शंभुनाथ शुक्ला-
साधारण दिखने वाला असाधारण आदमी!
अगस्त 1983 में मैं जनसत्ता ज्वाइन करने दिल्ली आया तब पता चला कि रिपोर्टिंग डेस्क के मुखिया राम बहादुर होंगे। पर ये राम बहादुर कौन हैं, यह नहीं पता था। राजीव शुक्ला ने एक दिन बताया कि राम बहादुर वही छात्र नेता हैं, जिनका जलवा पूरे बीएचयू में था। जब उनसे मिला तब वे खादी का एक मटमैले रंग का कुर्ता और पाजामा पहने थे। हल्की दाढ़ी और बेतरतीब से बाल। मैंने सोचा यही राय साहब अपने साथी हैं। पर मन में उनका नाम ज़िंदा था। मैंने कहा, राय साहब हमारे प्रोफ़ेसर डॉक्टर जेबी सिंह आपके बारे में बताया करते थे। वे बहुत खुश हुए, ढेर सारी बातें हुईं।
इसके बाद राय साहब रोज मिलते, उसी सादगी और ताज़गी के साथ। उस समय सभी साथी दिल्ली में नये-नये आए थे। सबके साथ उनके घर-गांव की यादें जुड़ी थीं। ऊपर से अख़बार छप नहीं रहा था। प्रभाष जी हमें बस भाषा सिखाते कि आने वाले अख़बार जनसत्ता की भाषा कैसी होगी। मसलन ‘उनके अनुसार’ की बजाय ‘उनके मुताबिक़’ लिखा जाएगा। ‘नई’ नहीं ‘नया’ होगा। ’स्थाई’ की बजाय ‘स्थायी’ लिखें। वाक्य छोटे हों और बात को उलझाएँ नहीं उसे सरल भाषा में पाठक को बताएँ। उसी तरह लिखें जिस तरह बोलते हैं।
सबसे मुश्किल बात थी, ‘द्वारा’ शब्द को हटा देना। ‘द्वारा’ एक ऐसा शब्द है, जिसके ज़रिए हम शॉर्ट में अपनी बात कह सकते हैं। मगर उस पर प्रतिबंध लगा होने से वाक्य बनाने में डेस्क को पसीने छूट जाते। ऊपर से प्रभाष जी यह भी कहते कि अगर रिपोर्टर ने इन नियमों का पालन नहीं किया तो डेस्क को कॉपी रिराइट करनी होगी। डेस्क का काम डाकिया का नहीं है कि कॉपी आई और जस की तस फ़ारवर्ड कर दी। डेस्क पर बैठे साथी को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी, आख़िर देर-सबेर उसी को संपादक बनना है।
(श्री रामबहादुर राय के 80 वें जन्मदिन पर आ रही पुस्तक में से अपने लेख का एक अंश)
अकु श्रीवास्तव-
अस्सी के राय साहब
यह किताब का नाम है और राय साहब को पूरी तरह समर्पित है। राय साहब मतलब राम बहादुर राय। राम बहादुर राय को लोग जनसत्ता वाले राम बहादुर राय और फिर बाद में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रमुख के तौर पर जानने – पहचानने लगे। राय साहब अपने आप में खुद इतिहास के गवाह भी हैं।
आपातकाल में जेपी आंदोलन में ठीक-ठाक भूमिका निभाने वाले राय साहब शुरू से ही विद्रोही रहे हैं और उनके ऊपर कोई कभी चाह करके भी बड़ा ठप्पा नहीं लगा पाया। जेपी आंदोलन से जुड़े और मीसा में पहली गिरफ्तारी भी हुई।
संघ वाले थे तो समझे गए.. लेकिन बाद में राजनैतिक सक्रियता और तमाम कर्म से समाजवादियों के करीबी रहे और खास तौर से चंद्रशेखर के।
राय साहब 80 के भले हो गए हो लेकिन अपनी सबसे पुरानी आदत, किसी का भी और जितना संभव हुआ, सहयोग करने की, वह आज भी नहीं छोड़ पाए हैं। भाई हेमंत शर्मा, मनोज मिश्रा, संदीप जोशी और संजीव कुमार के संपादन में प्रभात प्रकाशन ने 450 सौ से भी ज्यादा पृष्ठों की पूरी पुस्तक छापी, जो अपने आप में एक बड़ा काम है। इस पुस्तक में वह सभी नाम है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से राय साहब के करीब आए या उनके विचारों से प्रभावित हुए। बहुत से लेख तो ऐसे लोगों के भी हैं, जिन्होंने राय साहब से पूरी तरह से ना इत्तेफाक रखी और कुछ ऐसे लोगों के भी लेख हैं , जो राय साहब से मिले भी शायद नहीं है।
यह पुस्तक राय साहब से ज्यादा किसी भी एक व्यक्ति के कितने आयाम हो सकते हैं, इसका एक नमूना है।… और जब इस काम को हेमंत बाबू ने लिया तो तय बात है पुस्तक भी उतनी ही शानदार निकली है। हर पेज पर स्केच, हर लेखक का स्केच और शानदार डिजाइन के साथ और संपादन में अब यह किताब हम सबके बीच 25 सितंबर को जारी होने जा रही है। राय साहब स्वस्थ रहें और अपनी शतकीय पारी पूरी सक्रियता के साथ पूरी करें यही ईश्वर से प्रार्थना है।
प्रकाशक प्रभात प्रकाशन से यह पुस्तक ली जा सकती है। अमेजॉन पर भी उपलब्ध है। पुस्तक आपको कैसी लगी, यह ज्यादा जरूरी है समझना? चाहें तो बता सकते हैं।


