
पुष्य मित्र-
माफ कीजिएगा, आप पत्रकार नहीं हैं। आप एंकर हैं।
अमूमन मैं इस तरह की टिप्पणी से बचता हूं। मगर अभी एक अपवाद स्थिति है और खुद मैं इस परिस्थिति में हूं कि यह लिख सकता हूं। और लिखना जरूरी भी है।
तो आप खुद को पत्रकार मत कहिए। आप एंकर हैं। हालांकि आप कभी-कभार फील्ड में दिख जाती हैं।
सच तो यह है कि अपने पूरे करियर में आप न अच्छी पत्रकार बन सकीं, न अच्छी एंकर।
क्योंकि एंकर के रूप में आपका काम अपने पैनल की बात को आगे बढ़ाना था, अपनी राय और एजेंडा थोपना नहीं।
उसी तरह पत्रकार के रूप में आपका काम फील्ड से तथ्य बटोर कर ज्यों का त्यों दिखाना था, अपने हिसाब के तथ्य को दिखाना नहीं।
मगर आपकी ट्रेनिंग ही उस माहौल में हुई कि आपने एंकर और पत्रकार का एक ही मतलब समझा। एजेंडा सेटिंग। तथ्यों के साथ अपने हिसाब से खिलवाड़।
और माफ कीजिए, आपने हमेशा सरकार के पक्ष में एजेंडा सेट किया और देश और समाज में नफरत को बढ़ावा दिया। आपके इसी अपराध की सजा कल पटना में आपके रिपोर्टर ने भुगता, माइक पकड़ने वाला हर पत्रकार आज भुगत रहा है। आपको इसके लिए शर्मिदा होना चाहिए था। आपके अंदर गिल्ट होना चाहिए था। मगर वह नहीं है, यह अफसोस की बात है। और सबसे बुरा यह है कि आप पत्रकार शब्द के पीछे अपने अक्षम्य अपराध को छिपाने की बेशर्मी भरी कोशिश भी कर रही हैं। यह सबसे बड़ा अपराध है। क्योंकि आप पेशे की नैतिकता को भी दांव पर चढ़ा रही हैं, अपने एजेंडा सेटिंग के लिए।
हां, यह सिर्फ आपके बारे में नहीं है। आपके जैसे दर्जनों एंकरों के लिए है, जिन्होंने पिछले 12 साल में पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ सरकार का भोंपू बनने का काम किया है और पत्रकारिता के पवित्र पेशे को तबाह किया है।
और हां, जनता को फर्क करना सीखना चाहिए कि पत्रकार कौन है और एजेंडबाज कौन हैं।
दूसरी बात, एजेंडा चलाने वाले सिर्फ सरकारी पत्रकार नहीं हैं, वे भी हैं जो इस सरकार को उखाड़ फेंकने वाली ताकत के एजेंडे पर चलने हुए अपने स्टूडियो से रोज अलग तरह का एजेंडा चलाते हैं। क्योंकि वे भी स्टूडियो को ही ताकतवर बना रहे हैं।
दिक्कत यह है कि आज की पत्रकारिता में स्टूडियो तानाशाह हो गया है और पत्रकार निरीह। जबकि स्थिति उलट होनी चाहिए थी। स्टूडियो को विनम्र होना चाहिए था। क्योंकि वे तमाम सच्ची सूचनाओं के लिए ग्राउंड रिपोर्टरों पर निर्भर हैं।
सच पत्रकारों के पास है, एंकरों के पास नहीं। मगर एंकरों के पास ताकत का नशा है।
इस वक्त की सबसे बड़ी दिक्कत ही यही है कि स्टूडियो और एंकर ताकतवर हो गए हैं। जिस रोज ये विनम्र होंगे, पत्रकारों की मेहनत और वस्तुनिष्ठ सूचनाओं के आधार पर अपनी बात रखना सीखेंगे। तभी पत्रकारिता बचेगी।
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