कमलेश सिंह-
बिहारी आ गए, ओय!
हमने बिहार में हुए जमुई कांड के परिप्रेक्ष्य में ‘तीन ताल’ में एक छोटी चर्चा की थी, जिसमें यह बात रेखांकित की कि वहां अप-संस्कृति को ढकने/छिपाने के लिए सुसंस्कृति का नितांत अभाव है। बिहार के बहुत सारे लोगों ने सहमति जताई और कइयों ने असहमति। कुछ नामधन्य लोगों ने गरियाया भी और क्रोध में कुछ विशेषणों से नवाज़ा। उनमें एक अज्ञानी ही था जो फ़िट बैठता है बाकि सब आवेश-जनित एवं औसत किसिम के थे। चार महानुभावों ने विशेषणों के साथ कुछ तथ्य भी साझा किए, जिनमें ज़्यादातर से मैं परिचित था, किंतु एक दो से मैं भी अनभिज्ञ था। मुझ पर की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों के इतर, श्री रविशंकर उपाध्याय जी और पुष्य मित्र जी ने जो चीजें साझा की वह यहां शेयर कर रहा हूं। यह आवश्यक है ख़ासकर उनके लिए जो बिहार की सांस्कृतिक समृद्धि से उतने परिचित नहीं हैं जितनी वहां से लगातार आती नकारात्मक ख़बरों से।
मैं फ़ेसबुक पर नहीं हूं। उपाध्याय महाशय के फ़ेसबुक पोस्ट से जो मेरे पास पहुंचा है। उनके ओछे शब्दों को बाहर रख रहा हूं क्योंकि वे इतने अच्छे संकलन पर खीर में कंकर जैसे थे। X के सुधिजनों तक ये तथ्य पहुंचना ज़रूरी है।
बिहार में पटना के अलावा 15 से अधिक प्रमुख संग्रहालय हैं, जबकि सरकारी रिकॉर्ड और विभिन्न श्रेणियों (राज्य, केंद्रीय, विश्वविद्यालय और निजी) को मिलाकर पूरे बिहार में दो दर्जन से अधिक कार्यरत संग्रहालय हैं। कुछ उदाहरण ले लीजिए मसलन पुरातात्विक संग्रहालय, नालंदा की स्थापना हुए सौ साल से भी ज्यादा हो गए हैं, आपको बता दूं कि वहां 1917 में नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई में मिलीं गुप्त और पाल वंश कालीन दुर्लभ मूर्तियाँ रखी हुई हैं।
पुरातात्विक संग्रहालय, बोधगया भी समकालीन है, जहां बौद्ध और हिंदू धर्म से जुड़ी प्राचीन प्रतिमाएँ और कलाकृतियां प्रदर्शित हैं। चंद्रधारी संग्रहालय, दरभंगा कलाकृतियों, प्राचीन सिक्कों और मिट्टी के बर्तनों के विशाल संग्रह के लिए प्रसिद्ध है।
महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगा में शाही परिवार से जुड़ी वस्तुएं, हथियार और हाथीदांत की बनी कलाकृतियां यहां देखने को मिलती हैं। नारद: संग्रहालय, नवादा विशेष रूप से क्षेत्र की लोक कला और पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं को संजोए हुए है।
गया संग्रहालय, गया में गया और उसके आस-पास के क्षेत्रों से प्राप्त प्राचीन मूर्तियां और पत्थर के अवशेष मौजूद हैं। बाबू कुंवर सिंह स्मृति संग्रहालय, जगदीशपुर (भोजपुर) में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू कुंवर सिंह की स्मृति में बना यह संग्रहालय ऐतिहासिक हथियारों और दस्तावेज़ों को प्रदर्शित करता है।
बिहारशरीफ संग्रहालय, नालंदा जो 1981 में स्थापित इस संग्रहालय में प्राचीन काल की पत्थर की मूर्तियाँ और अन्य पुरातात्विक अवशेष शामिल हैं। जैन सिद्धांत भवन (आर्ट गैलरी), आरा जैन धर्म से जुड़ी प्राचीन पांडुलिपियों और कला का अद्भुत संग्रह है।
वैशाली संग्रहालय, वैशाली में वज्जी संघ की प्राचीन भूमि की ऐतिहासिक महत्ता और भगवान महावीर व बुद्ध से जुड़े अवशेष सुरक्षित हैं। तो राजा विशाल के गढ़ और कोल्हुआ खुदाई के बहुमूल्य अवशेष हैं जहां आना ही अपने आप में इतिहास में खो जाना है।
आप आगे कहते हैं कि यहां दुकानों में टेक्स्ट बुक और कंपटीशन की किताबें मिलेंगी, पढ़ने की किताबें नहीं, आपको एक बार पटना के साथ विभिन्न जिलों में लगने वाले बुक फेयर में आना चाहिए। आपने आगे अपनी अज्ञानता प्रदर्शित करते हुए कहा है कि यहां अपसंस्कृति ऐसी है कि बिहार का कोई अपना नृत्य नहीं है, संगीत नहीं है जबकि बिहार की नृत्य और संगीत शैली का इतिहास ही नहीं वर्तमान भी समृद्ध है, जो यहां की वैदिक संस्कृति, कृषि जीवन और लोक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
