एक्सप्रेस की कल की खबर। स्वायत्तता का मतलब सरकार में विलय की स्वायत्ता तो नहीं हो सकती है
संजय कुमार सिंह
आज मेरे 10 में से आठ (टाइम्स ऑफ इंडिया और कलकत्ता के द टेलीग्राफ को छोड़कर) अखबारों की लीड ईरान पर अमेरिकी हमले की खबर है (दि एशियन एज का शीर्षक)। इसमें होर्मुज फिर बंद होने, 11 भारतीय नाविकों वाले जहाज पर हमला (दैनिक भास्कर) और इनमें 10 को बचाए जाने, एक के लापता होने जैसी खबरें हैं। अमर उजाला में इस हमले का दूसरा पक्ष, अमेरिकी सेना ने ईरान के 140 से ज्यादा ठिकानों पर ताबड़तोड़ बमबारी की भी है। देशबन्धु ने इस खबर के भारतीय पक्ष को खबर और शीर्षक बनाया है। शीर्षक के अनुसार जहाज पर हमला ओमान तट के पास हुआ और उपशीर्षक है, जहाज पर 11 भारतीय सवार थे, 10 को बचाया गया, एक अब भी लापता। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है – ईरान, अमेरिका ने हमले बढ़ाए तो होर्मुज संकट फिर खड़ा हुआ। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तेहरान ने खाड़ी देशों पर पलटवार किया, कहा होर्मुज बंद। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है – अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने पश्चिम एशियाई देशों पर हमला किया। तेहरान ने बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और ओमान को निशाना बनाया है और कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) बंद है; वहीं अमेरिका का कहना है कि हमलों से ईरान की जहाजों को धमकाने की क्षमता कमजोर होगी और उसने जोर देकर कहा है कि इस अहम जलमार्ग से आवाजाही जारी है। जाहिर है, मामला जबरदस्ती का है लेकिन युद्ध ऐसा ही होता है। मुद्दा यह है कि युद्ध अमेरिका लड़ रहा है और राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऑपरेशन सिन्दूर अचानक बंद करवा दिया था या इसका दावा तो किया ही था। भारत ने इस मामले में वास्तविकता नहीं बताई या कम से कम मीडिया से पता नहीं चला। अब जब अमेरिका यह सब कर रहा है तो क्या भारत को अपनी बात नहीं रखनी चाहिए? या उसके पास कहने के लिए कुछ है ही नहीं? सोशल मीडिया पर मैंने देखा कि प्रधानमंत्री 25-30 साल पुराना मफलर दिखा रहे थे और उसकी कहानी सुना रहे थे। आज अखबारों में पहले पन्ने पर इसकी चर्चा नहीं है। अमेरिका खाड़ी युद्ध में जो कर रहा है उसपर तो नहीं है। ठीक है कि प्रतिक्रिया मीडिया को नहीं देना है पर मीडिया को यह बताना होता है कि प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है या क्या आई है। आपको याद होगा कि ईरान से समझौते और अमेरिकी कोशिशों की खबरों को कितनी प्रमुखता मिली और समझौते के बावजूद सब लगभग वैसे ही है लेकिन समझौते की चर्चा नहीं है।
अब टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड की लीड पर आने से पहले बता दूं कि पहले पन्ने पर छपी एक खबर के अनुसार – विदेश मंत्रालय ने ओमान तट के पास टैंकर (जहाज) पर हमले की निन्दा की। 10 बचाए गए, एक लापता – यहां भी है। अमेरिकी हमले और उसके जवाब की खबर अंदर होने की सूचना यहां है। टीओआई की आज की लीड यह सूचना है कि वियतनाम में जिस पानी जहाज के पलटने से 15 भारतीयों की मौत हुई थी उसके अगले दिन स्पीडवोट के कैप्टन को गिरफ्तार कर लिया गया है। खबर के अनुसार, चश्मदीदों ने चालकदल की गलती बताई है। इस मामले में खबर यह भी है कि पीड़ितों के परिवार ने शव वापस लाने के लिए सरकार की मदद चाही है। मुझे लगता है कि इसकी जरूरत ही नहीं होनी चाहिए थी। घोषणा पहले ही हो जानी चाहिए थी। अंग्रेजी के इस अखबार के पहले पन्ने पर मौसम की खबर के अलावा अपराध और हादसे की कई खबरें हैं। कलकत्ता के टेलीग्राफ की लीड मानव तस्करी और महिलाओं के खिलाफ अपराध की खबर है। इसमें बताया गया है कि यह अपराध पुलिस की निष्क्रियता और मामले को कम करके बताने की व्यवस्था में छिपा हुआ है। कहने की जरूरत नहीं है कि टेलीग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड संपादकीय विवेक का मामला है और उसपर किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह सवाल तो रहेगा कि स्थानीय और मौजूं विषयों के साथ फॉलोअप की पत्रकारिता क्यों नहीं हो रही है, कौन करेगा, किसे देखना है और अगर कोई देखने वाला नहीं है तो ऐसे ही चलता रहेगा?
