बद्री प्रसाद सिंह-
यह डीजीपी (सेवानिवृत्त) एवं माननीय सांसद बृजलाल जी की एक पुस्तक का नाम है, जो उनके वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, इटावा के कार्यकाल की घटनाओं और उनके दूरगामी परिणामों का वृत्तांत है। 27 जून को बृजलाल सर ने मुझे अपनी तीन पुस्तकें दी थीं। उनमें से एक पर मैं पहले ही लिख चुका हूँ। दूसरी पुस्तक इटावा फ़ाइल्स पर आज लिखने का साहस कर रहा हूँ। एक पुलिस अधिकारी से सत्ताधारी नेता क्या अपेक्षा रखते हैं और उन अपेक्षाओं की पूर्ति में बाधक बनने वाले अधिकारी का क्या हश्र होता है, इस पुस्तक में उसी आपबीती का सिलसिलेवार वर्णन है।
माननीय मुलायम सिंह यादव ने 5 दिसंबर 1989 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 10 दिसंबर को बृजलाल जी को सेनानायक, 27वीं वाहिनी पीएसी, सीतापुर से पुलिस अधीक्षक, सीतापुर बनाया गया और नौ दिन बाद वहाँ से उनका स्थानांतरण वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, इटावा के पद पर कर दिया गया, जो माननीय मुलायम सिंह जी का गृह जनपद था।
वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह जी जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े थे। उनके विरुद्ध उनके पुराने सहयोगी दर्शन सिंह यादव कांग्रेस के प्रत्याशी थे। इस चुनाव के दौरान दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के विरुद्ध अभियोग दर्ज कराए थे, जिनकी जाँच सीबी-सीआईडी द्वारा की जा रही थी। मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह जी ने उन जाँचों को वापस जिले में स्थानांतरित कर दिया।
मुख्यमंत्री जी ने अपने विरुद्ध दर्ज सभी मुकदमों में अंतिम रिपोर्ट लगाने तथा दर्शन सिंह के विरुद्ध दर्ज मुकदमों में अभियुक्तों को पीटकर जेल भेजने और आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया, जबकि सत्य इसके विपरीत था। इसके लिए डीआईजी, कानपुर, घुंगेश जी ने भी बहुत दबाव डाला। बृजलाल जी ने इसे स्वीकार नहीं किया। बाद में मुख्यमंत्री तथा वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव में दोनों पक्षों के मुकदमों में अंतिम रिपोर्ट लगाकर प्रकरण समाप्त कर दिए गए।
घुंगेश जी इटावा में पुलिस अधीक्षक रह चुके थे और मुलायम सिंह जी के कृपापात्र थे। उन्हें पुलिस अधीक्षक रहते हुए ही कानपुर रेंज का डीआईजी बना दिया गया। जब मीडिया में इस पर शोर हुआ तो उन्हें प्रभारी डीआईजी, कानपुर रेंज बनाया गया, जिसके अंतर्गत कानपुर और इलाहाबाद जैसे बड़े जनपद आते थे। बदले में घुंगेश जी ने मुलायम सिंह जी के हर गलत कार्य को उचित ठहराकर उनका एहसान चुकाया।
9 अप्रैल 1990 को दूसरे की जमीन पर कब्जा करने के आरोप में 22 अभियुक्तों को थानाध्यक्ष, सिविल लाइंस, शाह आलम ने गिरफ्तार किया। इसके बाद तीन व्यक्ति थाने पहुँचे और थानाध्यक्ष के साथ दुर्व्यवहार करते हुए गिरफ्तार व्यक्तियों को छोड़ने का दबाव बनाया। इस पर थानाध्यक्ष ने दुर्व्यवहार के आरोप में उन तीनों को भी गिरफ्तार कर लिया।
सूचना मिलते ही शिवपाल सिंह यादव 100–150 लोगों के साथ थाने पहुँचे, थानाध्यक्ष की पिटाई कर उन्हें लहूलुहान कर दिया तथा गिरफ्तार व्यक्तियों को छुड़ाकर अपने साथ ले गए। सूचना मिलने पर बृजलाल सर पुलिस लाइन से बल लेकर थाने पहुँचे और थानाध्यक्ष का उपचार कराया।
इसी बीच कार्यवाहक डीआईजी घुंगेश जी का कानपुर से फोन आया कि वे इटावा पहुँच रहे हैं, तब तक कोई कार्रवाई न की जाए। वे सीधे शिवपाल जी के घर पहुँचे और एडिशनल एसपी सक्सेना की राय से थानाध्यक्ष के विरुद्ध कोतवाली थाने में चार फर्जी मुकदमे दर्ज करा दिए। इसके बाद डाक बंगले में बृजलाल जी और थानाध्यक्ष, सिविल लाइंस को बुलाकर थानाध्यक्ष को गिरफ्तार करने का आदेश दिया तथा उनसे कहा कि वे शिवपाल जी और उस घटना को भूल जाएँ। बृजलाल जी के मना करने पर उन्हें भी मुख्यमंत्री का डर दिखाया गया, लेकिन वे नहीं झुके।
