूमत और सियासत की फितरत है, झूठे आंसू बहाना,झूठी ढाढस देना, झूठ बोलना और वादा खिलाफी करना।

अपने पापा को लिखे भावुक पत्र में दिलीप जी की पुत्री ने इस बात का इशारा जरुर किया है कि आपके साथी पत्रकारों ने आपके जाने के बाद हमारी सुध भी न ली। उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति जिसके वरिष्ठ सम्मानित सदस्य भी थे दिलीप सिन्हा, इसी समिति की तरफ से खूब भीड़ जुटा कर एनेक्सी मीडिया सेंटर में आयोजित हुई शोक सभा का जिक्र करते हुए पुत्री ने पिता को लिखा है कि शोक सभा में भीड़ जुटाना आसान है लेकिन किसी के जाने के बाद उसके परिवार का साथ निभाना बहुत मुश्किल।


दिवंगत पत्रकार दिलीप सिन्हा

आज से ठीक एक साल पहले, 10 जुलाई 2025 ने हमारी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी। उस एक पल ने हमसे हमारे पापा को छीन लिया, लेकिन आपकी सीख, आपके संस्कार और आपकी ईमानदारी आज भी हमारे जीवन का सबसे बड़ा सहारा हैं।

पापा, आपने पत्रकारिता को कभी नौकरी नहीं माना। यह आपके लिए एक ज़िम्मेदारी थी, एक वचन था। आपने अपनी कलम से सिर्फ खबरें नहीं लिखीं, बल्कि सच लिखा, लोगों की आवाज़ उठाई और अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान थी।

आज भी घर का हर कोना आपको ढूंढता है। आपकी आवाज़, आपकी मुस्कान, आपका “सब ठीक हो जाएगा” कहना… सब कुछ जैसे कल की ही बात हो। समय आगे बढ़ गया, लेकिन आपके बिना हमारा समय जैसे उसी दिन ठहर गया।

कहते हैं कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसकी यादें रह जाती हैं। सच तो यह है कि कुछ लोग कभी जाते ही नहीं। वे हर दुआ में, हर याद में, हर फैसले में और हर धड़कन में हमेशा ज़िंदा रहते हैं। आप भी हमारे लिए हमेशा ऐसे ही रहेंगे, पापा।

इस एक साल ने बस इतना सिखाया कि शोक सभा में भीड़ जुटाना आसान है, लेकिन किसी के जाने के बाद उसके परिवार का साथ निभाना बहुत मुश्किल।

फिर भी, हम उन सभी लोगों के दिल से आभारी हैं जिन्होंने इस कठिन समय में हमारा साथ दिया, हमारा हाल पूछा और हमें हिम्मत दी। आपका अपनापन हमेशा याद रहेगा।

पापा, आपकी कमी शब्दों में कभी नहीं लिखी जा सकती। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें समय नहीं भरता। हर दिन आपकी याद आती है, हर सफलता पर आपकी कमी महसूस होती है, और हर मुश्किल में सबसे पहले आपका चेहरा याद आता है।

काश… एक बार फिर आपको “पापा” कहकर पुकार पाते।

आप हमारे लिए सिर्फ हमारे पापा नहीं थे, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत, हमारी पहचान और हमारा गर्व थे।

पहली पुण्यतिथि पर आपको अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।

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