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आज के अखबार : बंगाल उपचुनाव में TMC उम्मीदवारों की दशा, दिल्ली में SIR के कमल छाप कमाल की चर्चा

हिंदी अखबार की क्लिपिंग: 10 हजार छात्राओं के लिए हॉस्टल के ऐलान का समाचार

संजय कुमार सिंह

आज सबसे पहले द टेलीग्राफ की एक खबर का हिन्दी अनुवाद पढ़िए और भाजपा की राजनीति को समझिए। देश में राजनीति ऐसी ही है। सत्ता के लिए कुछ भी करेगा वाले लोग राजनीति में आगे बढ़ने के लिए क्या कुछ करते हैं, कार्यकर्ताओं या सहयोगियों का क्या हाल होता है, उसी का उदाहरण है यह खबर। पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में छपी इस खबर का शीर्षक है, नंदीग्राम में मुख्यमंत्री को पुराने साथियों की नाराज़गी का सामना करना पड़ रहा है। हल्दिया डेटलाइन से अंशुमान फडीकर की खबर इस प्रकार है, नंदीग्राम से कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान की गिरफ़्तारी ने बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी को 2007 के ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के उनके कई पुराने साथियों के निशाने पर ला दिया है। इस आंदोलन ने लेफ्ट सरकार को गिराने में मदद की थी। पुलिस का कहना है कि उन्होंने चुनाव आयोग के आदेश पर मिलन को गिरफ़्तार किया – जिन्हें शनिवार को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया, जिससे वे चुनाव प्रचार नहीं कर पाएंगे – लेकिन चुनाव आयोग को अक्सर बीजेपी की कठपुतली माना जाता है।

सबुज प्रधान, जो कांग्रेस नेता के तौर पर ज़मीन आंदोलन में शामिल हुए थे और बाद में तृणमूल में चले गए, ने इस विडंबना की ओर इशारा किया कि उनके साथी आंदोलनकारी मिलन को सुवेंदु की सरकार ने गिरफ़्तार किया है, जबकि सुवेंदु ने ही उस समय तृणमूल नेता के तौर पर इस आंदोलन की अगुआई की थी। सबुज ने कहा, “हम (सबुज और मिलन) अलग-अलग राजनीतिक दलों से होने के बावजूद सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में ज़मीन अधिग्रहण विरोधी विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे।” उन्होंने कहा कि तृणमूल मंत्री के तौर पर सुवेंदु की कोशिशों से ही 2020 में लेफ्ट सरकार द्वारा ज़मीन आंदोलनकारियों पर दर्ज मामले वापस लिए गए थे। लेकिन सुवेंदु के बीजेपी में शामिल होने के कुछ ही हफ़्तों के भीतर, बीजेपी नेता नीलांजन चक्रवर्ती ने कलकत्ता हाई कोर्ट में मामले वापस लेने की प्रक्रिया को चुनौती दी, जिसके बाद कोर्ट ने हल्दिया कोर्ट में हत्या के मामलों को फिर से खोलने का आदेश दिया।

सबुज ने कहा, “कोर्ट ने 108 लोगों के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किए। हमें लगा था कि नई सरकार झूठे मामले वापस ले लेगी, लेकिन कभी सोचा नहीं था कि वे गिरफ़्तारियां भी करेंगी।” मिलन की गिरफ़्तारी से कुछ समय पहले, सुवेंदु ने एक पार्टी रैली में वादा किया था कि वे 2007 के ज़मीन आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ कथित तौर पर झूठे सभी मामले वापस ले लेंगे। पर हुआ कुछ और, नंदीग्राम से तृणमूल उम्मीदवार ने अंतिम समय में नाम वापस ले लिया, ममता बनर्जी के पास कोई विकल्प नहीं बचा तो उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन का एलान किया और कांग्रेस उम्मीदवार को एक पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। यह सब उस शुवेन्दू ने किया जो तृणमूल कांग्रेस में भी थे, नंदीग्राम के रहने वाले हैं और नंदीग्राम से जीतने के बाद इसे छोड़ दिया है तथा उपचुनाव में भाजपा के उम्मीदवार को जितवाने के लिए यह सब कर रहे हैं। चुनाव आयोग मदद कर रहा है सो अलग। 

