इंडियन एक्सप्रेस में भाजपा का पक्ष – अगर यह सही है तो भाजपा को चाहिए कि राहुल गांधी की तरह प्रेस कांफ्रेंस करके, सवालों के जवाब देकर यकीन दिलाए कि यह लफ्फाजी और डूबते को तिनके का सहारा नहीं है। भाजपा, कांग्रेस से कमजोर और बुरी है – अब इसमें कोई शक नहीं रहा। राहुल गांधी अपनी बात कायदे से रख पाते हैं, यकीन दिला सकते हैं। अगर गलत बोल रहे हों तो भी नरेन्द्र मोदी राजा हरिश्चंद्र नहीं हैं। उनपर यकीन किया गया अब नहीं किया जा सकता है (जाना चाहिए)। ऐसी दलीलों और प्रचार से भाजपा अपनी कमजोरी ही दिखा रही है। मीडिया न बताये… कुछ साल और लगेंगे।
संजय कुमार सिंह
राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस में कल बहुत गंभीर आरोप लगाए गए। एंटी इनकंबेंसी की बात की, उदाहरण दिए और नरेन्द्र मोदी तथा अमित शाह के चुनाव जीतते रहने के दावे दिखा कर सवाल उठाया कि कोई ऐसा दावा किस भरोसे कर सकता है। मुझे लगता है कि आज ज्यादातर अखबारों की रिपोर्टिंग में आरोपों की यह मजबूती नहीं दिखती है। हिन्दी अखबारों ने आरोप का जवाब साथ छापने के पत्रकारिता के सिद्धांत का उपयोग करते हुए आरोपों को कमजोर करने की कोशिश की है। हालांकि, खबर लीड है। यह सब तब जब दि इंडियन एक्सप्रेस की खबर के बाद चुनाव आयोग के लचर स्पष्टीकरण से बात नहीं बनी। राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस ने आरोपों को और मजबूत किया।
अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड नहीं है और दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। मुझे नहीं लगता है कि प्रेस कांफ्रेंस की खबर इतनी ही है या इस्तीफे के लिए की गई थी। कहा जा सकता है कि हिन्दी अखबारों ने इस खबर को पूरा महत्व दिया है और भाजपा का पक्ष रखकर इसे कमजोर करने की कोशिश की है जबकि अंग्रेजी वालों ने इसे महत्व ही नहीं दिया है और मान रहे हैं कि मामला ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से आगे नहीं बढ़ेगा। रजत शर्मा के एक ट्वीट से लग रहा था कि ज्ञानेश कुमार को बलि का बकरा बनाने की योजना या रणनीति हो सकती है लेकिन वह राहुल गांधी की इस प्रेस कांफ्रेंस से पहले हो सकता था प्रेस कांफ्रेंस के बाद तो स्थिति काफी बदल गई है जो अंग्रेजी के कुछ अखबारों में नहीं दिख रहा है।
दि एशियन एज में भी यह खबर (राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस) लीड नहीं है। तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की नई कोशिशों को गति मिली। दि इंडियन एक्सप्रेस की मूल खबर से ऐसा माहौल बना हो या उसे ऐसा समझा गया हो तो भी राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस का मकसद सिर्फ महाभियोग या सीईसी को हटाना या उसकी मांग नहीं थी। वह सिस्टम, वोट चोरी की व्यवस्था आदि पर भी थी। इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड का शीर्षक यही है कि विपक्ष ने सीईसी को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की योजना बनाई। इसमें राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस नहीं है। एक्सप्रेस ने शीर्षक की दूसरी लाइन में प्रेस कांफ्रेंस का जिक्र किया है। राहुल ने कहा चुनाव में विश्वास खत्म हो रहा, वोट चोरी हो रही है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष के नए प्रस्ताव की खबर देती है। पहले पन्ने पर राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस की चर्चा यही बताने के लिए है कि खबर अंदर है और