नई दिल्ली। दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (DUJ) ने वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सम्राट चौधरी का पासपोर्ट लौटाए जाने का स्वागत करते हुए इसे पत्रकारों और आम नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला बताया है। संगठन ने कहा कि हाल की घटनाएं इस आशंका को जन्म देती हैं कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो उसे अन्य सरकारी अधिकारों से भी वंचित किया जा सकता है।
डीयूजे ने जारी बयान में कहा कि 10 जुलाई 2026 को कोलकाता पासपोर्ट कार्यालय ने सम्राट चौधरी का पासपोर्ट उन्हें वापस कर दिया। इससे पहले पुलिस की प्रतिकूल (Adverse) रिपोर्ट का हवाला देते हुए उनसे पासपोर्ट जमा कराने को कहा गया था। संगठन का कहना है कि सम्राट चौधरी पश्चिम बंगाल के जाने-माने पत्रकार हैं और वर्षों से वहीं रह रहे हैं। उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं है। उन्होंने आदेश का पालन करते हुए पासपोर्ट जमा कराया, लेकिन उसके खिलाफ अपील भी की। मामला सार्वजनिक होने और मीडिया संगठनों के विरोध के बाद प्रशासन ने अपने फैसले की समीक्षा की और पासपोर्ट वापस कर दिया।
आर. राजगोपाल के साथ भी हुआ था ऐसा ही मामला
डीयूजे ने कहा कि इससे पहले द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक और वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल के साथ भी इसी तरह की घटना हुई थी। उनका नाम कथित तौर पर मतदाता सूची से हटा दिया गया था, जिसके आधार पर कई महीनों तक उनका पासपोर्ट रोके रखा गया। इस कारण वे अमेरिका में अपनी बेटी की शादी में भी शामिल नहीं हो सके। मामला सार्वजनिक होने और विरोध के बाद उनका पासपोर्ट भी वापस कर दिया गया।
SIR अभियान पर उठाए सवाल
संगठन का कहना है कि दोनों घटनाएं पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बाद सामने आईं, जिसके दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। डीयूजे का आरोप है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो उसे राष्ट्रीय रिकॉर्ड में भी संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है और इससे पासपोर्ट समेत अन्य अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
नागरिकता साबित करने के दस्तावेज को लेकर असमंजस
डीयूजे ने कहा कि इस समय यह स्पष्ट नहीं है कि नागरिकता साबित करने के लिए कौन-सा दस्तावेज अंतिम और मान्य माना जाएगा। संगठन ने उल्लेख किया कि विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने पासपोर्ट को केवल “यात्रा दस्तावेज” बताया था, जबकि पहले सरकार और अदालतों की ओर से आधार, पैन और वोटर कार्ड को भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना गया है।
संगठन का कहना है कि इस स्थिति ने लाखों लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। लोग दशकों पुराने दस्तावेज जुटाने के लिए मजबूर हैं, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में नाम, फोटो, पते और वर्तनी जैसी त्रुटियां आम हैं। डीयूजे ने विशेष रूप से विवाहित महिलाओं की स्थिति को अधिक संवेदनशील बताया, क्योंकि विवाह के बाद उनके नाम और पते बदल जाते हैं।
60 लाख नहीं, 6 करोड़ नाम हटने का दावा
डीयूजे ने दावा किया कि नवंबर 2025 से शुरू हुए SIR अभियान के दौरान अब तक 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 6 करोड़ (60 मिलियन) नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं। संगठन के अनुसार अब यह प्रक्रिया 19 अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी चल रही है।
‘बहिष्करण का माध्यम बन सकता है SIR’
दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने आशंका जताई कि यदि इस प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं रही, तो SIR लाखों लोगों को व्यवस्था से बाहर करने का माध्यम बन सकता है। संगठन का कहना है कि यह चिंता केवल पत्रकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी नागरिकों से जुड़ी है जो अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर अनिश्चितता का सामना कर सकते हैं।



