अभिमन्यु सिंह-
देश में सबसे ज्यादा चर्चित, जाने माने यू ट्यूबर Dhruv Rathee जर्मनी से अपनी जन्म भूमि भारत आए हुए हैं, उन्होंने सबसे पहले फिल्म अभिनेता प्रकाश राज से मुलाकात की, मौके पर अभिजीत दीपके, फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर आदि लोग मौजूद थे।
बताया जा रहा है इस बैठक में ध्रुव राठी जंतर मंतर में हो रहे प्रोटेस्ट में शामिल होकर, देश में हुई वोट चोरी, और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आवाज उठाकर, लोकतंत्र को बचाने लिए आगे आएंगे।
ध्रुव राठी हमेशा फैक्ट चेक और पुख्ता सबूतों के साथ करोड़ों भारतीय लोगों को खबर दिखाकर जागरूक करने का प्रयास करते रहते हैं। और आज जंतर मंतर में दिखाई दे सकते हैं।
एक बार किसी ने धमकी भी दी थी कि दम है तो भारत आ जा, ध्रुव राठी तीसरे दिन इंडिया गेट से लाइव वीडियो फोटो शेयर कर दिया। तो यह बंदा गुणवान होने के साथ-साथ साहसी और निडर भी है।
10 अक्टूबर को दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर बड़े राजनीतिक और छात्र आंदोलन का केंद्र बनने जा रहा है… CJP और कई छात्र संगठनों ने 10 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया है। आयोजकों का दावा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग दिल्ली पहुंचेंगे और इस प्रदर्शन में विपक्षी दलों से जुड़े नेता-कार्यकर्ता भी शामिल हो सकते हैं। CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके के बुलावे पर डिजिटल क्रिएटर ध्रुव राठी के भी इस आंदोलन से जुड़ने की खबर सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, वह 10 अक्टूबर के दिल्ली प्रदर्शन में शामिल हो सकते है, फिलहाल वे बैंगलोर में है वहीं, सोशल मीडिया और कुछ जगहों पर ऐसी खबरें चल रही हैं कि 10 अक्टूबर के मद्देनज़र दिल्ली में करीब 23 हजार CAPF जवानों की तैनाती की तैयारी की जा रही है। इस संख्या की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल स्पष्ट नहीं है। अब सबकी नजर 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर पर है। -अश्वमित गोस्वामी
पंकज कुमार जाट-
जर्मनी से ध्रुव राठी जैसे स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स और विचारकों का भारत लौटना यह साबित करता है कि अब यह लड़ाई सिर्फ किसी एक दल या नेता की नहीं, बल्कि इस देश के मूल चरित्र और लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने की अंतिम जंग बन चुकी है।
जिस प्रकार पिछले समय में किसानों के आंदोलन, पहलवानों के धरने और नीट-नेट पेपर लीक या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे जैसे मामलों में युवाओं ने अपनी संगठित ताकत का लोहा मनवाया, उसी तर्ज पर आज जनता जनार्दन को फिर से सड़कों पर उतरना पड़ रहा है।
हाल ही में चुनाव आयोग और अन्य स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली और ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर जिस तरह के गंभीर सवाल खड़े हुए हैं, उसने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को कटघरे में ला खड़ा किया है।
भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यदि मुख्य चुनाव आयुक्त या आयोग से जुड़े शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाए, तो जनता के पास संसद से लेकर सड़क तक सवाल पूछने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
ध्रुव राठी का इस आंदोलन से जुड़ना और इसे डिजिटल माध्यमों से वैश्विक स्तर पर ले जाना सत्ता के गलियारों में बैठे उन लोगों की नींद उड़ा रहा है जो यह सोचते थे कि गोदी मीडिया के जरिए सच को हमेशा के लिए दबाया जा सकता है।
यदि हम पिछले बड़े आंदोलनों के आंकड़ों और उनके परिणामों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि जब-जब देश की जनता और डिजिटल योद्धा एक मंच पर आए हैं, सत्ता को झुकना ही पड़ा है।
किसान आंदोलन (2020-21) के दौरान, जहां एक तरफ सरकार के पास मीडिया का भारी समर्थन और कॉरपोरेट संसाधनों की ताकत थी, वहीं दूसरी तरफ ध्रुव राठी, रवीश कुमार और अन्य स्वतंत्र पत्रकारों व डिजिटल क्रिएटर्स ने जमीन से जुड़े आंकड़े, वीडियो और जमीनी हकीकत देश के 50 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाई।