भाजपा का पक्ष इसके साथ ही है। यही बताया गया है और ऐसा है भी। यहां भाजपा का पक्ष एक विशेष शीर्षक के तहत है। भाजपा ने पलटवार किया, 1967 से राज्य दर राज्य कांग्रेस के बाहर होने का उल्लेख किया। कहने की जरूरत नहीं है कि यह चुनाव आयोग पर लगे आरोपों का जवाब नहीं है। यही बात चुनाव आयोग कहता तो लगता कि उसने चुनाव कराए हैं, उसे भी पता है और वह तथ्यों या नतीजे (जैसे भी हैं) के आधार पर बात कर रहा है और नतीजों में दम है। लेकिन राहुल गांधी के आरोप इससे बिल्कुल अलग है और नतीजा ऐसा रहा इससे राहुल गांधी के आरोप गलत या निराधार नहीं माने जा सकते हैं।
द हिन्दू ने इसी बात को राहुल गांधी के शब्दों में कहा है और मामला बिल्कुल अलग लगता है। शीर्षक है – राहुल गांधी ने कहा, चुनाव में गड़बड़ी हुई, सीईसी को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। मुख्य खबर के साथ की सिंगल कॉलम की एक खबर के अनुसार सीजेपी ने ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा मांग है और देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है। राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस की जो सबसे खास बात थी उसे अकेले द टेलीग्राफ ने लीड का शीर्षक बनाया है। प्रेस कांफ्रेंस में जो कुछ कहा गया उसे कायदे से पेश करने के सबसे करीब मुझे टेलीग्राफ ही लगता है। फ्लैग शीर्षक है, राहुल गांधी ने मोदी-शाह की वोट चोरी पर शोर मचाया, लोकतंत्र को नष्ट करने वालों पर निशाना साधा। मुख्य शीर्षक है, ज्ञानेश (कुमार) से कहा गया, सरकारी गवाह बन जाइए। सीजेपी ने 48 घंटे में इस्तीफे का अल्टीमेटम दिया, विरोध की अपील।
राहुल गांधी ने बताया कि चुनाव आयोग के उनके विरोध का असर हुआ है और दोनों चुनाव आयुक्तों ने उनके खुलासों के बाद एतराज करना शुरू किया। इनका जिक्र इंडियन एक्सप्रेस की खबर में था। दैनिक जागरण ने आज सूत्रों के हवाले से छपी खबर के शीर्षक से कहा है, हर फैसला सर्वसम्मति से, सुप्रीम कोर्ट ने भी घोषणापत्र को दी थी मंजूरी। पांच कॉलम की इस लीड का उपशीर्षक है, चुनाव आयोग ने तिथिवार और बिंदुवार बताया फैसलों पर एकमत थे तीनों आयुक्त। खबर पढ़ने से पता चला कि आयोग के ‘सूत्रों ने साक्ष्यों के साथ‘ यह जानकारी दी है। खबर इस प्रकार है, “चुनाव आयोग में दो आयुक्तों की असहमतियों की जो भी कहानी कही जा रही हो, पर सच यह है कि सभी मामलों में अंतिम फैसला सर्वसम्मति से ही लिया गया था।” इस तरह पूरा मामला या मुद्दा ही गोल करने की कोशिश की गई है।
मुझे लगता है कि राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस में अपने आरोपों को साबित कर दिया। वह इंडियन एक्सप्रेस की खबर से भी साबित हो गया था। राहुल गांधी ने अपने अंदाज में किया। अब दैनिक जागरण के सूत्र इसी की पुष्टि कर रहे हैं लेकिन अखबार मानने को तैयार नहीं है। दि इंडियन एक्सप्रेस की हाल की खबर यही थी कि तीन में से दो आयुक्तों के एतराज को माना नहीं जाता है, मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले ही काम कर रहे हैं। खबर में एतराज बताए गए हैं और दुनिया जानती है कि नहीं माने गए। आज भी कंफर्म किया जा सकता है। फिर भी यह कहना कि सर्वसम्मति से जारी हुए हैं – तकनीकी मामला है। इसका मतलब दबाव डालकर सहमति लेना, एतराज को दरकिनार कर देना तो है ही, जब जारी हो गए तो सर्वसम्मति से ही माने जा रहे थे। अब जब खबर छपी है, आरोप लगा है तो खबर को गलत साबित करने के लिए तकनीकी आधार बताया जा रहा है कि जारी हो गए तो सर्वसम्मति से ही जारी माने जाएं। इससे अलग कुछ नहीं। जो जवाब है वह असल में स्वीकारोक्ति है और यही व्यवस्था है। यह बहुत अजीब स्थिति हैं और राहुल गांधी ने कहा भी है। लेकिन यह सब हाइलाइट नहीं किया गया है शीर्षक तो छोड़िए।
