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भारत में ऑनलाइन सेंसरशिप तेज, RSF की रिपोर्ट में पत्रकारों के कंटेंट पर बढ़ती पाबंदियों का खुलासा

भड़ास4मीडिया। भारत में पत्रकारिता से जुड़ी सामग्री को सोशल मीडिया से हटाने और पत्रकारों के अकाउंट पर पाबंदियां लगाने के मामले बढ़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders- RSF) ने 8 अक्टूबर 2026 को जारी अपनी रिपोर्ट में इस प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है। संगठन के मुताबिक, तेजी से और कम पारदर्शिता के साथ लागू की जा रही ऑनलाइन सेंसरशिप लोगों के सूचना पाने के अधिकार के लिए खतरा बन रही है।

RSF ने अपनी रिपोर्ट में स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले दिल्ली स्थित संगठन सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2026 में अब तक पत्रकारों और मीडिया संगठनों के कंटेंट हटाए जाने या उनके अकाउंट ब्लॉक किए जाने के 40 मामले दर्ज किए गए हैं। संगठन का कहना है कि मीडिया में सामने आए दूसरे मामलों को देखते हुए वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।

रिपोर्ट में स्वतंत्र पत्रकारों, डिजिटल मीडिया संस्थानों और राजनीतिक कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्टों के खिलाफ हुई कार्रवाई के उदाहरण दिए गए हैं। इनमें मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदाय से जुड़ी स्वास्थ्य समस्या पर रिपोर्टिंग करने वाले तीन पत्रकारों के इंस्टाग्राम अकाउंट निलंबित किए जाने से लेकर चुनाव आयोग से संबंधित कार्टूनों पर रोक लगाए जाने तक के मामले शामिल हैं।

पांच महीने में करीब दो लाख टेकडाउन ऑर्डर

RSF की रिपोर्ट में सबसे उल्लेखनीय आंकड़ा केंद्र सरकार के सह्योग (Sahyog) पोर्टल के जरिए भेजे गए कंटेंट हटाने के आदेशों का है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टिंग के आधार पर RSF ने बताया कि मार्च से जुलाई 2026 के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को करीब दो लाख कंटेंट रिमूवल ऑर्डर भेजे गए।

ये आदेश केवल पत्रकारिता संबंधी सामग्री तक सीमित नहीं थे, बल्कि इनमें अन्य प्रकार की ऑनलाइन सामग्री भी शामिल थी। इसलिए दो लाख आदेशों को पत्रकारों के खिलाफ की गई कार्रवाइयों की संख्या समझना सही नहीं होगा। फिर भी, इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में आदेश जारी होना ऑनलाइन कंटेंट पर सरकारी नियंत्रण के विस्तार को दर्शाता है।

तुलना करें तो अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच सह्योग पोर्टल के जरिए 19 ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों को 2,312 ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजे गए थे। अगस्त 2026 में प्रकाशित स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च-जुलाई के दौरान भेजे गए आदेशों में इंस्टाग्राम को सबसे ज्यादा, करीब एक लाख निर्देश मिले थे। फेसबुक और यूट्यूब को भी बड़ी संख्या में निर्देश भेजे गए।

यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। किसी आदेश में एक से अधिक पोस्ट, यूआरएल या अकाउंट शामिल हो सकते हैं। लिहाजा आदेशों की संख्या और हटाई गई सामग्री की वास्तविक संख्या एक जैसी नहीं होती।

36 घंटे की जगह अब तीन घंटे में कंटेंट हटाने की समय-सीमा

RSF ने फरवरी 2026 में लागू हुए नए नियमों का भी उल्लेख किया है। संगठन के मुताबिक, संबंधित सरकारी सूचना या आदेश मिलने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के लिए कुछ श्रेणियों की गैरकानूनी सामग्री हटाने या उस तक पहुंच रोकने की समय-सीमा 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दी गई।

इस बदलाव को लेकर चिंता यह है कि इतनी कम अवधि में प्लेटफॉर्मों के पास सरकारी अनुरोध की कानूनी वैधता, संदर्भ और पत्रकारिता के महत्व की स्वतंत्र समीक्षा करने के लिए सीमित समय रह जाता है।