इंदौर में कल हुए ‘छात्रों की गूंज’  कार्यक्रम की खबर आज दिल्ली में नहीं के बराबर है। बंगाल के उपचुनाव में अगर तृणमूल कांग्रेस परेशान है तो उसकी खबर भी दिल्ली में क्यों होनी चाहिए। लेकिन दिल्ली में एसआईआर ने कमाल कर दिया है और आज उसकी खबर भी कायदे से नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सेकेंड लीड है। शीर्षक है, मुख्यमंत्री को आयु में अंतर पर एसआईआर की नोटिस मिली; (अरविन्द) केजरीवाल और परिवार के लोगों को मैपिंग के मामले में। जाहिर है कि यह हास्यास्पद है लेकिन खबर तो है ही। मुंह छिपाने के लिए चुनाव आयोग ने कहा है कि इसमें एसओपी का पालन हुआ है और यह सूची फाइनल नहीं है। लेकिन राघव चड्ढा के मामले में जो हुआ उसके बाद फिर यही सब कहने की मजबूरी बहुत कुछ बताती है। मुझे लगता है कि इसीलिए यह खबर नहीं छपी है। और यह वैसे ही है जैसे कर्नाटक एसआईटी की चिट्ठी का जवाब नहीं देने के राहुल गांधी के आरोप के बाद किया गया था। 

इसमें कुछ नया नहीं हैं, सबको मालूम है कि यह सही जवाब नहीं है। बताया यह जाना चाहिए कि अगर मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री को नोटिस भेजा जा रहा है तो ऐसी प्रक्रिया का क्या मतलब है? अगर यह औपचारिकता है तो आम आदमी को परेशान क्यों किया जा रहा है और ऐसे स्पष्टीकरण आम आदमी के मामले में इतनी जल्दी क्यों नहीं आते हैं। आप जरा सा भ्रम में या अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए अपनी गलती होने के बावजूद नागरिक को ही परेशान कर रहे हैं। राघव चड्डा का नाम पंजाब से कट जाना और दिल्ली में जुड़ जाना अगर सामान्य है तो बाकी लोगों को यही सुविधा क्यों नहीं और सबके लिए सामान्य है तो ऐसी मतदाता सूची किसने बनाई? उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होना चाहिए और नहीं हो रही है तो मतदाता को परेशान करने का क्या मतलब। पहले ऐसी खबरों से सिस्टम हिल जाता था, एक अखबार में छपी खबर अगले दिन कई अन्य अखबारों में छपती थी।

अब वह सब नहीं होता है। संभव है, इसीलिए द हिन्दू ने एसआईआर वाली खबर को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी हो। हालांकि बंगाल एसआईआर की खबर पहले पन्ने पर है तो दिल्ली की खबर वैसे भी दिल्ली वाले पन्ने में हो सकती है। आज जनता को परेशान करने वाली खबरों के साथ एसआईआर की नालायकी भी खबर नहीं है। दूसरी ओर, द हिन्दू की खबर के अनुसार, छत्तीसगढ़ के रायपुर ज़िले की एक सिविल कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के उन 23 प्रवासी मज़दूरों में से 19 को रिहा करने का आदेश दिया है, जिन्हें पुलिस ने बांग्लादेशी नागरिक होने के शक में हिरासत में लिया था। परिवार वालों के मुताबिक, ये मज़दूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले के समसेरगंज और सहाबाबाद इलाक़ों के रहने वाले हैं। वे काम की तलाश में छत्तीसगढ़ गए थे, जहाँ वे बिलासपुर इलाक़े में घर-घर जाकर सामान भी बेच रहे थे। देश में नागरिकों के साथ ऐसा होगा तो कोई काम कैसे करेगा, काम के लिए कहीं जा कैसे पाएगा और जब काम ही नहीं करेगा तो मुफ्त राशन देने वाले को ही वोट देने को मजबूर होगा। इस सिस्टम में बदलाव क्यों आएगा और कोई लाना भी चाहे तो कैसे आएगा?

बंगाल एसआईआर की खबर द हिन्दू के साथ दि इंडियन एक्सप्रेस में भी है। खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी है कि बंगाल में एसआईआर के दौरान हटाए गए 27 लाख मतदाताओं में से 22 लाख ने अपील दायर की है। पुराना रिकार्ड है कि इनमें से 91 प्रतिशत को वापस ले लिया गया। बाकी विदेशी या बांग्लादेसी घुसपैठिये नहीं हो सकते हैं और घुसपैठिए  समझकर जो गिरफ्तार किए गए थे वे घुसपैठिए नहीं हैं। ऐसे में सरकार जो कर रही है उसे समझना मुश्किल नहीं है फिर भी हो रहा है तो खबर ढंग से छपनी चाहिए पर वह भी नहीं है। खासकर बंगाल उपचुनाव में जो हो रहा है वह तो चुनाव आयोग की परम नालायकी और भाजपा की मनमानी का उदाहरण है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, उम्मीदवार ने नामांकन वापस लेने की बात की और फिर चुनाव लड़ने आ गया।

द टेलीग्राफ ने लिखा है, ममता बनर्जी के रेजीनगर उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने शनिवार सुबह चुनाव से हटने का ऐलान किया, लेकिन कुछ ही घंटों में अपना फ़ैसला बदल लिया। इससे पार्टी और 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव से जुड़ा राजनीतिक ड्रामा दूसरे दिन भी जारी रहा। आप इसे पार्टी या उम्मीदवार की मजबूरी मान सकते हैं कि लेकिन लेवल प्लेइंग फील्ड मुहैया कराने की चुनाव आयोग की जिम्मेदारी के बारे में क्या कहेंगे? द टेलीग्राफ में बंगाल चुनाव से संबंधित एक और दिलचस्प खबर है। द टेलीग्राफ में टाटा संस के विवाद से संबंधित एक खबर भी है जो दूसरे अखबारों में नहीं है।

