मुकुंद कुमार सिंह-
पिछले 15 वर्षों में जिस तरीके से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अस्तर और स्वतंत्र मीडिया के आवाज को दबाने की जो साजिश चल रही है इसके जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि हम हैं। जब से हम अपने सिद्धांत और वसूलों से समझौता करना शुरू किया तब से हमारा स्तर दिन पर दिन गिरता चला गया। कल्पना करिए 15 वर्ष पहले की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में कितना फर्क है। ‘पत्रकार साहब से पत्रकारवा’ और ‘स्वतंत्र मीडिया से गोदी मीडिया’ बनने में सरकार माफिया और अफसर के साथ-साथ देश के वह सभी मीडिया संस्थान भी जिम्मेदार हैं जिन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए अपने सिद्धांत से समझौता कर स्वतंत्र मीडिया को गुलाम बनाने कोई कसर नहीं छोड़ा। सार्वजनिक नाम बताने की जरूरत नहीं है ऐसे कई नाम और संस्थान है जिन्होंने पत्रकारिता को नेताओं की गोद में समर्पित कर राजनीति का चोला ओढ़ लिया तो कुछ पत्रकार के भेष में तरफदारी, दरबारी, दलाली करना शुरू कर दिए। हालांकि देश में कुछ ऐसे भी पत्रकार हैं जिन्होंने अपने सिद्धांत से कभी समझौता नहीं किया और ना ही सरकार के सामने घुटने टेके नतीजा उन्हें नौकरी गमानी पड़ी। यह स्थिति केंद्र में नई सरकार बनने के बाद ज्यादा देखने को मिली है।
अब बात अगर बिहार के पत्रकारिता की करें तो यहां की पत्रकारिता अफसर नेता और माफिया के सामने कब का घुटना टेक चुकी है। नेताओं को जब कभी पत्रकारों की भाषा खटकने लगती है तब सरकार की तानाशाही देखने को मिलती है वही राज्य के अधिकारी और माफिया का आतंक भी कुछ काम नहीं है। बिहार के स्वास्थ्य, शिक्षा, खनन, परिवहन और अन्य विभागों की करें तो हर जगह पत्रकारों की एंट्री पर पाबंदी है।
हॉस्पिटल में डॉक्टरों की गुडागर्दी….
बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच में कई बार पत्रकारों पर हमला हो चुका है और यह हमला तब किया जाता है जब पत्रकार अस्पताल की नाकामी को दिखाने की कोशिश करते हैं। हर हमला के बाद सरकार को ज्ञापन कई संस्थाओं के द्वारा दिया गया पर अब तक कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई जिससे हमलावरों में डर पैदा हो सके। कार्रवाई के नाम पर जांच और फिर पत्रकार को चुप करवाने के लिए संस्थान का विज्ञापन का हवाला देकर मामले को ठंडा बस्ते में डाल दिया गया। हमने अपने सिद्धांत और स्वाभिमान से जैसे ही समझौता करना शुरू किया अधिकारी हमारे ‘बाप’ बन गए। जिसका ताजा उदाहरण सहरसा के सरकारी अस्पताल में देखने को मिला जहां एक प्रतिष्ठित संस्थान के पत्रकार को अस्पताल के डॉक्टर ने बाप कहते हुए गाली ही नहीं दिया बल्कि बुरी तरह पीटा और तो और पत्रकार पर ही काम में बाधा पहुंचाने का आरोप लगाते हुए मामला भी दर्ज करवा दिया। जिसकी जानकारी डॉक्टर ने प्रेस रिलीज के माध्यम से सार्वजनिक किया है।
बिहार के सरकारी स्कूल में पत्रकारों की प्रवेश पर रोक….
बिहार में चल रहे सरकारी स्कूल में बच्चों को दी जानेवाली सुविधा में लापरवाही की बात जब पत्रकारों ने उठाना शुरू किया और ग्राउंड रिपोर्टिंग कर सरकारी स्कूल की बदहाली और भ्रष्टाचार उजागर करना शुरू किया तो सरकार ने उसे सुधारने के बजाय पत्रकारों के एंट्री पर ही बना लगाते हुए एक आदेश जारी कर दिया अब से कोई भी पत्रकार बिना परमिशन के सरकारी स्कूल में नहीं जा सकते हैं। कई पत्रकारों पर तो स्कूल प्रशासन के द्वारा मामला भी दर्ज करवा दिया गया। अब आप ही बताएं हमारी पत्रकारिता स्वतंत्र का से है।
प्रेस रिलीज और नेताओं के बर्थडे की तस्वीर तक ही पत्रकारों की सूचना-तंत्र…..
पत्रकारिता का मतलब क्या रह गया है? सुबह उठो, व्हाट्सएप पर आया हुआ सरकारी प्रेस रिलीज कॉपी-पेस्ट करो, नेता जी के जन्मदिन की फोटो पर “यशस्वी, ऊर्जावान, विकास पुरुष” लिखकर सोशल मीडिया पर चिपका दो, और शाम को सरकार कोसते हुए चाय पी लो। यही आज की पत्रकारिता का सच बन गया है। जनता के सवाल गायब हैं। अस्पताल में भर्ती मरीज की मौत क्यों हुई? बालू माफिया किसके संरक्षण में चल रहा है? जमीन के नाम पर गरीबों से ठगी कौन कर रहा है? कौन माफिया और अधिकारी किन नेताओं के यहां दरबारी कर रहा है इन सवालों पर खबर नहीं बनती। खबर बनती है तो सिर्फ इतनी – “माननीय मंत्री जी ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया”। हमारा सूचना-तंत्र अब सूचना नहीं, बल्कि चाटुकारिता का तंत्र बन गया है। इसका नतीजा ये निकला कि आज जब एक पत्रकार कहीं तीखी रिपोर्टिंग करने निकलता है तो उसे हर कदम पर माफिया रूपी बाप से मुलाकात होती है। क्योंकि उसे पता है कि ये पत्रकार अब सवाल पूछने वाला पत्रकार नहीं रहा, ये तो प्रेस रिलीज छापने वाला कर्मचारी बन गया है। इससे डरने की क्या जरूरत है?