बिहार की नृत्य शैली में सबसे महत्वपूर्ण कथक नृत्य है, जिसका जन्म ही बिहार में हुआ है। कथा को नृत्य शैली में कहने वाले कथकिए कहलाए। गया में कथक बिगहा और कथकपुर गांव है, जो आज भी अपनी परंपरा आगे बढ़ा रहे हैं। सारण में भी कथक की जड़ें गहरी रही हैं। इसके लिए आप शोभना नारायण की किताब पढ़ सकते हैं। इसके अलावा बिहार के लोक नृत्य तो बरसों से यहां के त्योहारों, बदलते मौसम और सामाजिक रीति-रिवाजों को दर्शाते रहे हैं। जट-जटिन, बिदेसिया, झिझिया, जीतिया, झूमर, कजरी नृत्य, डोमकच जैसी नृत्य शैलियां हैं।
अब आइए बिहार की संगीत परंपरा पर। इसके लिए मैं आपको गजेंद्र बाबू की किताब पढ़ने की सलाह दूंगा। गयाजी, दरभंगा, बेतिया घरानों ने न केवल ध्रुपद बल्कि ठुमरी और कजरी को भी अपनी प्रतिभा से थाम रखा है। बिहार के लोक गीतों को ले लीजिए, यहां बच्चों के जन्म पर ‘सोहर’ गाया जाता है। वहीं शादियों के दौरान ‘विवाह गीत गाए जाते हैं।
चैत के महीने में गाए जाने वाले ‘चैता’, सावन के महीने के ‘कजरी’ और होली के समय गाए जाने वाले ‘फाग’ या ‘फगुआ’ यहाँ बेहद लोकप्रिय हैं। पर्व गीत भी खूब हैं, बिहार के सबसे बड़े महापर्व छठ के गीत पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं, गाथा गीत हैं जिसमें ऐतिहासिक और वीर पुरुषों की कहानियों को गीतों के माध्यम से सुनाया जाता है, जैसे वीर लोरिक की कथा, ‘कुंवर सिंह की गाथा’, राजा सहलेस और अन्य कई हैं।
पुष्य मित्र जी ने बिहार में हिंदी के बड़े प्रकाशकों की पटना में उपस्थिति की ओर इशारा किया। पटना पुस्तक मेले के बारे में बात की, जो मुझे स्वयं प्रिय है। और मिथिला पेंटिंग की परंपरा। इस बार के तीन ताल में उनके पत्रों पर मज़ेदार चर्चा भी है।
अपनी बात से पीछे हटने के लिए मुझे और बेहतर दलील देकर मजबूर कीजिए। ये वाले मैं स्वयं कई बार उपयोग कर चुका हूं। पर वो अब भोथरा गए हैं। जमुई में उस बालिका के साथ हुए दुर्व्यवहार की चर्चा और अप-संस्कृति पर होती बहस में, मैं मिथिला पेंटिंग या कथक की उत्पत्ति को सामने लाकर हास्यास्पद काम करूंगा। जब बिहार की महत्ता और सांस्कृतिक धरोहर पर बात होगी, तब इन बिंदुओं को पटल पर रखूंगा और प्रयास रहेगा कि बिहार से कोई आप जैसे विद्वान लोग उसमें भाग लें।
बंधुवर, मेरी प्रतिक्रिया भी आप जैसी ही होती थी और होती है, क्योंकि कोई आपकी मिट्टी में उगी कंटीली झाड़ियों पर बात करे और बाग़ के फूलों की प्रशंसा ना करे तो कांटे सा चुभता है। मुझे भी चुभता था और है। मेरा अधिकार भी है कि अंधेरे पर हो रही बहस में मैं सरपंच की हवेली में दूर टिमटिमाते असंख्य दियों की तरफ़ इशारा कर कह दूं कि कौन कहता है कि अंधेरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। जब ढोंढ़ी को केंद्र में रखकर संगीतबद्ध किए गीत चारों तरफ़ चीत्कार रहे हों तो कैसे बताएं कि ये सोहर सा मधुर और मनोहर है। चंद्रगुप्त मौर्य, पाटलिपुत्र, गयाजी, नालंदा, विक्रमशिला, गुरू गोविंद सिंह, दानवीर कर्ण, गुड़, गोबर, सब बराबर की गुफाएं, जिसमें कहिए उसमें छुपाएं। पर बैर प्रीत मधुपान, जानत सकल जहान।
फ़िलहाल, अपने आसपास पूछ कर देखें कि शोधकर्मी समुदाय से बाहर कितने लोग जानते हैं ये तथ्य? और कितनों को सरोकार है इनसे? उपाध्याय जी शोधकर्मी हैं, संस्कृतिकर्मी हैं या संस्कृति विभाग के अधिकारी, मैं नहीं जानता। पर निंदा के लिए ही सही, इन तथ्यों को संकलित करने के लिए धन्यवाद। हमारा पिन सफल हुआ। बिहारी पिनकेंगे तब ही कुछ होगा। बाक़ी तो जो है सो हइये है। जय हो।
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