बाद में बृजलाल जी को प्रशिक्षण हेतु नैनीताल भेज दिया गया और प्रशिक्षण समाप्त होने पर उनका स्थानांतरण पीएसी, आज़मगढ़ कर दिया गया। उन्हें नैनीताल से इटावा आने की भी अनुमति नहीं दी गई, जबकि उनका परिवार इटावा में ही था।
आज़मगढ़ पीएसी से अपना सामान और परिवार लाने के लिए भी उन्हें इटावा जाने की अनुमति नहीं मिली। बाद में पीएसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साहस दिखाते हुए उन्हें इटावा जाने की अनुमति दिलाई, तब वे अपना परिवार और सामान वहाँ से ला सके।
जब-जब मुलायम सिंह यादव जी की सरकार बनी, बृजलाल जी का विभिन्न तरीकों से उत्पीड़न किया गया—कभी फर्जी मुकदमे दर्ज कराकर, तो कभी फर्जी शिकायतों पर जाँच बैठाकर। सरकार बदलते ही वे सभी प्रकरण समाप्त हो जाते थे। ऐसे अनेक मामलों का पुस्तक में विस्तार से उल्लेख है।
वर्ष 2011 में वे डीजीपी बने। 2012 के विधानसभा चुनाव के समय सपा की शिकायत पर उन्हें डीजी, पीएसी बनाया गया। 2012 में अखिलेश यादव जी की सरकार बनने पर उन्हें वहाँ से पुलिस प्रशिक्षण अकादमी, मुरादाबाद भेज दिया गया। उन्होंने केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जाने की इच्छा व्यक्त की, जिसके बाद उन्हें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में प्रतिनियुक्ति मिल गई, लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी ने वहाँ जाने की अनुमति नहीं दी। अंततः वे प्रदेश में एक महत्वहीन पद से सेवानिवृत्त हुए।
इस पुस्तक में अनेक ऐसी घटनाओं का वर्णन है, जहाँ उनका उत्पीड़न हुआ। साथ ही, उन्होंने उन वरिष्ठ अधिकारियों का भी नामवार उल्लेख किया है, जिन्होंने माननीय मुलायम सिंह और उनके परिवार की कृपा प्राप्त करने के लिए इस उत्पीड़न में साथ दिया। राजनेताओं का स्वभाव तो जगजाहिर है, लेकिन इस पुस्तक को पढ़कर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मानसिकता और स्वार्थलिप्सा देखकर उनके प्रति घृणा उत्पन्न होती है कि इतने ऊँचे पद पर रहकर भी कोई व्यक्ति इतना नीचे कैसे गिर सकता है।
पुस्तक अत्यंत पठनीय है और विशेष रूप से सेवारत पुलिस अधिकारियों के लिए तो इसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। पुस्तक में वर्णित सभी वरिष्ठ अधिकारियों से मैं परिचित हूँ। अब वे सभी सेवानिवृत्त हैं, और उनमें से कुछ तो स्मृतिशेष भी हो चुके हैं। प्रभु से प्रार्थना है कि वे उनकी दुष्टता को क्षमा करें।
मेरा जीवन संघर्ष

27 जून को मैं माननीय सांसद बृजलाल जी से उनके लखनऊ स्थित आवास पर मिलने गया था, जहाँ उन्होंने मेरा बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया। बृजलाल सर उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी रह चुके हैं तथा उनका मुझ पर सदैव स्नेह रहा है। लगभग दो घंटे की बातचीत के बाद, विदा होते समय उन्होंने अपनी तीन पुस्तकें मुझे सहर्ष भेंट कीं। बृजलाल जी एक जांबाज़ पुलिस अधिकारी तो रहे ही हैं, उन्होंने अब तक कुल 10 पुस्तकें लिखकर सफल लेखकों की सूची में भी अपना स्थान बनाया है।
उनकी पुस्तक “मेरा जीवन संघर्ष” मैंने पढ़नी प्रारंभ की तो 320 पृष्ठों की यह पुस्तक एक ही प्रवाह में पढ़ता चला गया। वरिष्ठ अधिकारी बनने के बाद प्रायः लोग स्वयं को अभिजात्य वर्ग से जोड़ लेते हैं, लेकिन बृजलाल सर ने अपनी गरीबी और कठिनाइयों का अत्यंत वास्तविक चित्रण किया है। किन विपरीत परिस्थितियों में वे विद्यालय गए, प्रतिदिन कैसे 24 किलोमीटर नंगे पाँव घर से शोहरतगढ़ पढ़ने जाते थे, कभी-कभी दिनभर भूखे रह जाते थे—इन सबका वर्णन पढ़कर उनके विद्यार्थी जीवन के संघर्ष का वास्तविक आभास होता है।
