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ख़ुद की लापरवाही के शिकार हो गए नाना पाटेकर!

Black-and-white portrait of Nana' Patek ar looking at the camera, with a memorial banner reading 'NANA' PATEKAR 1951–2026' at the bottom

प्रकाश हिन्दुस्तानी-

अब कुछ हो नहीं सकता. हो सकता था कि एक सक्रिय, सार्थक अभिनेता कुछ वर्ष और जी लेते. यह भी सच है कि हमारे हाथ में ज़्यादा कुछ है नहीं….लेकिन सबक सीखे जा सकते हैं :

  • 75 की उम्र में दूरदराज गांव में केवल एक केयरटेकर के साथ रहना सलाह के योग्य नहीं है. वह बुजुर्ग आप हो या दोस्त / रिश्तेदार!
  • कार्डियक अरेस्ट या हार्ट अटैक जैसी स्थितियों में ‘गोल्डन ऑवर’ (पहले 30 से 60 मिनट) निर्णायक होते हैं. गांव या फार्महाउस में उन्नत लाइफ-सपोर्ट, डीफिब्रिलेटर और कार्डियोलॉजिस्ट की तत्काल उपलब्धता न होना सबसे बड़ा जोखिम साबित होता है.
  • ​एक सामान्य केयरटेकर तब तक असहाय रहता है जब तक कि उसे सीपीआर (CPR) न आता हो या उसके पास तुरंत एम्बुलेंस बुलाने की साधन-संपन्न व्यवस्था न हो.
  • घबराहट होने पर सबसे पहले केयरटेकर को बुलाकर डॉक्टर/एम्बुलेंस/रिश्तेदारों को SOS या कॉल करने के स्टेडिंग ऑर्डर होने थे. लापरवाह / नासमझ केयरटेकर पर भरोसा नहीं करना चाहिए.
  • ​मित्र को कॉल करने के बजाय मैसेज भेजना भूल साबित हुई. ​तीव्र कार्डियक अरेस्ट या भारी बेचैनी के दौरान व्यक्ति के पास सोचने और प्रतिक्रिया करने का टाइम बहुत कम होता है। ऐसे में मैसेज टाइप करना और उस पर सामने वाले का ध्यान जाने में देरी होना जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे में ऐसे व्यक्ति को फोन करना चाहिए जो रिसोर्सफुल हो, तत्काल डॉक्टर और एम्बुलेंस बुला सके.आपात स्थिति में डायरेक्ट कॉल या सिंगल-क्लिक एसओएस (SOS) अलार्म ही एकमात्र प्रभावी विकल्प होता है।
  • गुस्सैल बुजुर्ग लोगों का बीपी /शुगर असामान्य रहता हैं. उन्हें अस्पताल के पास रहना चाहिए. आज मुझे ऐसी बातें नहीं लिखनी चाहिए थी लेकिन लिख रहा हूं इससे कई लोगों को बुरा लगेगा. मुझे भी बुरा लग रहा है. लेकिन मैं अमिताभ बच्चन का उदाहरण देना चाहता हूं जिन्होंने जुहू के अपने बंगले में पहली मंजिल पर 24 घंटे चालू रहने वाला आईसीयू बना रखा है और डॉक्टर हमेशा 24 घंटे उपलब्ध रहता है. अपनी सेहत की रक्षा करना और तत्काल चिकित्सा व्यवस्था हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. हालांकि अंजाम हमारे हाथ में नहीं!

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह निधन हो गया। वे 75 वर्ष के थे। बताया जा रहा है कि गोवा स्थित उनके घर पर उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उनके अचानक चले जाने से फिल्म जगत और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर है।

नाना पाटेकर के अंतिम घंटों को लेकर मणिपाल अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. शेखर साल्कर ने जानकारी दी है। उनके मुताबिक, रात करीब 2:30 बजे नाना ने अपने एक दोस्त को मैसेज भेजकर बताया था कि उन्हें अच्छा महसूस नहीं हो रहा और तबीयत ठीक नहीं है। रात का समय होने के कारण दोस्त ने मैसेज तुरंत नहीं देखा। बाद में मैसेज देखने पर उन्होंने नाना को फोन किया।

पसीने में भीगे और अचेत होते मिले नाना

डॉ. साल्कर के अनुसार, दोस्त रात करीब 4 बजे नाना के घर पहुंचे। उस वक्त नाना पूरी तरह पसीने में भीगे हुए थे और धीरे-धीरे अचेत हो रहे थे। दोस्त ने तुरंत उनके केयरटेकर को अस्पताल भेजा और एंबुलेंस बुलवाई गई।