दैनिक जागरण के उपरोक्त उदाहरण से अलग, देशबन्धु ने राहुल गांधी के आरोपों को ही महत्व दिया है। छह कॉलम की लीड का शीर्षक है, वोट चोरी से बनाई जा रही हैं सरकारें। उपशीर्षक है – मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने ‘वोट चोरी’ कराई, तुरंत इस्तीफा दें। नवोदय टाइम्स का शीर्षक इससे अलग है, सीईसी पर आर-पार की कोशिश। मुझे लगता है कि मामला सिर्फ सीईसी का नहीं है। पूरे सिस्टम का है और राहुल गांधी हमेशा सिस्टम की बात करते हैं। वे कहते रहें है कि मामला विचारधारा का है और हर जगह खास विचारधारा के लोग बैठा दिए गए हैं। यह भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी की बातों और चुनाव आयोग का बचाव करने से भी समझ में आता है। वरना, राहुल गांधी ने कहा है और उपशीर्षक है, चुनाव प्रणाली के साथ जो किया गया वह देशद्रोह है।
जाहिर है वे सिर्फ सीईसी की बात नहीं कर रहे हैं और चुनाव प्रणाली के साथ जो किया गया उसकी बात की जाए तो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, उससे संबंधित नियम, उसपर सुप्रीम कोर्ट का रवैया – सब शामिल है। ऐसे मामले में अखबार ने राहुल गांधी के आरोपों के मुकाबले भाजपा प्रवक्ता के पक्ष को भी समान महत्व दिया है। अगर चुनाव प्रणाली की बात हो रही है तो एसआईआर को सुप्रीम कोर्ट ने होने दिया है उसमें भाजपा के पक्ष का क्या मतलब? वैसे भी जब चुनाव आयोग संतोषजनक जवाब नहीं दे रहा है तो भाजपा को यह सब करने की जरूरत क्यों है और भाजपा यह सब कर रही है इसी से साबित होता है कि उसी ने ऐसा किया या करवाया है। वैसे भी, सत्ता की ताकत ही यह सब करवा सकती है किसी एक के लिए यह सब संभव ही नहीं है।
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग (असल में पूरे सिस्टम) पर लोकतंत्र को खतरे में डाल देने का आरोप लगाया है तो जवाब भाजपा दे रही है जो सत्तारूढ़ पार्टी भी है। इससे भी लगता है कि राहुल गांधी के आरोप सही हैं। नवोदय टाइम्स में उनका कहा उपशीर्षक है, अपने जमाने के फैसले याद करे कांग्रेस। मैं उन्हें और अपने पाठकों को भाजपा के विरोध की याद दिलाना चाहता हूं जो संयोग से एक किताब के रूप में अभी भी है। भारतीय जनता पार्टी ने पहले ईवीएम का विरोध किया था अब उसकी समर्थक-प्रचारक बन गई है। आज अगर भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भाजपा की ओर से चुनाव आयोग का बचाव किया है तो उस समय के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हन ने ईवीएम के खिलाफ किताब लिखी थी, डेमोक्रेसी ऐट रिस्क! (लोकतंत्र खतरे में!)। राहुल गांधी ने कल प्रेस कांफ्रेंस में यही आरोप लगाया कि लोकतंत्र खतरे में है और वही हुआ है जो भाजपा ने तब किताब के जरिए कहा था।