द हिन्दू की आज की लीड भी दिलचस्प है। मुख्य शीर्षक है – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, विकासशील देशों पर उत्सर्जन का आरोप गलत। उन्होंने कहा कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत से कम है; दावा किया कि देश ने 2015 के  पेरिस क्लाइमेट समिट में किए गए सभी वादे पूरे किए। साथ ही न्यूक्लियर एनर्जी में रुकावटों का भी जिक्र किया। खबरों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नई दिल्ली में एनजीटी कॉन्फ्रेंस में यह सब कहा। आप जानते हैं कि पर्यावरण नियंत्रण के नाम पर पुरानी गाड़ियों को कंडम करने से लेकर मिलावट वाले ई-20 पेट्रोल बेचने का नियम बना दिया गया है। पर्यावरण से संबंधित अपने आदेश को सुप्रीम कोर्ट स्वयं बदल चुका है और पर्यावरण मंत्री के चार करीबियों को एक साथ बिना कारण बताया हटाया और नौकरी से निकाला जा चुका है। जाहिर है पर्यावरण के क्षेत्र में भारी गड़बड़ हो सकती है। गाड़ियां कंडम करने और मिलावटी पेट्रोल बेचने जैसे मुश्किल निर्णय लागू करने के बाद अब कहा जा रहा है कि भारत में उत्सर्जन के आरोप ही गलत है। दि एशियन एज की आज की लीड यही खबर है। शीर्षक थोड़ा अलग है।  

देशबन्धु में राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम का शीर्षक है, सरकार पर बड़ा हमला। कांग्रेस नेता ने कहा, छात्रों से सिस्टम को खतरा क्योंकि वे सवाल पूछते हैं। जाहिर है, यह एक बड़ा मामला है और दिल्ली में भी पहले पन्ने पर हो सकता था लेकिन आज नहीं है। अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस की लीड एक ही है। खबर मुख्य रूप से यही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने  रूसी तेल से संबंधित अमेरिकी कानून पर दस्तखत कर दिए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने शीर्षक में यह भी लिखा है कि इससे भारत का कच्चा तेल स्रोत प्रभावित हो सकता है। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि इससे ट्रम्प को भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का अधिकार मिल गया है। 

हिन्दी अखबारों में अमर उजाला में यह खबर लीड है जबकि दैनिक भास्कर में दो कॉलम की खबर है। देशबन्धु और नवोदय टाइम्स में यह खबर नहीं है। दैनिक भास्कर की लीड दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव की खबर है। शीर्षक है – तीन पदों पर एबीवीपी जीती, निर्दलीय दीपांशु शौकीन बने उपाध्यक्ष। नवोदय टाइम्स ने इसे 10 हजार छात्रों के लिए हॉस्टल के ऐलान का कमाल बताया है। यहां सरकार के काम और उपलब्धियों का ऐसा ही प्रचार है। एनएसए अजित डोभाल ने कहा है, 20 साल में 38,000 अरब डॉलर की होगी देश की जीडीपी। आपको याद होगा प्रधानमंत्री ने देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन की करने के लिए कहा था तो यह बताया गया था कि यह कोई जादू नहीं है। अर्थव्यवस्था सामान्य तौर पर बढ़ती रहती है। इस रफ्तार से बढ़ेगी तो इतने समय में हो जाएगी और कम रही तो इतने में हो जाएगी। पर नोटबंदी, जीएसटी और फिर कोविड के कारण अर्थव्यवस्था के विकास की दर पहले जैसी नहीं रही और अभी भी यह पांच ट्रिलियन की नहीं हुई है। लेकिन अब नया दावा आ गया है।

यही हाल कौशल विकास का है। इसका प्रचार और संबंधित घोषणाएं आप जानते हैं। बीच में सीएजी की रिपोर्ट थी कि इसमें भारी भ्रष्टाचार हुआ है। खबरें भी आती रही हैं। उसपर कोई जवाब नहीं है लेकिन अब प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि कौशल विकास से खुल रहे हैं रोजगार के अवसर। जाहिर है कि सरकार की योजना के कारण अवसर बने होते तो सरकार प्रचार से नहीं चूकती। ऐसा कोई प्रचार नहीं किया गया है लेकिन अब यह दावा किया जा रहा है तो इसका मतलब समझना मुश्किल नहीं है लेकिन खबर तो यह है ही।

Smiling older man with gray hair and glasses wearing a light striped shirt, seated in a booth at a restaurant.

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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