आप जानते हैं कि भाजपा की सरकार में वोट चोरी, चुनाव चोरी और सीट चोरी तक के मामले होते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जो भी किया या नहीं किया है उसमें से ज्यादातर सत्तारूढ़ व्यवस्था के पक्ष में रहा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का हारना और भारतीय जनता पार्टी का जीतना भी ऐसे ही मामलों के रूप में देखा जा रहा है। बात इतनी ही नहीं है, तृणमूल की हार के बाद तृणमूल कांग्रेस को हर तरह से परेशान किए जाने के मामले भी हैं। भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के तर्क और दलील वैसे भी समय की जरूरत के अनुसार होते हैं और जब यह कहा जाता था कि दुनिया भर के कई देशों में ईवीएम का उपयोग नहीं होता है तो भारत में इसके उपयोग के पक्ष में दलीलें दी जाती थीं। अब जब ई-20 पेट्रोल से दिक्कत बताई जा रही है तो बताया जा रहा है कि दुनिया भर के किन देशों में इसका उपयोग होता है। इसमें इस बात का कोई मतलब नहीं है कि ई-10 से दिक्कत नहीं थी, उसका विरोध भी नहीं था। अब ई-20 में किसी कारण से एथनॉल और पेट्रोल अलग हो जाने के मामले लगते हैं, उसके वैज्ञानिक कारण हैं और ई-10 से ई-20 करने में क्या समस्या हो सकती है उसका आधार घुलनशीलता की परिभाषा में ही है, फिर भी सरकार ने कह दिया कि वह जनता को विकल्प नहीं दे सकती है। खबर छप चुकी। वह भी तब जब सरकार स्वीकार कर चुकी है कि इससे माइलेज कम हो सकता है। सोशल मीडिया पर एक ऑडी चालक ने वीडियो पोस्ट करके कहा है कि अगर वह अपनी गाड़ी साल में 10,000 किलोमीटर चलाता है तो उसे पेट्रोल मद में ही 64,000 रुपए के करीब ज्यादा खर्चने होंगे। फिर भी सरकार लोगों को कम या ज्यादा पैसे में भी सामान्य पेट्रोल भरवाने का विकल्प नहीं दे रही है। यह सरकार का विशेषाधिकार हो सकता है, बहुमत का दुरुपयोग या पैसे कमाने की कोशिश हो सकती है। लेकिन मीडिया खबर नहीं दे रहा है। खुद तो नहीं ही करता है, सोशल मीडिया पर जो उपलब्ध है वह भी नहीं और यह वैसे ही है कि अखबारों ने यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि सीजेआई को गाली देने वाला क्यों हताश है या उसकी हताशा गलतफहमी के कारण है या उसकी मानसिक स्थिति ही ठीक नहीं है।
ऐसे में आज नवोदय टाइम्स में एक खबर है, मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए देना होगा माता-पिता का एसआईआर विवरण। एजेंसी की खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने निर्देश जारी कर, मतदाता सूची में शामिल होने के लिए फॉर्म-6 भरने वाले नए मतदाताओं के लिए अपने माता-पिता का एसआईआर विवरण देना अनिवार्य कर दिया गया है। यह घोषणा पिछले साल जून में बिहार में शुरू किए गए एसआईआर में जोड़ी गई थी। नए मतदाताओं को फॉर्म- 6 के साथ यह घोषणा भी जमा करनी थी। अधिकारी ने इस बात पर जोर दिया कि घोषणा को निर्देशों के जरिए जोड़ा गया था और फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अधिकारी ने कहा, ‘इससे मतदाताओं के सत्यापन में मदद मिलती है और नए मतदाताओं को आवेदन के साथ जमा किए जाने वाले जरूरी दस्तावेजों की संख्या भी कम हो जाती है।’ चुनाव आयोग के अधिकारी के नाम के बिना छपी या छपवाई गई इस खबर को निर्वाचन आयोग के निर्देश के रूप में पेश किया गया है। तथ्य यह है कि इंडियन एक्सप्रेस ने कल यानी इतवार, 12 जुलाई 2026 को को दामिनी नाथ की बाईलाइन वाली एक विशेष खबर छापी थी जिसमें यह जानकारी दी गई थी और आज की यह खबर उसी को जबरदस्ती थोपने की कोशिश लगती है। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर में लिखा था, चुनाव आयोग ने एक्सप्रेस के सवालों के जवाब या उसपर टिप्पणी करने की अपील का जवाब नहीं दिया। संबंधित अधिकारी से संपर्क नहीं किया जा सका। इसके बाद आज नवोदय टाइम्स में यह ‘खबर’। जाहिर है, यह भी प्रेस कांफ्रेंस यानी सवालों से बचने की कोशिश और मन की बात करने जैसा मामला है। एक्सप्रेस की खबर की खास बातें बताने से पहले बता दूं कि इसे किसी ने फॉलो किया हो या नहीं, नवोदय टाइम्स ने उसका हवाला दिए बगैर चुनाव आयोग का कथित निर्देश या स्पष्टीकरण छापा है वह भी अधिकारी का नाम दिए बगैर।