RSF के अनुसार, मेटा ने सह्योग पोर्टल के साथ एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API) जोड़ा है। इससे पोर्टल के जरिए भेजे गए अनुरोधों को मेटा के प्लेटफॉर्मों पर सीधे प्रोसेस किया जा सकता है। RSF ने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टिंग का हवाला देते हुए चिंता जताई है कि इस व्यवस्था में सामग्री हटाने से पहले हर अनुरोध की मानवीय समीक्षा सुनिश्चित नहीं रह जाती।

यही इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। यदि किसी पत्रकार की रिपोर्ट या किसी नागरिक की सार्वजनिक हित से जुड़ी पोस्ट को हटाने का निर्णय तेजी से स्वचालित प्रक्रिया के जरिए लागू हो जाए, तो बाद में उसे चुनौती देने की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति पर आ जाती है। ऐसे में कार्रवाई का आधार, संबंधित प्राधिकरण और अपील की प्रक्रिया स्पष्ट होना जरूरी है।

आदिवासी समुदाय की स्वास्थ्य समस्या पर रिपोर्टिंग करने वाले तीन पत्रकारों के अकाउंट निलंबित

RSF की रिपोर्ट में 6 सितंबर 2026 का एक मामला खास तौर पर दर्ज है। मध्य प्रदेश में एक आदिवासी समुदाय को प्रभावित कर रहे स्वास्थ्य संकट पर रिपोर्ट प्रकाशित किए जाने के बाद स्वतंत्र पत्रकार मोनिका सिंह, बिंदु गुर्जर और लोकभद्र सिंह के इंस्टाग्राम अकाउंट निलंबित कर दिए गए थे।

RSF के मुताबिक, तीनों पत्रकारों के अकाउंट बाद में फिर से सक्रिय कर दिए गए। हालांकि, अकाउंट बहाल हो जाने से यह सवाल खत्म नहीं होता कि उन्हें निलंबित क्यों किया गया था और ऐसी कार्रवाई के लिए किस तरह की समीक्षा प्रक्रिया अपनाई गई।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आदिवासी समुदायों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और सरकारी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग अक्सर उन लोगों की आवाज सामने लाती है, जिनकी समस्याओं को मुख्यधारा की खबरों में पर्याप्त जगह नहीं मिलती।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों में नागरिकों की मौत से संबंधित आर्टिकल 14 की एक रिपोर्ट को इंस्टाग्राम पर भारत में ब्लॉक किया गया। इसके अलावा, एक ऐतिहासिक मस्जिद को गिराए जाने से संबंधित खबर साझा करने वाली द वायर की प्रधान संपादक सीमा चिश्ती की एक्स पोस्ट को पुलिस के अनुरोध के बाद हटाया गया था। बाद में वह पोस्ट बहाल कर दी गई।

कार्टूनिस्ट मंजुल और सतीश आचार्य के कंटेंट पर भी रोक

राजनीतिक व्यंग्य और कार्टून भी ऑनलाइन सेंसरशिप से जुड़े इस विवाद के केंद्र में हैं। RSF की रिपोर्ट में कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य और मंजुल के मामलों का उल्लेख किया गया है।

सतीश आचार्य का इंस्टाग्राम अकाउंट 28 सितंबर के आसपास भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया था। इस कार्रवाई के बाद उन्होंने मेटा से मिले नोटिस के स्क्रीनशॉट साझा किए थे। बाद में 6 अक्टूबर को उनका अकाउंट बहाल कर दिया गया। हालांकि, मंजुल का एक कार्टून भारत में उपलब्ध नहीं रहा।

ऑल्ट न्यूज़ की 7 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों कार्टूनिस्टों के कंटेंट का संबंध चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े विवाद पर राजनीतिक व्यंग्य से था। मंजुल ने 27 सितंबर को बताया था कि उनके एक कार्टून तक इंस्टाग्राम ने भारत में पहुंच रोक दी है। प्लेटफॉर्म के नोटिस में कार्रवाई को भारत सरकार या कानून प्रवर्तन एजेंसी के अनुरोध से जोड़ा गया था।

