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सुख-दुख

इंडिया डेली लाइव में सैलरी के लिए चक्कर काटकर हताश हुए इस पत्रकार ने मीडिया लाइन ही छोड़ने का फैसला लिया!

साथ ही अपने हक के पैसे के लिए कोर्ट भी जाएगा…

Blue metal gate with a yellow flower garland across it, closing a narrow alley beside a modern glass-front building with a pink sign reading 'NEWS' in the background.

सौरभ यादव-

निजी समस्याओं के लिए अपने सोशल मीडिया हैंडल का इस्तेमाल करने में हमेशा झिझक हुई है लेकिन कई बार मजबूरी हो जाती है जब जमीन पर कोई नहीं सुनता।

मीडिया के हालात सबसे ज्यादा इसी समय खराब हैं। नोएडा में दो जगह न्यूज़ चैनलों का जमावड़ा है। एक है सेक्टर 16 की फिल्म सिटी और दूसरे हैं सेक्टर 63 में…जहां कई तरह के नेशनल और रीजनल चैनल हैं.. सबसे ज्यादा खराब हालात यहीं पर हैं। एक-दो चैनलों को छोड़कर किसी चैनल में सैलरी टाइम पर नहीं मिलती इसके अलावा और भी कई तरह का शोषण होता है वो अलग।

ऐसे ही एक चैनल में हमने भी करीब 10-11 महीने काम किया फिर इसी साल फरवरी में रिजाइन कर दिया। चैनल का रिकॉर्ड कुछ ऐसा बताया गया कि जो छोड़कर जाता है उसका बकाया पैसा नहीं मिलता।

लेकिन मैं अपने हक का पैसा कभी नहीं छोड़ता तो सीनियर से पूछा, इसपर उन्होंने कहा कि आप नोटिस पूरा करके जाइए आपको मिल जाएगा। इसलिए रिजाइन के बाद नोटिस पूरा किया।

तब से अब तक 8 महीने हो गए कितने ही फोन कर लिए मैसेज कर लिए मेल कर दिए और दफ्तर के चक्कर भी काट लिए लेकिन पैसे नहीं दिए।

परेशान होकर 3 दिन पहले दफ्तर के सामने से ही 112 पर फोन किया पुलिस आई उन्होंने फोन पर चैनल के CEO दिव्य कुमार शुक्ला से बात की उन्होंने पुलिसवालों से कहा कि हमारी तरफ से ही देरी हुई है आज शाम को ही इनके अकाउंट में पैसे आ जाएंगे।

तब से तीन दिन हो गए लेकिन पैसे नहीं आए…

आज फिर दफ्तर जाकर 112 पर फोन किया पुलिस फिर से आई और इस बार भी चैनल वालों की तरफ से बहाने बना दिए गए। इस बार तो चैनल के CEO साहब ने कह दिया कि सैलरी के बारे में मुझे पता ही नहीं।

Two white cars parked side by side in a shaded lot beneath trees; the car in front is an Audi with a chrome grille.

ऐसा नहीं है कि चैनल के पास पैसा नहीं है, पैसा तो बहुत है। आप ऑफिस के सामने जाएंगे तो लाइन से उनकी लग्जरी गाड़ियां खड़ी मिल जाएंगी। जितना पैसा बकाया है उतना तो वो एक घंटे में खर्च कर देते होंगे। लेकिन एम्प्लॉई को परेशान करना है। दरअसल पैसा बहुत है लेकिन नियत ठीक नहीं है।

मेरे साथ भी यही दिक्कत है कि बकाया पैसा इतना ज्यादा नहीं है छोड़ा भी सकता है और इस मानसिक तनाव से बचा जा सकता है लेकिन फिर मन में रह जाएगा कि अपना हक छोड़ दिया और तब वो तनाव हमेशा के लिए होगा। इसलिए पैसा छोड़ना नहीं है उसके लिए लड़ना है और कानून से लड़ना है।

ये तो देख लिया कि पुलिस का इन्हें डर नहीं है तो अब देखते हैं कि अदालत से इन्हें डर लगता है या नहीं…

कई सीनियर लोगों ने समझाने के लहज़े में बताया कि पुलिस और कोर्ट के चक्कर में मत पड़ो इस वजह से किसी और चैनल में नौकरी नहीं मिलेगी…

इसपर मेरा उनसे बस यही कहना है कि अब मीडिया में तो नौकरी करनी ही नहीं है क्योंकि दिल्ली में जैसी पत्रकारिता करने आए थे वो तो किसी चैनल में होती ही नहीं। इन चैनलों में तो अब तक सिर्फ घर चलाने के लिए ही नौकरी चल रही थी अब वो भी नहीं करनी है कुछ और तलाश लेंगे कुछ और करके घर चला लेंगे लेकिन मीडिया में काम नहीं करेंगे…

एक बात और मौजूदा वक्त में हर क्षेत्र के ईमानदार लोगों के लिए जीवन बहुत मुश्किल कर दिया गया है उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाइए जिसके पास नौकरी भी न हो और उसे पुराने पैसे के लिए भी लड़ना पड़ रहा हो।

कानून के कोई जानकार हों तो बताएं कि लेबर कोर्ट में कैसे लड़ा जाए और वहां न्याय मिलने की कितनी उम्मीद है…

चैनल का नाम – इंडिया डेली लाइव
पता – A ब्लॉक, सेक्टर 63

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