अमित मिश्रा-
बात 2008 की है। मैं नवभारत टाइम्स, दिल्ली में इंटर्न के तौर पर दाखिल हुआ था। आईटीओ स्थित इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग के दूसरे फ्लोर पर पहुंचने के बाद मेरे सामने पत्रकारिता नहीं, हिंदी टाइपिंग पहली बड़ी चुनौती थी। मैं उसी जद्दोजहद में लगा रहता था।
इस दौरान ऑफिस में एक शख्स पर मेरी नजर पड़ी। वह इंसान सबसे फुर्तीला दिखता था। कभी कॉपी एडिट कर रहा है, कभी पेज बना रहा है, अभी किसी से ठहाके मार कर बतिया रहा है। मैं हैरान रहता था कि आखिर यह बंदा है क्या? कॉपी एडिटर, रिपोर्टर या पेज डिजाइनर?
धीरे-धीरे लोगों से मिलना-जुलना बढ़ा तो पता चला कि उसका नाम Lalit Sohan है। मजेदार बात यह थी कि उस समय उनके बारे में सबसे ज्यादा शिकायतें मुझे पेज डिजाइनरों से ही सुनने को मिलती थीं। वो अक्सर कहते – “यार, ये ललित रोज खुद ही पेज बना डालता है!”
उधर मैं अभी ठीक से टाइपिंग ही सीख रहा था। ऐसे में पेज बनाने का नाम सुनते ही हाथ-पांव ठंडे पड़ने लगते थे।
मैं इंटर्न से प्रति स्टोरी-पेमेंट वाले रास्ते से होते हुए सांध्य टाइम्स में रिपोर्टिंग करने पहुंच गया। वहां की संपादक सुषमा मैम ने बड़े स्नेह से मुझे रिपोर्टर के तौर पर तराशा। यहां भी एक डर मेरे साथ बना रहा – कहीं कोई पेज बनाने को ना कह दे। मैं दो रिपोर्ट/ट्रांसलेशन ज्यादा लिखने को तैयार रहता था, लेकिन पेज बनाने से बचता।
फिर एक दिन देखा, सांध्य टाइम्स में भी ललित भाई की एंट्री हुई।
आते ही उन्होंने खबर लिखने से लेकर पेज बनाने तक का तूफानी काम शुरू कर दिया। सुषमा मैम खुश – उनको तो जैसे कोई सुपरमैन मिल गया हो।
ललित भाई एक दिन मेरे पास आए और बोले, “भाई, क्या कर रहे हो?”
मैंने कहा, “पेज बन रहा है। बस उसे देखकर रिपोर्टिंग पर निकलूंगा।”
ललित ने तपाक से कहा, “क्या यार! डिजाइनरों के चक्कर में क्यों पड़े रहते हो? तुम उनसे कम स्मार्ट थोड़े ही हो। आओ, बैठो मेरे पास। बताता हूं पेज कैसे बनाते हैं। खुद बनाओ, प्रेस भेजो और निकलो रिपोर्टिंग पर।”
मैंने हिम्मत जुटाई और उस दिन ललित भाई ने मुझे पेज बनाने का पहला पाठ पढ़ाया। सच कहूं तो आज भी उस सीख का कर्जदार हूं।
जब तक ललित भाई पूरी तरह सांध्य टाइम्स पर छाए, तब तक मैं वापस नवभारत टाइम्स की तरफ बढ़ चुका था। मैंने संडे एनबीटी टीम जॉइन कर ली। लेकिन ललित भाई से संपर्क बना रहा।
मैं जब भी कोई अच्छी रिपोर्ट लिखता या कोई अच्छी हेडिंग लगाता, उसकी तारीफ करने वालों में ललित भाई सबसे आगे होते। कई बार तो उन्होंने सिर्फ यह कहने के लिए फोन किया कि, “आज अच्छा लिखा है।”
पत्रकारिता में यह बहुत दुर्लभ गुण है। आमतौर पर इस पेशे में लोग थोड़े असुरक्षित रहते हैं। दूसरे के अच्छे काम की खुले दिल से तारीफ कम ही करते हैं। लेकिन ललित भाई इस मामले में सबसे अलग हैं। मैं टेक्नोलॉजी पर लिखता तो उसके बारे में उत्सुकता से पूछते, कला-संस्कृति पर लिखता तो उस पर चर्चा करते। नई चीजें सीखने और समझने की उनकी भूख हमेशा मुझे प्रभावित करती है।
नवभारत टाइम्स में लगभग दस साल बिताने के बाद मैं दूसरे संस्थानों की तरफ बढ़ गया। ललित भाई के हाल चाल मिलते रहे। फिर करीब तीन साल पहले पता चला कि उनका तबादला दिल्ली से मुंबई हो गया है।
हरियाणा के सिरसा से दिल्ली के टाइम्स हाउस और फिर मुंबई के टाइम्स ऑफ इंडिया भवन सीएसटी तक का उनका सफर हिंदी मीडिया के युवाओं के लिए एक बेहतरीन केस स्टडी है।
ऐसे दौर में, जब हिंदी पत्रकारिता में बहुत से लोग नया सीखने या अपनी तय सीमाओं से बाहर निकलने से बचते हैं, ललित भाई हर नई चुनौती को सीखने का मौका मानते हैं। उनके लिए कोई काम छोटा-बड़ा या उनकी पोजिशन से बंधा हुआ नहीं है। शायद यही वजह है कि उनकी यात्रा लगातार आगे बढ़ती रही।
अब मुंबई की हिंदी पत्रकारिता को ‘ललित’ संपादक मिला है। मुझे खुशी है कि उनका अनुभव, उनकी जिज्ञासा और उनका पूरा “लालित्य” एनबीटी मुंबई और उसके पाठकों को मिलेगा।
ललित भाई और मुंबई के हिंदी पाठकों को मेरी ओर से ढेरों शुभकामनाएं।
एनबीटी मुंबई के संपादक के रूप में 16 साल का शानदार कार्यकाल पूरा करने वाले Sunder Chand Thakur सर ने फिटनेस की जो लंबी लकीर खींची है, उसके सामने अगर ललित भाई अपना पेट ही सपाट रख पाएं तो उसे ही उपलब्धि माना जाएगा।

(वैसे हालिया मुलाकात में मैंने भाँप लिया है कि मेरा पेट अभी भी ललित भाई से ज्यादा सपाट है!)
मुंबई में सल्लू भाई अगर हिंदी की किन्हीं दो महिला पत्रकारों के सामने थोड़े नर्वस नजर आते हैं, तो वे हैं रेखा खान (Rekha Khan) जी और उपमा सिंह (Upma Singh)!
मायानगरी की हलचलों को हिंदी पाठकों तक जिस करीने, निरंतरता और गहराई से ये दोनों पहुंचाती हैं, वैसा कम ही देखने को मिलता है। आप दोनों से मिलकर दिन बन गया
और हां, Bhavin Pandya से भी मुलाकात हुई तो ढेर सारी पुरानी यादें ताजा हो गईं।