सतीश आचार्य ने ऑल्ट न्यूज़ से बातचीत में कहा कि पिछले करीब एक दशक से उनके कार्टूनों की पहुंच अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रभावित होती रही है। उनके मुताबिक, इस बार उनके पूरे इंस्टाग्राम प्रोफाइल को भारत में प्रतिबंधित किए जाने का अनुभव अलग था।

राजनीतिक कार्टून लोकतांत्रिक विमर्श में सत्ता और संस्थाओं की आलोचना का एक माध्यम होते हैं। ऐसे कंटेंट पर पाबंदी के मामलों में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि कार्रवाई किस कानूनी आधार पर की गई और क्या संबंधित कलाकार को प्रभावी अपील का अवसर मिला।

साल भर में कई मीडिया संस्थानों और पत्रकारों पर कार्रवाई

RSF ने अपनी रिपोर्ट में केवल सितंबर के मामलों को ही नहीं, बल्कि फरवरी से अगस्त 2026 के बीच सामने आई कई घटनाओं को भी दर्ज किया है।

फरवरी में द वायर का इंस्टाग्राम अकाउंट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वाला एनिमेटेड कार्टून पोस्ट करने के बाद भारत में करीब दो घंटे के लिए ब्लॉक हुआ था। अकाउंट बहाल होने के बावजूद संबंधित पोस्ट इंस्टाग्राम और फेसबुक पर उपलब्ध नहीं रही।

मार्च में कश्मीर के तीन मीडिया संस्थानों- ग्रेटर कश्मीर, राइजिंग कश्मीर और कश्मीर लाइफ के फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट ब्लॉक किए गए। डिजिटल मीडिया संस्थान मोलिटिक्स और दलित एवं आदिवासी समुदायों से जुड़े मुद्दे उठाने वाले नेशनल दस्तक के फेसबुक पेज पर भी कार्रवाई हुई। RSF के अनुसार, इन मामलों में संबंधित प्लेटफॉर्मों की ओर से सार्वजनिक रूप से पर्याप्त कारण नहीं बताए गए।

मई में एनवायरनमेंटल रिपोर्टिंग कलेक्टिव की एक इंस्टाग्राम वीडियो को ब्लॉक किया गया। रिपोर्ट में विशाखापत्तनम में प्रस्तावित गूगल डेटा सेंटर और उससे जुड़े विस्थापन के मुद्दे को उठाया गया था। इस रिपोर्ट में अडानी समूह के साथ परियोजना की साझेदारी और स्थानीय दलित समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव का जिक्र था। वीडियो को 10 सितंबर को कानूनी हस्तक्षेप के बाद बहाल किया गया।

जुलाई में दिल्ली में छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी सामग्री पर भी कार्रवाई हुई। स्वतंत्र पत्रकार साधिका तिवारी का एक वीडियो, जिसमें एक छात्र पुलिस हिंसा का आरोप लगाते हुए दिखाई दे रहा था, एक्स पर भारत में ब्लॉक कर दिया गया। स्वतंत्र पत्रकार याकूत अली का एक इंटरव्यू इंस्टाग्राम पर तीन बार ब्लॉक किए जाने का मामला भी रिपोर्ट में दर्ज है।

अगस्त में कश्मीर में पैलेट गन से घायल लोगों पर स्क्रॉल की कई पोस्ट इंस्टाग्राम पर भारत में प्रतिबंधित की गईं। RSF के मुताबिक, इसी विषय पर द वायर और द हिंदू की सामग्री भी प्रभावित हुई।

सह्योग पोर्टल पर कानूनी सवाल

सह्योग पोर्टल अक्टूबर 2024 में केंद्रीय गृह मंत्रालय की पहल के तहत शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों के पास कंटेंट हटाने के अनुरोध भेजने की सुविधा देना है।

लेकिन इस व्यवस्था को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की 11 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, एक्स कॉर्प ने गुजरात हाई कोर्ट में सह्योग पोर्टल से संबंधित कार्यवाही में केंद्र सरकार के रुख को चुनौती दी थी। कंपनी ने पोर्टल में शामिल होने के लिए दबाव डालने और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों को लेकर आपत्ति जताई थी। सह्योग पोर्टल की वैधता को लेकर अलग-अलग अदालतों में चुनौतियां भी उठाई गई हैं।

