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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह की टीआरपी की भूख ने तब एक ईमानदार चौकी इंजार्ज की जान ले ली थी!

Close-up portrait of a middle-aged man with blue-framed glasses, gray hair and mustache, wearing a light blue shirt outdoors.

प्रदीप मलिक-

आज सुबह अभी इंडियन एक्सप्रेस के संडे मैगज़ीन में तवलीन सिंह पत्रकार के बारे एक प्रसंग छपा है। बहुत बड़ी पत्रकार है लेकिन मैं इस जैसी पत्रकारों को लानत भेजता हूँ।

बात उस समय की है जब ये किसी न्यूज़ चैनल में थी। उन दिनों हरियाणा में ऑनर किलिंग का ज़्यादा ही उछाल था मीडिया में। ऐसे में तवलीन सिंह अपनी टीम के साथ हमारे गाँव खरावड़ की पुलिस चौकी में पहुँची। पहले से सारी कहानी तैयार थी। छुपे हुए कैमरे इत्यादि। चौकी के इंचार्ज थे एएसआई काली राम। मैडम ने उनको कहानी सुनाई की उनकी लड़की किसी लड़के के साथ भाग गई है और पता चला है वो साईं मंदिर के पास आयेंगे, आगे जाने के लिए। आप हमारी मदद करके बरामद करवा दें।

काली राम निहायत शरीफ और सीधा आदमी था। बेटी के नाम पर एक सिपाही लेकर पहुँच गया, साईं मंदिर। वहाँ पहले से मैडम तवलीन के कलाकार मौजूद थे। काली राम ने दबोच लिया और ले आया चौकी में। वहाँ आकर एक पिता की तरह उस लड़की को धमका दिया कि ये माँ बाप हैं तेरी भलाई चाहते हैं तुझे पैदा किया है और तू ऐसा करती है। तुझे मार कर कोसी नहर में फेंक देंगे लाश भी नहीं मिलेगी।

लड़की ने कह दिया मैं माँ बाप के साथ जाऊँगी। चलते चलते तवलीन सिंह ने काली राम से कहा आपकी कितनी सेवा करनी है। कलीराम ने कहा मैडम मुझे तो कुछ नहीं चाहिए हाँ अगर आप हमारे काम से संतुष्ट हैं तो जैसा कि आप देख चुकी हैं यहाँ चौकी में शौचालय नहीं है जिसकी दिक्कत आप भी झेल चुकी हैं। आप चाहो तो वो बनवा दो सब के काम आयेगा। मैडम ने अपने आदमी को भेज एटीएम से पाँच हज़ार मंगवाए और काली राम को देकर निकाल गई। रात को मैडम का स्टिंग ऑपरेशन टीवी पर आ गया। एसपी ने भी देखा। उसने अपने किसी कर्मचारी से भ्रष्टाचार क़ानून में काली राम के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवा कर गिरफ़्तार कर लिया। काली राम की किसी ने एक नहीं सुनी।

उस समय सेशन जज थे श्री नवाब सिंह। मैंने काली राम की जमानत लगाई तो सेशन जज के शब्द थे की ये किस बेवक़ूफ़ ने FIR दर्ज की है। क्या जुर्म बनता है इसमें। पत्रकारों का ड्रामा था। और ये कहते हुए काली राम की जमानत मंजूर कर ली। काली राम को सस्पेंड कर दिया गया। बहुत ज़्यादा आहत हो चुका था। चालान आया। गवाही की तारीख़ लगी। तवलीन सिंह और उसकी टीम के लोग आए लेकिन काली राम नहीं आया। एडिशनल सेशन जज की कोर्ट में तवलीन सिंह ने अपने नखरे दिखाए। बैठने की जगह नहीं है। ऐसे कैसे बुला लिया।