मौके पर ही शुरू किया गया CPR

डॉक्टर ने बताया कि जब अस्पताल की इमरजेंसी टीम घर पहुंची, तब तक नाना पूरी तरह अचेत हो चुके थे। टीम ने वहीं CPR शुरू किया और सुबह करीब 4:20 से 4:30 बजे के बीच उन्हें अस्पताल लाया गया।

‘ब्रॉट डेड’ लाए गए, 5:30 बजे मृत घोषित

डॉ. साल्कर के मुताबिक, नाना पाटेकर को अस्पताल ‘ब्रॉट डेड’ यानी मृत अवस्था में लाया गया था। इसके बावजूद डॉक्टरों ने हार नहीं मानी और 45 मिनट से एक घंटे तक लगातार CPR दिया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। सुबह करीब 5:30 बजे उन्हें आधिकारिक रूप से मृत घोषित कर दिया गया।

दमदार अभिनय के लिए याद किए जाएंगे

नाना पाटेकर अपनी बेबाक संवाद अदायगी और गहन अभिनय के लिए जाने जाते थे। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘अग्नि साक्षी’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार आज भी दर्शकों के ज़ेहन में ताज़ा हैं। उन्हें कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के साथ पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था। फिल्मों से इतर, किसानों की मदद के लिए शुरू की गई ‘नाम फाउंडेशन’ के ज़रिए वे सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहे।


नाना पाटेकर के निधन पर मेडिको-लीगल केस दर्ज

प्रसिद्ध अभिनेता नाना पाटेकर के निधन के बाद मेडिको-लीगल केस दर्ज किए जाने की खबर ने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद MLC क्यों दर्ज किया जाता है और इसका कानूनी महत्व क्या है?

8 अक्टूबर 2026 को अभिनेता नाना पाटेकर का गोवा में निधन हो गया। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, वह अपने आवास पर अचेत पाए गए थे। उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने लगभग 45 मिनट तक CPR देकर उन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद अस्पताल द्वारा मेडिको-लीगल केस दर्ज किया गया और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।

मेडिको-लीगल केस ऐसी चिकित्सकीय-कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति की चोट, दुर्घटना, विषाक्तता अथवा मृत्यु से जुड़ी परिस्थितियों के कारण कानूनी जाँच की आवश्यकता हो सकती है। विशेष रूप से अचानक अथवा संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु के मामलों में इसका महत्व बढ़ जाता है।

धारा 194 BNSS- आत्महत्या, दुर्घटना अथवा कानून में वर्णित संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु होने पर पुलिस द्वारा इनक्वेस्ट एवं आवश्यक जाँच का प्रावधान करती है। यह पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के समकक्ष है।

धारा 196 BNSS: निर्धारित परिस्थितियों में मृत्यु के कारण की मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच का प्रावधान करती है।

धारा 173 BNSS: यदि प्राप्त सूचना से किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो FIR दर्ज करने की कानूनी प्रक्रिया लागू होती है।

क्या MLC दर्ज होने का अर्थ हत्या या किसी अपराध का होना है?

MLC, FIR और पोस्टमार्टम तीन अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं। MLC एक चिकित्सकीय-कानूनी अभिलेख है, जबकि FIR किसी संज्ञेय अपराध की सूचना का औपचारिक पंजीकरण है। वहीं पोस्टमार्टम मृत्यु के वास्तविक चिकित्सकीय कारण का पता लगाने में सहायता करता है। प्रत्येक MLC में FIR दर्ज करना अथवा पोस्टमार्टम कराना अनिवार्य नहीं होता। यह संबंधित मामले की परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करता है। नाना पाटेकर के मामले में भी MLC दर्ज होना अपने आप में किसी आपराधिक घटना का प्रमाण नहीं है। मृत्यु के सटीक चिकित्सकीय कारण के निर्धारण के लिए पोस्टमार्टम की प्रक्रिया अपनाई गई है…किसी व्यक्ति की अचानक मृत्यु के बाद मेडिको-लीगल केस दर्ज किया जाना एक महत्वपूर्ण चिकित्सकीय एवं कानूनी प्रक्रिया हो सकती है। इसका उद्देश्य मृत्यु से संबंधित तथ्यों को सुरक्षित रखना तथा आवश्यकता पड़ने पर निष्पक्ष कानूनी जाँच सुनिश्चित करना है।

क्योंकि कानून में संदेह जाँच का आधार हो सकता है, लेकिन दोषसिद्धि का आधार केवल विधिसम्मत साक्ष्य होते हैं।

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