पत्रकार साहब से पत्रकारवा’और’स्वतंत्र मीडिया से गोदी मीडिया’ बनने का यह सफर मुबारक हो साहब…
कभी देश में पत्रकार को लोग इज्जत से “पत्रकार साहब” कहते थे। कुर्सी दी जाती थी, पानी पूछा जाता था, और अफसर डरते थे कि कहीं कल अखबार में मेरी करतूत न छप जाए। और आज उसी पत्रकार को लोग पीछे से कहते हैं – “अरे वो पत्रकारवा है, उसको 500 दे दो, फोटो लगा देगा।” कभी हम गर्व से कहते थे – हम स्वतंत्र मीडिया हैं। आज जनता हमें खुलेआम गोदी मीडिया कहती है। और गलत क्या कहती है? क्यों हुआ ऐसा? क्योंकि हमने अपनी कीमत खुद तय कर दी। 2000 के विज्ञापन के लिए खबर बेच दी। नेता के जन्मदिन के केक के लिए अपनी कलम बेच दी। आज 90% पत्रकार फील्ड में 8000-10000 रुपये पर बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहा है। उसका EPF नहीं, ESI नहीं, बीमार होने पर अस्पताल में धक्का और मरने पर चंदा से कफन। और हम व्हाट्सएप ग्रुप में “पत्रकार एकता जिंदाबाद” का नारा लगा रहे हैं। नेताओं के तलवे चाटकर, अफसरों के आगे घुटने टेककर, माफियाओं से लिफाफा लेकर आपने सोचा था आप बड़े पत्रकार बन जाएंगे? नहीं साहब, आपने पत्रकारिता को ही छोटा कर दिया। आज भी वक्त है। या तो इसी तरह प्रेस रिलीज और बर्थडे की फोटो छापते रहो और ‘पत्रकारवा’ कहलाते रहो। या फिर कलम में फिर से धार लाओ, जनता के सवाल पूछो, और फिर से ‘पत्रकार साहब’ बनो।
सरकार, माफिया और अफसरों के आगे घुटने टेकती पत्रकारिता…खतरनाक…..
देश में पत्रकारिता किस मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाइए। पिछले 15 साल में हमने क्या किया?…. हमने सरकार के आगे घुटने टेके – विज्ञापन के लिए, मान्यता के लिए, हमने माफिया के आगे घुटने टेके – अफसरों के आगे घुटने टेके और खबर रोकने के लिए “भैया-भैया” करने लगे। इस घुटने टेक पत्रकारिता का नतीजा क्या निकला?… अखबार में खबर नहीं, सिर्फ सरकारी प्रेस रिलीज और नेताओं के जन्मदिन की फोटो छप रही है।
सोशल मीडिया क्रिएटर पत्रकारों के लिए खतरनाक….
देश में आज पत्रकारिता को सबसे बड़ा खतरा सरकार, माफिया और अफसरों से भी ज्यादा, गली-गली में पैदा हो रहे सोशल मीडिया क्रिएटर पत्रकारों से है। हाथ में 15 हजार का मोबाइल, 100 रुपये का माइक पर “NEWS” लिखा, और फेसबुक पर लाइव आकर खुद को पत्रकार बताने वाले ये लोग, असली पत्रकारिता की जड़ खोद रहे हैं। ये लोग थाने में घुसकर गाली-गलौज करते हैं, डॉक्टर से उलझते हैं, किसी भी अधिकारी को लाइव आकर धमकाते हैं। खबर से कोई मतलब नहीं। इनका काम है – वीडियो बनाओ, वायरल करो, और फिर सामने वाले से पैसा लेकर वीडियो डिलीट कर दो। आज बालू घाट पर, कल जमीन पर, परसों अस्पताल में। इन्होंने पत्रकारिता को वसूली का धंधा बना दिया है। जिससे सरकार और अफसरों को बहाना मिल गया है। अब जब कोई पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता है, तो सरकार कहती है – “ये सब फर्जी यूट्यूबर हैं, इन पर केस करो।” और उसी आड़ में असली पत्रकारों पर भी FIR हो जाती है।
सरकार को समझना होगा पत्रकार और क्रिएटर में फर्क…..
पत्रकार वो है जो सालों से फील्ड में है, जिसके पास खबर की समझ है, जो प्रेस काउंसिल के नियम मानता है। क्रिएटर वो है जो सिर्फ व्यूज और लाइक के लिए कैमरा लेकर कहीं भी घुस जाता है। उसके पास न खबर की समझ है, न भाषा की मर्यादा। हाथ में माइक, मुंह में गाली, और कैमरा ऑन करके सरकारी अफसर को धमकाना, हंगामा करना ही जिसका काम है। और दिक्कत ये है कि सरकार दोनों को एक ही तराजू में तोल रही है…. जो दुर्भाग्यपूर्ण है….
लेखक बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन महासचिव हैं।
मूल खबर…
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