इतनी देर में सूचना मिली काली राम ने इस दुख में आत्महत्या कर ली और चला गया.. गंदे लोगों की दुनिया छोड़ कर। मुझे नाम ध्यान नहीं है उन महिला एडिशनल सेशन जज का जिन्होंने तवलीन सिंह को इसकी औक़ात बतायी थी। उन्होंने कहा ये मेरी कोर्ट है मैडम आप का दफ्तर नहीं। यहीं चुपचाप खड़े रहो। आपकी इस टीआरपी की वजह ने एक ईमानदार पुलिस कर्मी की जान ले ली है। चले जाइए फ़ौरन इससे पहले मैं आपके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही करूँ। यह कान दबा कर निकल भागी।

क्या यही पत्रकारिता है। किसी के सीधेपन का इस तरह फ़ायदा उठाना। इस प्रकरण से पहले मैं काफ़ी सुनता था तवलीन सिंह के बारे लेकिन इसके बाद मुझे इनके नाम से भी चिढ़ हो गई है। यही पत्रकारिता है तो थू है।


‘फिलहाल राजनीतिक गैर-कथा से आसान है राजनीतिक फिक्शन लिखना’: उपन्यास से लेखिका तवलीन सिंह की नई पारी

Portrait of a woman seated at a cluttered office desk, next to a large newspaper-style page with the headline “Easier to write fiction at the moment” and a column of text on the left.

पत्रकार और स्तंभकार तवलीन सिंह ने अपने पूरे करियर में ठोस तथ्यों और राजनीतिक गैर-कथा के साथ काम किया है। अब पहली बार उन्होंने राजनीतिक फिक्शन का रुख किया है। अपने पहले उपन्यास ‘द एक्टर’ (The Actor) में उन्होंने भविष्य के भारत की एक काल्पनिक तस्वीर खींची है, जो मौजूदा हालात से कुछ हद तक असहज रूप से मिलती-जुलती लगती है।

तवलीन सिंह कहती हैं, “यह आपको हैरान कर सकता है या शायद नहीं। फिलहाल राजनीतिक गैर-कथा की तुलना में राजनीतिक फिक्शन लिखना आसान है।” उनकी अन्य चर्चित किताबों में Messiah Modi, Durbar और Kashmir: A Tragedy of Errors शामिल हैं।

‘द एक्टर’ में एक ऐसे भारत की कल्पना की गई है जो “अत्यधिक धार्मिकता की ओर बढ़ रहा है।” देश का प्रधानमंत्री ‘गुरुजी’ नाम का एक बेहद प्रभावशाली और लगभग अछूत जैसी छवि वाला शख्स है। वह कभी हिमालय की एक गुफा में रहने वाला योग गुरु था और चार बार चुनाव जीत चुका है। उसका न कोई परिवार है और न दोस्त। उसका दावा है कि उसकी एकमात्र दिलचस्पी देश की सेवा करना है। हालांकि उसके सहयोगी कार्टियर के चश्मे पहनते हैं।

इसी दुनिया में बॉलीवुड सुपरस्टार अमित सिंह की एंट्री होती है। लगातार तीन फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होने के बाद अमित अपने खत्म होते स्टारडम को बचाने का रास्ता तलाश रहा है। तभी उसका बचपन का दोस्त नरेश खन्ना उसे राजनीति में आने का न्योता देता है। नरेश दो बार सांसद रह चुका है और धर्मनिरपेक्ष आधार पर एक विपक्षी पार्टी खड़ी करने की कोशिश कर रहा है।

तवलीन सिंह जोर देकर कहती हैं कि ‘गुरुजी’ किसी मौजूदा राजनेता का चित्र नहीं हैं। वह कहती हैं, “वह वास्तव में मेरा गढ़ा हुआ किरदार है, क्योंकि किताब भविष्य में स्थापित है, इसे मत भूलिए।”

