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मोदीराज: अखबारों में बाकायदा विज्ञापन देकर हो रहे भ्रष्टाचार की यह दो तस्वीरें देखिए!

नई दिल्ली। मंगलवार को प्रकाशित दो अलग-अलग अखबारों के पन्नों ने सरकारी विज्ञापन और खोजी पत्रकारिता के बीच का अंतर एक बार फिर चर्चा में ला दिया।

एक ओर द टाइम्स ऑफ इंडिया में दिल्ली सरकार और दिल्ली वन एवं वन्यजीव विभाग की ओर से ‘मिशन 70 लाख पौधा रोपण अभियान’ के शुभारंभ का पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। विज्ञापन में 70 लाख पौधे लगाने के लक्ष्य के साथ 300 इलेक्ट्रिक बसों सहित विभिन्न परियोजनाओं के लोकार्पण की जानकारी दी गई। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत कई नेताओं के संदेश और कार्यक्रम का विवरण प्रमुखता से प्रकाशित किया गया।

दूसरी ओर दैनिक भास्कर के जालोर-सांचौर संस्करण में चौथाई पन्ने की एक ग्राउंड रिपोर्ट ने पौधारोपण अभियानों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े किए। रिपोर्ट में दावा किया गया कि जालोर जिले में जिन स्थानों पर हजारों पौधे लगाए जाने का रिकॉर्ड है, वहां मौके पर बहुत कम पौधे जीवित मिले। खबर के अनुसार, वन विभाग के रिकॉर्ड में लाखों पौधे लगाए जाने का उल्लेख है, लेकिन ग्राउंड विजिट के दौरान कई साइटों पर पौधों की संख्या बेहद कम पाई गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पौधों के रखरखाव के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि जमीनी स्थिति अलग तस्वीर पेश करती है।

Front page of a Hindi newspaper showing two headshots at the top corners and a large green tree-themed graphic announcing a "Mission 70 Lakh" tree-planting campaign in the center, with Hindi text surrounding it.
Dainik Bhaskar front page reporting a mass plantation scam; headline reads '7 लाख पौधे लगाये थे, हजार भी नहीं बचे' with satellite map images of the affected sites.

इन दोनों प्रकाशनों को साथ देखकर मीडिया जगत में यह चर्चा तेज हो गई है कि एक तरफ सरकारी योजनाओं के प्रचार के लिए बड़े-बड़े विज्ञापन प्रकाशित किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ खोजी और ग्राउंड रिपोर्टिंग उन योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल भी उठाती है।

हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि दिल्ली सरकार का विज्ञापन और राजस्थान के जालोर जिले से संबंधित दैनिक भास्कर की रिपोर्ट दो अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग पौधारोपण अभियानों से जुड़ी हैं। दोनों के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। फिर भी दोनों पन्ने यह जरूर दिखाते हैं कि सरकारी दावों और जमीनी पड़ताल के बीच अंतर की जांच करना पत्रकारिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

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