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर में लिखा था, चुनाव आयोग ने नए मतदाता बनाने वाले फॉर्म में बदलाव किया है, एक ऐसा हिस्सा जोड़ा है जिसमें आवेदकों से उनके माता-पिता का एसआईआर विवरण मांगा गया है। अखबार ने यह खबर चुनाव आयोग के पोर्टल पर हुए (या किए गए या दिखे) बदलाव के आधार पर किया था। यह सब तब किया गया है जब चुनाव आयोग के एसआईआर के दौरान 10 राज्यों में मतदाता सूची से 5.58 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं। कानून कहता है कि इस तरह का परिवर्तन केंद्र सरकार ही कर सकती है। इसमें उस प्रक्रिया का भी जिक्र है, जिसका पालन नहीं किया गया है। यह अलग बात है कि अब सरकार और चुनाव आयोग एक ही हैं। आप जानते हैं कि नियम सभी वयस्क नागरिकों को वोटर के रूप में पंजीकृत करने का है, पहले कोई दस्तावेज नहीं मांगा जाता था और आप जिस चुनाव क्षेत्र में रह रहे होते थे वहां के वोटर होते। बीएलओ आपके घर आकर यह सुनिश्चित कर लेता था और जरूरत हुई तो आस-पास के लोगों से पूछ लेता था। किसी खास निर्वाचन क्षेत्र में रह रहा कोई व्यक्ति वोटर तभी नहीं होता जब उसके खिलाफ शिकायत होती और शिकायत को गलत साबित करना वोटर का काम नहीं हो सकता है। शिकायतकर्ता का काम है कि वह अपनी बात साबित करे लेकिन जो हो रहा है वह सामने है और मीडिया का ‘काम’ भी। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी मूल खबर में चुनाव आयोग के दो वरिष्ठ पूर्व अधिकारियों के हवाले से कहा है कि चुनाव आयोग ऐसा नहीं कर सकता है और यह अधिकार सिर्फ सरकार के पास है और वह चुनाव आयोग की सलाह से संशोधन करके आधिकारिक गजट में अधिसूचित करे तभी होता रहा है। कानून और विधि मंत्रालय भी यह काम कर सकता है लेकिन चुनाव आयोग तो इसमें कॉमा, फुल स्टॉप भी नहीं लगा सकता है। एक्सप्रेस ने यह भी बताया था 2021 में संसद ने नियम बदला था और चुनाव आयोग को आधार कार्ड मांगने की अनुमति दी गई थी। कानून मंत्रालय ने 17 जून 2022 को इसकी अधिसूचना जारी की थी। नालायक मीडिया अगर इस तरह सरकार का साथ दे रहा है तो प्रचारकों के तर्कों का जवाब नहीं। पद्म विजेता पत्रकार सुरेन्द्र किशोर ने लिखा है, ‘‘गैर-गोदी पत्रकारिता’’ के खतरे, तलवार की धार पर चलने जैसा! …. जो राजनीतिक शक्तियां तब सत्ता में थीं, वही आज मीडिया के एक बड़़े हिस्से पर ‘‘गोदी मीडिया’’ बन जाने का आरोप लगा रही है। पर, उसने खुद 80 के दशक में क्या-क्या किया, प्रेस बिल लाने के अलावा भी!? ठीक है कि भूली बिसरी यादों में 1980 के प्रेस विधेयक को ही याद किया जाएगा भले ही वापस ले लिया गया था। अभी ई-20 मामले में टोयोटा जैसी विदेशी कंपनी की शिकायत करने पर बिहार के यूट्यूबर मनीष कश्यप के खिलाफ एफआईआर चर्चा का विषय नहीं है। वह भी तब जब जीवन भर ईमानदारी की पत्रकारिता कर चुके 75 पार पत्रकार को घर चलाने के लिए अभी भी सक्रिय रहना पड़ रहा है। इसलिए वह लिखेगा वही जो बिकेगा। समस्या सिर्फ यह है कि लिखने वाले को इस सरकार ने पद्म सम्मान दिया है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