नतीजा यह हुआ कि दुनिया के सबसे बड़े बहुमत वाली सरकार को भी तीन काले कृषि कानून वापस लेने पड़े। इसी प्रकार, जब युवा शक्ति ने उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार के खिलाफ रोजगार और पेपर लीक के मुद्दों पर हुंकार भरी, तो कई मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी कुर्सियां छोड़नी पड़ीं।
अब बारी ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली के खिलाफ चल रहे इस ऐतिहासिक जन-आंदोलन की है। 8 तारीख को विशाल धरना प्रदर्शन और 10 तारीख को जंतर-मंतर पर होने वाला यह महासंग्राम इस बात का प्रमाण है कि अब देश की जनता ’56 इंच की छाती’ या ‘विश्वगुरु’ जैसे खोखले नारों के झांसे में आने वाली नहीं है।
आज डॉलर के मुकाबले गिरता रुपया, आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी की विकराल दर (जो पिछले कई दशकों में सबसे ज्यादा है), और चंद उद्योगपति मित्रों (जैसे अडानी-अंबानी) को देश की संपत्तियां कौड़ियों के भाव बेचने की नीतियां सरकार की पोल खोल चुकी हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की धौंस हो या देश के भीतर के तथाकथित चापलूस और अंधभक्त, कोई भी अब इस जन-आसमान के सैलाब को रोक नहीं सकता।
इस आंदोलन को अपनी अंतिम और निर्णायक मंजिल तक पहुंचाने के लिए सिर्फ ध्रुव राठी या कुछ गिने-चुने नाम ही काफी नहीं हैं, बल्कि देश के हर छोटे-बड़े यूट्यूबर, इंस्टाग्राम क्रिएटर, स्टैंड-अप कॉमेडियन, कलाकार, फिल्म अभिनेता और विपक्ष के हर कद्दावर नेता को अपनी राजनीतिक असहमतियों को दरकिनार कर खुला समर्थन देना होगा।
कांग्रेस पार्टी से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पहले से ही सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि क्षेत्रीय दलों के सभी नेता, छात्र संगठनों के प्रतिनिधि और नागरिक समाज के बुद्धिशीवी एक साझा मंच पर आएं।
आंदोलन की सफलता के लिए ठोस रोडमैप:
डिजिटल एकजुटता: देश के सभी प्रमुख स्वतंत्र क्रिएटर्स एक ही हैशटैग और एक साझा डिजिटल अभियान चलाकर हर दिन शाम को ऑनलाइन लाइव डिबेट और जमीनी रिपोर्टिंग करें।
जमीनी मोबिलाइजेशन: 8 तारीख के धरने के बाद 10 तारीख को जंतर-मंतर पर सिर्फ दिल्ली के ही नहीं, बल्कि हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार से युवाओं और किसानों का बड़ा जत्था पहुंचे।
लीगल और वैचारिक विंग: वकीलों का एक ऐसा पैनल तैयार किया जाए जो आंदोलनकारियों पर होने वाले किसी भी दमनकारी प्रशासनिक एक्शन या फर्जी मुकदमों का कानूनी रूप से डटकर मुकाबला करे।
संसद से सड़क तक दबाव: विपक्ष के सभी सांसद संसद के भीतर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग को पुरजोर तरीके से उठाएं।
आज देश में स्थिति यह हो चुकी है कि नरेंद्र मोदी जी की सरकार अपनी ही बुलाई गई नाकामियों के मकड़जाल में उलझ चुकी है।
यह भ्रम टूट चुका है कि कोई कॉर्पोरेट साम्राज्य, कोई गोदी मीडिया, या कोई कथित चाणक्य नीति जनता के बुनियादी अधिकारों को हमेशा के लिए कुचल सकती है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयानों से लेकर सरकार की आर्थिक नीतियों तक, हर तरफ असमंजस और बौखलाहट साफ दिखाई दे रही है। जनता अब किसी पुलिस प्रशासन, किसी बिकाऊ संस्था या किसी सत्ता के पहरेदार के भरोसे नहीं बैठी है, बल्कि अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए सड़कों पर उतर चुकी है।
याद रखिए, यह देश किसी एक व्यक्ति या पार्टी की बपौती नहीं है; यह 140 करोड़ भारतवासियों का है और इसे बचाने के लिए ध्रुव राठी जैसे योद्धाओं का मैदान में उतरना महज शुरुआत है।
अगर समय रहते ज्ञानेश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया, तो यह जनसैलाब ऐसा भूचाल लाएगा कि प्रधानमंत्री को अपना झोला उठाकर वापस जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं मिलेगा।
अबकी बार जनता जाग चुकी है और तानाशाही के हर किले को नेस्तनाबूद करके ही दम लेगी!

