हिंदुस्तान बरेली यूनिट में काम करने लायक माहौल नहीं बचा है। बताया जाता है कि यहां पर सीनियर साथियों को बेइज्जत किया जाता है। संपादकीय चमचों के कहने पर कर्मचारियों का प्रमोशन और उनका वेतन तय किया जाता है।
इन्हीं सब कारगुजारियों से आहत होकर जून 2025 में सीनियर सब एडिटर अमित ने नौकरी छोड़ दी थी। उसकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने समय पर वेतन की मांग की थी। वेतन समय पर न मिलने के कारण उसने हिंदुस्तान के हेड ऑफिस में शिकायत की थी, इससे बरेली यूनिट के संपादक का ईगो हर्ट हो गया। उन्होंने सब एडिटर अमित से फोन पर अभद्रता की। जिससे आहत होकर अमित ने इस्तीफा दे दिया।
संपादक अभिमन्यु कुमार सिंह का बरेली में दूसरा कार्यकाल भी विवादों भरा रहा। इससे पहले के कार्यकाल में उन पर कर्मचारियों का कॉलर पकड़ने तक का आरोप लगा था।
बताया तो यहां तक जाता है कि संपादक महोदय संस्थान में अपने ही लोगों को भरने में लगे रहते हैं। खासकर उनको जो चमचई करने में पारंगत हो।
संपादक के व्यवहार से दुखी होकर इस साल 2026 में फरवरी से लेकर अब तक छह लोग इस्तीफा दे चुके हैं कितनों की और यह स्थिति होने वाली है यह देखने वाली बात होगी। लेकिन ऊपर के अधिकारी भी आंख मूंदे बैठे रहते हैं।
कई कर्मचारी बीते 10-15 साल से यहां टिके हुए हैं। इस कारण उनमें मठाधीसी आ गई है। उन्हें लगता है कि वह जैसे जो कहेंगे, कर्मचारी करेगा। जबकि अब ऐसा नहीं है यहां संस्था में हर आदमी कर्मचारी है चाहे वह संपादक हो, लेकिन यहां पर तो उसे मजदूर समझा जाता है।
जब चाहे तब उसका वीकली ऑफ कैंसिल कर दिया जाता है, जब छुट्टी मांगे तो बड़ी आनाकानी की जाती है। जबकि संस्थान कर्मचारियों को पर्याप्त सुविधाएं दे रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर तो सुविधाएं देने के नाम पर कर्मचारियों का शोषण किया जाता है।
हेड ऑफिस को कर्मचारियों का कार्यकाल सुनिश्चित करना चाहिए कि एक यूनिट में कोई भी आदमी 3 साल से ज्यादा नहीं टिकना चाहिए, इससे ऑफिस की सभ्यता भी बनी रहती है और मठाधीसी का भाव लोगों के अंदर नहीं आता है।
बरेली यूनिट का माहौल टॉक्सिक होने के कारण फरवरी में पीयूष मिश्रा, मार्च में मधुर शुक्ला और जून में इंद्रपाल सिंह, राजीव पांडे और प्रशांत सिंह ने ऑफिस की भेदभाव की नीतियों से आहत होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
एक कर्मचारी द्वारा भड़ास को भेजे गए इनपुट पर आधारित