उपन्यास में उन दरारों को सामने लाया गया है जो देश को भीतर से बांट रही हैं। इनमें बुलडोजर के जरिए होने वाला न्याय, जातीय हिंसा और उसे संरक्षण देने वाली व्यवस्था, हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों में बढ़ता कट्टरपंथ, ‘जिहाद’ और ‘हिंदुत्व’ की राजनीतिक भाषा, विपक्ष पर हमला करने के लिए लोकप्रियतावादी राजनीति में ‘एलीट’ और विदेशी फंडिंग जैसे आरोपों का इस्तेमाल और परिवारों के कारोबार में बदलती राजनीति शामिल हैं।

सिंह कहती हैं कि अगर देश इसी रास्ते पर चलता रहा तो उनके काल्पनिक भारत और वास्तविक भारत के बीच की दूरी “अधिकतम 10 साल” रह जाएगी।

उनका मानना है कि धार्मिक राजनीति के प्रति देश के जुनून की कीमत उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को चुकानी पड़ी है। वह कहती हैं कि जब भारत में गोमांस खाने और उत्तर प्रदेश में कसाई की दुकानें बंद कराने, दंगों और मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस कराने जैसे मुद्दों पर बहस हो रही थी, तब चीन अपनी कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई क्षमता विकसित कर रहा था।

सिंह के मुताबिक, भारत के पास बेहतरीन सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और जरूरी संसाधन भी हैं, लेकिन देश ने अपनी एआई क्षमता विकसित नहीं की।

उपन्यास का भारत आलोचकों को चुप कराने के लिए सीधे तौर पर खुद को तानाशाही घोषित नहीं करता। इसके बजाय ऐसे कानून बनाए गए हैं जिनके तहत पत्रकारों और छात्र कार्यकर्ताओं को वर्षों तक बिना मुकदमे के जेल में रखा जा सकता है। इस काल्पनिक भारत में आम मतदाता हालात को समझते हैं और धर्मनिरपेक्ष भारत के कमजोर पड़ते ताने-बाने से परेशान भी हैं। लेकिन सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक मदद और मुफ्त योजनाओं के कारण वे इस कार्रवाई को बर्दाश्त करते रहते हैं।

किताब का नाम ‘द एक्टर’ है, जो शायद इस ओर भी इशारा करता है कि अभिनेता और पेशेवर राजनेता दोनों ही अभिनय की कला का इस्तेमाल करते हैं। तवलीन सिंह ने मुख्य किरदार एक अभिनेता को ही क्यों बनाया, इस पर वह कहती हैं कि वह लंबे समय से बॉलीवुड सितारों के राजनीति में आने से आकर्षित रही हैं। वह दिलीप कुमार के संक्षिप्त राजनीतिक सफर के अलावा अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना और विनोद खन्ना के राजनीतिक करियर का उदाहरण देती हैं।

उनके मुताबिक, “राजनेता कलाकार होते हैं” और जो नेता मंच पर लोगों को आकर्षित नहीं कर सकता, उसे वास्तविक नुकसान उठाना पड़ता है।

सिंह का कहना है कि फिल्मी सितारे ज्यादातर राजनेताओं से अधिक प्रभाव रखते हैं। वह कहती हैं कि यहां तक कि अंबानियों को भी अपने कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने के लिए फिल्मी सितारों की जरूरत पड़ती है। वह अमेरिका के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि वहां एक रियलिटी टीवी स्टार सत्ता में है, जो बार-बार ‘सेंट्रल कास्टिंग’ से किसी को लाने की बात करता है। उनके मुताबिक, वह लोगों के रूप और वफादारी को महत्व देता है।

तवलीन सिंह कहती हैं कि वह खुद इस बात से हैरान थीं कि उनका उपन्यास वास्तविक घटनाओं से कितनी नजदीकी दिखाता है। किताब लिखे जाने के बाद घटित कुछ घटनाओं की छाया उपन्यास के घटनाक्रम में दिखाई देती है। इनमें ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का जन्म और अभिनेता से नेता बने विजय का उभार शामिल है।

