
विश्व दीपक-
यूपीए वन का दौर था. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री. शिवराज पाटिल देश के गृहमंत्री थे यानि सरकार के नंबर टू.
साल था – 2008.
मुंबई में हुये आतंकवादी हमले के दौरान उन्होंने अपना कपड़ा बदल दिया. उन्हें किसी कार्यक्रम में जाना था. इसी टीवी मीडिया ने पाटिल साहब को नंगा कर दिया. कहा – देश में आतंकवादी हमला हुआ है, गृहमंत्री को सूट बदलने की पड़ी है. गृहमंत्री की कोई जिम्मेदारी है या नहीं?
मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी ने पाटिल की छुट्टी कर दी. इसके बाद उनका पॉलिटिकल कैरियर खत्म ही हो गया.
साल – 2026.
संसद से दो किलोमीटर दूर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया. छात्रों को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया. कुछ तो मरणासन्न हैं. सरकारी अस्पताल इस बारे में जानकारी नहीं दे रहे हैं. पुलिस ने छात्रों का खाना-पीना, पानी बंद कर दिया.
लेकिन मीडिया अमित शाह से क्या सवाल पूछ रहा है? उनकी धोती और नये लुक पर. मीडिया की दिलचस्पी यह जानने में है कि अमित शाह की धोती असम की है या बंगाल वाली.
देश भर में चल रहे छात्रों के प्रदर्शन के बीच गृहमंत्री अमित शाह से उनकी धोती पर सवाल पूछना उस सवाल से भी बदतर है जो अक्षय कुमार ने मोदी से पूछा था – आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर?
बताने की ज़रूरत नहीं कि दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन आती है जिसके मुखिया अमित शाह हैं. मीडिया को अमित शाह से छात्रों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई पर, पैलेट गन के इस्तेमाल पर सवाल करना था. लेकिन नहीं. मीडिया का ध्यान उनकी धोती पर है.
वही देश है. वही मीडिया है. वही पत्रकार हैं लेकिन सवाल बदल गये. आज गृहमंत्री से जवाब मांगने का साहस मीडिया के अंदर नहीं है.
फिर जब जनता टीवी पत्रकारों का कपड़ा फाड़ती है, हूटिंग करती है तब भक्त प्रजाति के लोगों को दर्द होता है. सवाल उठाते हैं कि मीडिया से बदसलूकी क्यों की जा रही है?
अपने अंदर झांकर देखो अंधभक्तों. खुद से सवाल करो कि जिस मीडिया को लोग नेता, मंत्री, जज, कलेक्टर से भी ज्यादा सम्मान देते थे आज उस पर जूते क्यों बरसाये जा रहे हैं?