भाजपा सत्ता में है तो उसका रुख बदल गया है। अब भाजपा चुनाव आयोग और उसकी व्यवस्था का बचाव कर रही है। अखबार यह नहीं बता रहे हैं, सत्तारूढ़ दल के प्रचारक के रूप में काम कर रहे हैं। अमर उजाला में आज लीड का शीर्षक है, वोट चोरी से बनी सरकार अवैध कांग्रेस, राजनीति से हारे भ्रम फैला रहे हैं भाजपा। यहां जवाबी उपशीर्षक दिलचस्प है। पहला शीर्षक है, भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर आखिर क्यों नहीं दिखती : राहुल। भाजपाई जवाब है, राहुल को पता नहीं, दशकों सत्ता विरोधी लहर बिना रहे बिहार व बंगाल : त्रिवेदी। मुझे लगता है कि यह जबरदस्ती है। राहुल गांधी ने उदाहरण देकर हरियाणा और चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के साथ नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के वीडियो दिखाकर बात की थी और इसका जवाब इतना सरल नहीं हो सकता है। हटाए गए, जोड़े गए वोटर की संख्या और जीत-हार का अंतर भी मुद्दा है।
जहां तक पश्चिम बंगाल की बात है – वही तो उदाहरण है। उसी से तो आरोपों की पुष्टि होती है और लाखों लोगों के वोट के बिना हार को सत्ता विरोधी क्यों माना जाए। इसमें यह भी दिलचस्प है कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव का उदाहरण नहीं है। सत्ता विरोधी लहर कैसे बनी थी, उसका तो जिक्र भी नहीं करते भाजपाई। दूसरी ओर, कांग्रेस के दौर में होने वाले बूथ कैप्चरिंग का अब कोई मतलब नहीं है। अब कानून की मदद से चुनाव आयोग जो कर रहा है उसकी बात नहीं कर रहे हैं जबकि यही सब आरोपों के सबूत हैं।
दैनिक भास्कर की लीड का शीर्षक है – सीईसी इस्तीफा दें, गवाह बनें राहुल; कांग्रेस पारदर्शी चुनाव से तंग : भाजपा। अव्वल तो राहुल गांधी की इस पेशकश का जवाब सीईसी को देना चाहिए। बाकी किसी और के कहने का मतलब ही है कि राहुल गांधी के आरोप का असर सही जगह पर हुआ है। दूसरे पारदर्शी चुनाव तो हम सब लोग देख रहे हैं और इसका पता पहली बार ठोस ढंग से तब चला था जब 2019 के लोकसभा चुनाव से संबंधित एक अनुसंधान से भाजपा को दिक्कत हुई थी। इसके लिए एक निजी विश्वविद्यालय के एक शिक्षक को परेशान किया गया था और इससे संबंधित कहानियों के बाद मामला लगातार गर्म हुआ है। एंटी इनकंबेंसी पर भाजपा का जवाब…. “सत्ता विरोधी रुझान कांग्रेस के खिलाफ ही है” – सत्ता का अर्थ ही बदलता लगता है।
आज मैंने अपना पुराना अखबार जनसत्ता भी देखा। आप जानते हैं कि यह इंडियन एक्सप्रेस समूह का हिन्दी अखबार इसके बारे मे सिर्फ यह बताना है कि यहां भी मुख्य खबर के साथ भाजपा का पक्ष है। आरोप चुनाव आयोग पर है तो जवाब चुनाव आयोग को ही देना चाहिए। भाजपा के जवाब देने आगे आने से ही साबित हो जाता है कि आरोप सही है। एक जैसी खबरें एक साथ छापने के रिवाज है इसलिए साथ ही छपना चाहिए लेकिन देश की राजनीति बदल गई है और हम एंटायर पॉलिटिकल साइंस की दुनिया में हैं तो इस खबर को पहले पन्ने पर ही अलग कहीं और या अंदर के पन्ने पर क्यों नहीं छापा गया है? मुख्य शीर्षक है, “महाभियोग की तैयारी में विपक्ष; राहुल ने कहा, भरोसा हुआ खत्म”।
इंडियन एक्सप्रेस में भाजपा का पक्ष इसी तरह मुख्य खबर के साथ है। इससे लगता है कि यह भाजपा की जरूरत या मांग हो सकती है। लेकिन नवोदय टाइम्स की खबर और इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक से लगता है कि पर्यवेक्षकों या हिन्दू पत्रकारों का एक वर्ग यही चाहता या मानता है कि मामला सीईसी से आगे नहीं जाएगा या नहीं जाने देना है। भले उन्हें बलि का बकरा बनाना पड़े। इसमें रजत शर्मा का ट्वीट भी है। जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस में भाजपा की खबरों का शीर्षक अलग है। जनसत्ता की संबंधित खबर का शीर्षक है, चुनाव आयोग की प्रक्रिया कानूनन मजबूत : भाजपा। सच्चाई यह है कि कानून चाहे जितना मजबूत हो, प्रक्रियाओं का पालन नहीं किए जाने का ही आरोप है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।