हाईस्कूल और इंटरमीडिएट, दोनों परीक्षाओं में उन्होंने प्रदेश की योग्यता सूची में स्थान प्राप्त किया था। मैं वर्ष 1999 से 2001 तक सिद्धार्थनगर का पुलिस अधीक्षक था और शोहरतगढ़ कॉलेज में लगी मेरिट सूची की पट्टिका पर उनका नाम देखा था। किस प्रकार वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुँचे और अत्यंत गरीबी के बावजूद भूखे रहकर भी गणित में प्रथम श्रेणी से एम.एससी. की तथा पहले ही प्रयास में भारतीय वन सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में चयनित हुए—इन सभी घटनाओं का उन्होंने बड़ी साफगोई से वर्णन किया है। इन सेवाओं के साक्षात्कार में उन्होंने अपने एक साथी से माँगे गए कपड़े पहनकर भाग लिया था।
बृजलाल जी ने अपने जीवन के साथ-साथ अपने क्षेत्र के देवी-देवताओं, क्षेत्रीय रीति-रिवाजों, त्योहारों, लोक संस्कृति और अंधविश्वासों का भी अत्यंत सुंदर वर्णन किया है। मैं भी पूर्वांचल का रहने वाला हूँ और मेरी शिक्षा-दीक्षा भी लगभग उसी परिवेश में हुई है। उनके वर्णनों को पढ़कर कई बार लगा कि यह मेरी भी आत्मकथा है। अंतर केवल इतना है कि बृजलाल सर अनुसूचित जाति के एक अत्यंत गरीब परिवार से थे, जबकि मैं मध्यमवर्गीय सवर्ण परिवार से हूँ। इसलिए मुझे उस प्रकार का जातिगत भेदभाव नहीं झेलना पड़ा, जिसका सामना उन्हें करना पड़ा।
इस पुस्तक में उन्होंने अपनी जाति—कोरी (अनुसूचित जाति)—का इतिहास भी लिखा है, जो मेरे लिए नया था। उन्होंने कोरी जाति को बुद्धकालीन कोलिय जाति से जोड़ा है, जिसे गौतम बुद्ध के नाना महाराज अंजन की जाति बताया है। महराजगंज में रोहिणी (लोहित) नदी के किनारे स्थित बुद्ध का ननिहाल देवदह वर्तमान में नौतनवा तहसील के बनरसिया कलां और बनरसिया खुर्द गाँवों से संबंधित बताया गया है। बुद्धकाल से भी पूर्व पूर्वी उत्तर प्रदेश में कोलिय और मल्ल क्षत्रियों का शासन था।
समय के साथ कोलिय अथवा कोली समुदाय वस्त्र बुनने की कला में पारंगत हो गया। पुस्तक के अनुसार औरंगज़ेब के शासनकाल में उनका अत्यधिक उत्पीड़न हुआ। जिन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया, उन्हें हत्या, बलात्कार तथा अन्य प्रकार के अत्याचारों का सामना करना पड़ा। जो कोली धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने, वे जुलाहे अथवा अंसारी कहलाए। अनेक लोगों ने अपने धर्म और अस्तित्व की रक्षा के लिए देश के अन्य सुरक्षित क्षेत्रों में पलायन किया। महाराजा छत्रसाल के संरक्षण के कारण बड़ी संख्या में कोली समुदाय के लोग बुंदेलखंड में भी जाकर बसे। पलायन और उत्पीड़न के कारण कोरी समाज आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर हो गया और आगे चलकर उसकी गणना अनुसूचित जाति में होने लगी।
पुस्तक में बृजलाल सर ने अपने प्रशिक्षण काल का भी विस्तृत वर्णन किया है। अकादमी में प्रशिक्षण कैसे हुआ, जनपदों में किस प्रकार प्रशिक्षण प्राप्त किया, किन-किन अधिकारियों से सीखने का अवसर मिला और किन लोगों के साथ रहे—इन सभी बातों का उन्होंने विस्तार से उल्लेख किया है। साथ ही जीवन के विभिन्न चरणों तथा अपने परिवार के अनेक दुर्लभ चित्र भी पुस्तक में साझा किए हैं।
यह पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है। पुस्तक ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक और अत्यंत पठनीय है।
लेखक बीपी सिंह आईजी पद से रिटायर हो चुके हैं.