उपन्यास में नरेश की उत्तर प्रदेश और बिहार की ग्रामीण यात्राओं को राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की उस यात्रा से प्रेरित बताया गया है, जिसमें उन्होंने देश की समस्याओं को समझने के लिए करीब दो साल तक विभिन्न हिस्सों का दौरा किया था।

उपन्यास के प्रमुख किरदारों में राजनीतिक रिपोर्टर माया भी है। वह बॉलीवुड की खोखली बातचीत में पले-बढ़े राजनीतिक रूप से अनजान अमित की एक तरह से मार्गदर्शक बनती है। बाद में दोनों के बीच प्रेम संबंध भी बनता है। उपन्यास में उनका रिश्ता राजनीति के मुकाबले अधिक स्पष्टता से दिखाया गया है।

कहानी में एक पूर्व महारानी से नेता बनी महिला का किरदार भी है, जो दिल्ली की कई डिनर पार्टियों में अमित के साथ खुले तौर पर फ्लर्ट करती है। एक दृश्य में अमित को उसके निजी बाथरूम की नकली छत के पीछे छिपी नोटों की गड्डियां मिलती हैं।

जब पूछा गया कि क्या माया तवलीन सिंह की अपनी आवाज है, तो वह कहती हैं, “जरूरी नहीं, लेकिन जाहिर है कि उसके कुछ विचार मेरे विचार हैं।” उनके मुताबिक, माया का किरदार उन पत्रकारों और सोशलाइट्स से मिलकर बना है जिन्हें उन्होंने लुटियंस दिल्ली में अपने दशकों लंबे करियर के दौरान जाना है। अमित और नरेश भी इसी दुनिया में बड़े हुए हैं।

यह पूछे जाने पर कि क्या राज्य की मशीनरी किसी वास्तविक जीवन के सुधारवादी नेता नरेश तक आखिरकार पहुंच जाएगी, सिंह उम्मीद जताती हैं कि ऐसा जरूरी नहीं है। उनका कहना है कि मतदाता बदल चुके हैं। वे समझ सकते हैं कि उन्हें वोट के लिए रिश्वत दी जा रही है और यह भी देख सकते हैं कि वास्तव में कुछ नहीं हो रहा।

अगर काल्पनिक ‘गुरुजी’ उनकी किताब पढ़े तो वह क्या करेगा—किताब पर प्रतिबंध लगाएगा, उसे नजरअंदाज करेगा या उन्हें चाय और सेल्फी के लिए बुलाएगा? इस सवाल पर सिंह कहती हैं, “प्रतिक्रिया आपके घर आने वाला टैक्स छापा नहीं, बल्कि गोली होगी।”

सिंह सत्ता में बैठे लोगों को नाराज करने के परिणामों से अच्छी तरह परिचित हैं। उनके बेटे और लेखक आतिश तासीर का 2019 में ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया यानी OCI दर्जा रद्द कर दिया गया था। इससे पहले उन्होंने Time पत्रिका के कवर के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए लेख लिखा था। इसके बाद तासीर ने अपनी मां और बीमार पिता से मिलने के लिए सामान्य वीजा हासिल करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

तवलीन सिंह फिलहाल इस उपन्यास का दूसरा भाग लिखने के बारे में नहीं सोच रही हैं, लेकिन उन्होंने इसकी संभावना से इनकार भी नहीं किया है। वह कहती हैं, “नरेश जिंदा रहता है या मर जाता है, यह हम नहीं जानते। वह अस्पताल में है, लेकिन किताब के अंत में वह अभी जिंदा है।”

वह कहती हैं कि उन्होंने धर्म को राजनीति में जरूरत से ज्यादा शामिल किए जाने के कारण भारत को बदलते देखा है और इसी वजह से उन्हें यह उपन्यास लिखने की जरूरत महसूस हुई।

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