यहां कानूनी बहस का एक प्रमुख मुद्दा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A और धारा 79(3)(b) के तहत होने वाली कार्रवाइयों के बीच प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों का अंतर है। धारा 69A के तहत वेबसाइटों या ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया मौजूद है। सह्योग के जरिए भेजे जाने वाले नोटिसों की प्रक्रिया, उनके कारणों की पारदर्शिता और प्रभावित लोगों के पास उपलब्ध कानूनी उपायों को लेकर डिजिटल अधिकार संगठनों ने सवाल उठाए हैं।

सिर्फ किसी सामग्री पर रोक लगने से यह अपने आप साबित नहीं होता कि कार्रवाई गैरकानूनी थी। लेकिन सार्वजनिक हित से जुड़ी पत्रकारिता को प्रभावित करने वाले आदेशों में स्पष्ट कारण, कानूनी आधार और प्रभावी समीक्षा की व्यवस्था प्रेस की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण हैं।

RSF ने सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों से क्या कहा?

RSF ने भारतीय सरकार से प्रेस को निशाना बनाने वाले मनमाने टेकडाउन अनुरोधों को रोकने और प्रत्येक कार्रवाई का कानूनी आधार सार्वजनिक करने की मांग की है। संगठन ने पत्रकारिता संबंधी सामग्री पर पाबंदी लगाने से पहले स्वतंत्र आकलन सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया है।

संगठन ने मेटा, एक्स और अन्य सोशल मीडिया कंपनियों से कहा है कि पत्रकारों और मीडिया संस्थानों से संबंधित सरकारी अनुरोधों की अतिरिक्त मानवीय और कानूनी समीक्षा की जाए। प्रभावित पत्रकारों और संपादकीय टीमों को यह जानकारी दी जानी चाहिए कि कार्रवाई किस प्राधिकरण के अनुरोध पर हुई, उसका कारण क्या है और उसे चुनौती देने के लिए कौन-से रास्ते उपलब्ध हैं।

RSF का यह भी कहना है कि जिस सामग्री के पत्रकारिता संबंधी होने की पुष्टि हो जाए, उसे बिना अनावश्यक देरी के बहाल किया जाना चाहिए।

भारत प्रतिनिधि रितिका जैन की पोस्ट

RSF की रिपोर्ट सामने आने के बाद संगठन की भारत प्रतिनिधि रितिका जैन के एक्स हैंडल @riotsjain से 8 अक्टूबर को इस रिपोर्ट को साझा किया गया। पोस्ट का केंद्रीय संदेश यही था कि तेज और अपारदर्शी सेंसरशिप सूचना पाने के अधिकार के लिए खतरा है।

सवाल केवल पोस्ट हटने का नहीं, प्रक्रिया का भी है

सोशल मीडिया पर अवैध सामग्री, हिंसा के लिए उकसाने वाले संदेशों या अन्य गैरकानूनी कंटेंट के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब किसी पत्रकार की रिपोर्ट, किसी मीडिया संस्थान का पेज या किसी कार्टूनिस्ट की राजनीतिक व्यंग्य रचना हटाई जाती है, तो कार्रवाई के कारणों और प्रक्रिया की पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।

करीब दो लाख टेकडाउन ऑर्डर, तीन घंटे की समय-सीमा और पत्रकारों व कार्टूनिस्टों से जुड़े मामलों को एक साथ देखने पर बहस केवल सोशल मीडिया कंपनियों की कंटेंट मॉडरेशन नीति तक सीमित नहीं रहती। यह सवाल भी सामने आता है कि सार्वजनिक हित की पत्रकारिता को प्रतिबंधित करने वाले निर्णयों की समीक्षा कौन करेगा और प्रभावित पत्रकारों को समय रहते न्याय पाने का अवसर कैसे मिलेगा।

RSF की रिपोर्ट इसी चुनौती की ओर ध्यान खींचती है: ऑनलाइन सामग्री हटाने की व्यवस्था जितनी तेज होती जा रही है, उतनी ही जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि वैध पत्रकारिता और सत्ता से असहज सवाल पूछने वाली आवाजें बिना स्पष्ट कारण और प्रभावी अपील के सार्वजनिक मंचों से गायब न हो जाएं।

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